फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Anand Mohan: आनंद मोहन क्या बिहार के एमवाई समीकरण में फिट बैठेंगे, बाहुबली की रिहाई के सियासी मायने क्या?

सार

बिहार के सहरसा, औरंगाबाद, शिवहर, वैशाली आदि जिलों में अच्छा खासा राजपूत वोट बैंक हैं। इन जिलों के आसपास के क्षेत्रों में भी राजपूतों के वोट का हमेशा असर रहता है। बिहार में करीब सात से आठ प्रतिशत राजपूत वोटर्स हैं। करीब 35 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां राजपूत वोटर्स अपने दम पर खेल पलट सकते हैं।
विज्ञापन
आनंद मोहन - फोटो : social media
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

राजनीति में मुर्दे को हमेशा जिंदा रखा जाता है, ताकि जब भी जरूरत हो उसे बाहर निकाला जा सके और आनंद मोहन तो जीते जागते राजपूत और बाहुबली नेता हैं। साल 2016 और 2021 में भी आनंद मोहन के जेल से बाहर निकलने की संभावना बनी थी। पर उस वक्त शायद सियासत को उनकी जरूरत महसूस नहीं हुई। अब जब 2024 के चुनावी साल नजदीक आया तो अचानक उनकी जरूरत भी आन पड़ी और नतीजा सभी के सामने है।

विज्ञापन


जिस लालू यादव की सरकार में आनंद मोहन का पूरा राजनीतिक करियर तहस नहस कर दिया गया था, उसी राजद की गठबंधन सरकार ने उनके जेल निकासी का मार्ग प्रशस्त किया है। नीतीश और लालू यादव को लग रहा है कि राजनीति के एमवाई समीकरण में राजपूत बिरादरी का यह नेता आगे चलकर फिट बैठेगा। ऐसे में जेल मैन्यूअल में बदलाव कर उन्हें बाहर निकाल लिया गया।

उधर, भाजपा के नेता इस वक्त बेहद संभल कर बयानबाजी कर रहे हैं। वे आनंद मोहन की रिहाई का खुलेतौर पर विरोध नहीं कर रहे हैं, पर जेल मैन्यूअल में बदलाव के कारण अन्य 26 लोग जो बाहर आए हैं, उन्हें दुर्दांत अपराधी के तौर पर पेश कर नीतीश सरकार को घेर रहे हैं। भाजपा नेताओं के संभल कर बोलने के पीछे भी कई कारण हैं।
विज्ञापन


बिहार के सहरसा, औरंगाबाद, शिवहर, वैशाली आदि जिलों में अच्छा खासा राजपूत वोट बैंक हैं। इन जिलों के आसपास के क्षेत्रों में भी राजपूतों के वोट का हमेशा असर रहता है। बिहार में करीब सात से आठ प्रतिशत राजपूत वोटर्स हैं। करीब 35 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां राजपूत वोटर्स अपने दम पर खेल पलट सकते हैं। ऐसे में भाजपा नेता इस वोट बैंक को बेवजह नाराज नहीं करना चाहते हैं।

दूसरी तरफ इस सच्चाई से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि इस वोट बैंक पर कभी भी किसी एक दल का राज नहीं रहा है। यह बंटा हुआ वोट बैंक है। पिछले कई चुनाव में इस वोट बैंक ने भाजपा और उनके सहयोगियों के प्रति प्यार दिखाया है। जबकि शिवहर जैसे राजपूत बहुल क्षेत्र में आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद को राजद के टिकट से चुनाव में विजय दिलाकर विधानसभा पहुंचाया है। ऐसे में यह तय कर पाना कि आनंद मोहन के मैदान में आ जाने से वोट पूरी तरह राजद या जदयू को चला जाएगा बहुत मुश्किल है।

2015 और 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के आंकड़ों को अगर गौर से देखें तो पाएंगे कि भारतीय जनता पार्टी ने सवर्ण वोटों को अपनी ओर करने के लिए राजपूत और भूमिहार उम्मीदवारों पर काफी भरोसा दिखाया। खासकर राजपूतों के प्रति भाजपा का प्रेम किसी से छिपा नहीं है। 2015 में जहां 30 राजपूतों को जबकि 2020 के चुनाव में  22 राजपूतों को टिकट दिया गया था। इनमें कई ने अपने-अपने क्षेत्र में जीत दर्ज की। ऐसे में आनंद मोहन को लेकर भाजपा नेता बेवजह किसी विवाद में पड़ना नहीं चाह रहे हैं।

बिहार की राजपूत बिरादरी भी लंबे समय से आनंद मोहन को जेल से रिहा करने के लिए प्रयासरत थी। राजपूत नेता के तौर पर आनंद मोहन की पहचान ने सियासी दलों में यह आस जगा रखी है कि गठबंधन को एक ऐसा राजपूत नेता मिला है जो आने वाले चुनाव में तुरुप का इक्का साबित हो सकता है। पर बिहार की राजनीति इतनी आसान भी नहीं है। जिस जिलाधिकारी जी कृष्णैया की हत्या के आरोप में आनंद मोहन जेल में थे, वो दलित जाति से आते थे। ऐसे में आनंद मोहन की रिहाई को दलितों के अनादर के तौर भी पेश किया जा रहा है। मायावती का बयान काफी कुछ कह गया है, उन्होंने कहा है कि नीतीश सरकार का फैसला दलित विरोधी है।

ऐसे में एक दलित अधिकारी की हत्या के आरोपी का जेल से बाहर आना एमवाई समीकरण को कहां तक सार्थक करेगा, यह आने वाला वक्त तय करेगा। पहले के बिहार और अब के बिहार में भी काफी कुछ बदल चुका है। वो दौर गुजर चुका है जब बिहार के युवा दबंगों के पीछे-पीछे चलकर अपना भविष्य खोजते थे। बिहार में निश्चित तौर पर राजनीति में जाति हावी है, लेकिन अब यह जीत का सर्वमान्य पैमाना नहीं रह गया है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें