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श्रीलंका में संविधान क्यों नहीं पाल रहे मैत्रीपाला

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श्री लंका संसद में चली कुर्सियां
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हिंद महासागर के बीच बसे इस खूबसूरत सिंहल द्वीप श्रीलंका में क्या हो रहा है?  यह तो वहां के इतिहास में आज तक नहीं हुआ। राष्ट्रपति मैत्रीपाला  पर संविधान के पालन की जिम्मेदारी है, वहीं धज्जियां उड़ा रहे हैं। बहुमत प्राप्त प्रधानमंत्री बर्खास्त है। संसद में मारपीट हो रही है। तीन-तीन बार संसद में बहुमत साबित न कर पाए , ऐसा व्यक्ति प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बेशर्मी के साथ बैठा हुआ है। दूर बैठा एक तीसरा देश रिमोट से श्रीलंका की हुकूमत चलाने की साजिश कर रहा है।

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देश की जनता सुप्रीम कोर्ट और संसद के स्पीकर को सलाम कर रही है, जो निरंकुशता के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना क्या समझ रहे हैं कि जिन महिंद्रा राजपक्षे को वे प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं , वे कभी उनके बॉस थे और देश के राष्ट्रपति भी। राजपक्षे की आंखों में तो वे बहुत पहले से खटक रहे हैं। तो क्या सिरिसेना अपने भस्मासुर को पाल रहे हैं ?

इसका उत्तर जानने के लिए परदे के पीछे की कहानी समझनी होगी, जो महिंद्रा राजपक्षे के गृहराज्य हंबनटोटा से शुरू होती है। बीते दिनों भारत को वहां के एयरपोर्ट संचालन की जिम्मेदारी मिलने से चीन भड़का हुआ है। पहले हंबनटोटा में बंदरगाह विकसित करने का ठेका चीन ने हासिल किया। उस समय के राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे चीन की गोद में बैठे हुए थे

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चीन की शर्तों के सामने उन्होंने सर झुकाया और अपने देश हित को दांव पर लगा दिया। बदले में महिंद्रा राजपक्षे के चुनाव को चीन से भरपूर फंड मिला। लेकिन राजपक्षे हार गए। इसके बाद उनके धुर विरोधी मैत्रीपाला सिरिसेना राष्ट्रपति बने तो चीन ने उन पर भी डोरे डालने की कोशिश की। जब वे पकड़ में नहीं आए तो हंबनटोटा बंदरगाह अनुबंध के जाल में फांस लिया।

आखिरकार बंदरगाह चीन के हाथ में आ गया। यह भारत के लिए गंभीर चिंता की बात थी। इस कारण हंबनटोटा एयरपोर्ट का संचालन भारत के जिम्मे आ गया। उनके प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने संतुलित विदेश नीति का पालन करते हुए हंबनटोटा एयरपोर्ट के लिए भारत से करार किया। राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने भी इसका समर्थन किया। वे भारत समर्थक माने जाते थे। मगर अचानक चीन के इशारे पर राजपक्षे और सिरिसेना के बीच गुपचुप खिचड़ी पकने लगी।

गौरतलब है कि पहले सिरिसेना और राजपक्षे एक ही पार्टी में थे। महिन्द्र राजपक्षे ने जब लिट्टे का सफाया करने के लिए तमिल इलाकों पर हवाई बमबारी की तो सिरिसेना ने पार्टी में इसका विरोध किया था। अब अगले चुनाव निकट हैं तो सिरिसेना को भी अपने राजनीतिक भविष्य के बारे में सोचना होगा। जब वे राष्ट्रपति बने थे तो ऐलान किया था कि वे सिर्फ एक बार ही राष्ट्रपति रहेंगे। इसके बाद स्वेच्छा से सेवानिवृत हो जाएंगे।  इसी कारण उन्होंने संविधान में संशोधन करके अपने कई अधिकार छोड़ दिए थे। यहां तक कि अब श्रीलंका के राष्ट्रपति को यह अधिकार नहीं है कि वो प्रधानमंत्री को पद से हटा सके। 

इसीलिए जब उन्होंने पिछले दिनों अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर प्रधान मंत्री रानिल विक्रमसिंघे को बर्ख़ास्त किया तो लोग हैरान रह गए। राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि वे राष्ट्रपति पद पर एक कार्यकाल और चाहते हैं। उन्होंने महिंद्रा राजपक्षे से अंदरूनी समझौता किया। इसके अनुसार।
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महिंद्रा राजपक्षे अपनी अलग पार्टी बना कर चुनाव लड़ेंगे। बाद में राजपक्षे को प्रधानमंत्री बनाया जाएगा। इस योजना की भनक कूटनीतिक क्षेत्रों में पहुंच गई। इस कारण देशवासी भड़के हुए हैं। संसद में तीन बार महिंद्रा राजपक्षे को राष्ट्रपति ने बहुमत साबित करने का अवसर दिया। तीनों बार ही हार गए। 

इसका एक कारण और भी है। चीन मालदीव में अपने समर्थक को राष्ट्रपति नहीं बना सका और वहां लोकतान्त्रिक ताकतों की जीत हुई है।  नए राष्ट्रपति ने मालदीव को मिले चीनी कर्ज, उसके साथ हुए अनुबंध और व्यापारिक करार की समीक्षा करने का फैसला किया है। इससे चीन निराश है। वह नहीं चाहता कि अनुबंध की शर्तें उजागर हों। इसकी वजह यह है कि वे अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं हैं। श्रीलंका में हंबनटोटा अनुबंध का भी ऐसा ही कुछ हाल है।

इसलिए हर हाल में चीन वहां की सरकार में "अपने आदमी " महिंद्रा राजपक्षे की भागीदारी चाहता है। चुनाव के बाद  मैत्रीपाला सिरिसेना का कमजोर विकेट कभी भी गिराया जा सकता है। अर्थात सिरिसेना अपने ही बनाए जाल में उलझ गए हैं। उनके एक तरफ कुआं है और दूसरी तरफ खाई।

श्रीलंका की अवाम अपने राष्ट्रपति का संविधान के साथ मखौल देख रही है। राष्ट्रपति ने 5 जनवरी 2019 को नए चुनाव का ऐलान किया है ,जो निर्धारित वक्त से दो साल पहले होंगे। जाहिर है देश एक गंभीर संवैधानिक संकट के दौर से गुज़र रहा है। चुनाव की निष्पक्षता भी संदेह के घेरे में है।           

 
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