बलिया में बिंदी का मायका है। या यूं कहें कि देश की तमाम औरतों के माथे पर सजने वाली बिंदी की पैदाइश पूर्वांचल के बागी बलिया के मनियर कस्बे में हुई थी। ऋषि-मुनियों की इस धरती का नाम पहले मणिवर और मुनिवर था, जो बाद में मनियर हो गया। बुजुर्ग कहते हैं कि सबसे पहले यहां कांच की बिंदी बनाई जाती थीं। फिर उस पर सोने-चांदी की परत चढ़ाई जाने लगी। कई बार रंगों से कलाकारी भी की जाती थी। फिर बिंदियों पर वेलवेट का कब्जा हो गया। बाद में चिपकने वाले स्टिकर बिंदी ने पूरे कारोबार पर कब्जा जमा लिया। इस वेलवेट की बिंदी को बनाने के लिए लोहे के छोटे पाइप नुमा छापे तैयार किए जाते थे। इस छापे की नुकीली आकार वाले सिरे से बिंदियों की अलग-अलग गोल, लंबी, चौकोर डिजाइन में कटिंग होती थी।
चालीस किलोमीटर के इस इलाके में लगभग 1.5 लाख की आबादी है, जो घरों में बिंदी बनाने का काम करती है। सालाना कारोबार लगभग 30-40 करोड़ रुपये का है। इसे एक जनपद, एक उत्पाद योजना में भी शामिल किया गया है। घर के पुरुष कच्चा माल लाते हैं, तो महिलाएं उसे चिपकाने और पैकिंग का काम करती हैं। जब कांच की बिंदिया बनती थीं, तो भट्टी में कांच पिघलाकर तैयार करने का काम पुरुष करते थे। अब जब मशीन से प्रिंट होने लगीं, तो उसे काटकर, चिपकाने वाला काम महिलाएं ज्यादा करती हैं। इफ्तिखार अहमद चौथी पीढ़ी हैं, जो इस कारोबार में जुटे हैं। उन्हें दादा ने यह हुनर सिखाया था, जो अब उनके लिए विरासत-सा है।
कई घर ऐसे हैं, जहां सास डिजाइन तैयार करती हैं, बहू उन्हें चिपकाती है और बेटियां पैकिंग करती हैं। अपनी दादी सास से यह हुनर सीखने वाली रेहाना कहती हैं कि इसी से बच्चों की पढ़ाई हुई और बेटी की शादी भी। यही वजह है कि घर-घर में बिंदी की छोटी फैक्ट्री लगी है। आंगन रंग-बिरंगे डिब्बों से भरा रहता है। रमिता देवी जबसे ब्याह कर आईं, तभी से बिंदी चिपकाने और कटिंग का काम करती हैं। उनकी पड़ोसन शशिकला कहती हैं कि हम औरतें घर बैठे बिंदी बनाकर ठीक-ठाक पैसा कमा लेती हैं। दिनभर में 10 डिब्बे वह अकेले तैयार कर देती हैं।
मनियर से बिंदी तैयार होकर वाराणसी या फिर गोरखपुर के रास्ते दिल्ली, मुंबई तक जाती है। कई बार वहां बड़े ब्रांड अपनी पैकिंग के साथ भी बेचते हैं, नए नाम के साथ। कस्बे की गलियों में शायद ही कोई घर होगा, जहां बिंदी बनाने से जुड़ा कोई काम न होता हो। मनियर की बिंदी इलाके में अपनी खूबियों की वजह से मशहूर है।