इंकलाब जिंदाबाद का इंकलाबी नारा। जिसे सन् 1921 में हसरत मोहानी ने अपनी क्रांतिकारी कलम से पहली बार लिखा था। इस इंकलाबी नारे को विश्व प्रसिद्ध किया भगत सिंह, अशफ़ाक उल्ला खां और राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जैसे भारत मां के बहादुर बेटों ने। जब-जब इंकलाब जिंदाबाद की गूंज सुनाई देती है शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, अशफ़ाक़ उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद जैसे महानायक युवाओं को प्रेरित करने के लिए आगे आ जाते हैं।
"दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़त,
मेरी मिट्टी से भी ख़ुश्बू - ए - वतन आएगी।
इंकलाब जिंदाबाद!
भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की शहादत के बाद इस इंकलाबी नारे ने अपने सफर को कारवां में तब्दील किया और जल्द ही ऐसी रफ़्तार भरी की भारतीयों का यह सबसे पसंदीदा नारा बनकर उभरा। हर वो युवा जो क्रांतिकारियों की श्रेणी में शामिल हुआ उसकी पहचान इंकलाब जिंदाबाद से हुई। भगत सिंह की शहादत के बाद इस इंकलाबी नारे ने भारतीयों को सोने न दिया। नारे की गूंज के साथ शहीदे आजम भगत सिंह और उस दौर के तमाम क्रांतिकारियों के क्रांतिकारी विचारों को देश के कोने कोने तक पहुंचाया।
इसका असर हमें तब भी दिखाई देता है जब 1931 में कराची में हुए कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी को काले झंडे दिखाकर भारतीयों ने अपना विरोध दर्ज कराया। संपूर्ण भारतवर्ष में भगत सिंह जिंदाबाद के साथ इंकलाब जिंदाबाद की गूंज सुनाई दी। सन 1929 से लेकर 1947 तक के आंदोलनों में इंकलाब जिंदाबाद का नारा सबसे क्रांतिकारी बना रहा।
फिर चाहे वो भारत छोड़ो आंदोलन (1942) हो या 1946 का रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह या फिर तेभागा आंदोलन 1946-47, हो या जेपी आंदोलन 1974-75, इन आंदोलनों में विद्रोही नौसैनिकों, किसानों, छात्र छात्राओं और उनके समर्थकों द्वारा "इंकलाब जिंदाबाद" तथा "जय हिंद" के नारों में वही इंकलाबी जोश देखा जा सकता है। जो 1929 के दौर में रहा।
आज भी विभिन्न किसान, छात्र और श्रमिक आंदोलनों सहित अनेक लोकतांत्रिक आंदोलनों में यह नारा समय-समय पर बुलंद होता दिखाई देता है। क्रांति का पर्याय बने इस इंकलाबी नारे ने लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जगाये रखने का काम आज भी जारी रखा है। निःसंदेह भविष्य की पीढ़ियां भी इस इंकलाबी नारे से प्रेरित होती रहेंगी।
इंकलाब जिंदाबाद!
जय हिंद!
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