कीर्ति से निश्चित समय पर मिलने के लिए मैं अपने गेस्ट हाउस से लगभग एक घंटा पहले निकल गया, पर बंगलूरू का ट्रैफिक ऐसा है कि आप बहुत ही भाग्यशाली होंगे जो समय से अपने गंतव्य पर पहुंच जाएं। मैं भी लगभग आधे घंटे की देरी से उनके पास पहुंचा।
बातचीत का दौर आरम्भ हुआ और फिर मैंने किसी ख़ास विषय पर उनकी राय जाननी चाही। हमेशा की भांति उन्होंने मेरा मार्ग दर्शन किया। अब अलविदा कहने का वक़्त आ गया था और मैंने इजाज़त चाही। कीर्ति मुझे कार तक छोड़ने के लिए बहार आए। लेकिन इस दरमियान उन्होंने कुछ ऐसा कहा कि जो शायद मुझे हमेशा याद रहेगा।
वह बोले, ‘हम अपने काम में इतने व्यस्त होते हैं कि अपनी सेहत का बिल्कुल ध्यान नहीं रखते। हम जैसे लोगों की सारी दिनचर्या फ्लाइट, ट्रैन और टैक्सी के बीच फंस कर दम तोड़ने लगती है। पर हमको यह समझना चाहिए कि अच्छी सेहत का कोई विकल्प नहीं है। सारे बड़े लीडर्स, मिसाल के तौर पर चाहे वह आनंद जी हों, विनीत नायर साहब हों और या फिर गुरनानी जी, ये लोग दुनिया के किसी भी कोने या होटल में हों, सुबह उठते ही सब से पहले जिम की तरफ़ भागते हैं। उनकी फिटनेस- किट हमेशा साथ -साथ फ्लाइट में जाती है।
ये लोग समय न होने की सूरत में स्पोर्ट्स शूज डालकर होटल के आस-पास ही दौड़ने निकल जाते हैं। मुझे लगता है कि तुम्हारा वज़न काफ़ी बढ़ गया है। इसलिए मैं चाहूंगा कि अगली बार जब हमारी मुलाक़ात हो, तो तुम्हारा वज़न कम होना चाहिए। इसको मेरी एक चुनौती समझो।‘
मैं निशब्द, मुस्कुराते हुए अपनी कार में हांथ उठाकर अभिवादन करते हुए ‘कबीर के गूंगे’ की भांति आकर बैठ गया:
"अकथ कहानी प्रेम की, कुछ कही न जाए \
गूंगे केरी सरकरा, बैठे मुस्काए "
गेस्ट हाउस वापस लौटते हुए मैंने कीर्ति को टेक्स्ट मैसेज के द्वारा ‘चैलेंज एक्सेप्टेड विद थैंक्स’ लिखकर भेजा और उस दिन के बाद यह निश्चय कर लिया कि किसी भी परिस्थिति में सुबह उठकर सबसे पहले एक घंटे मुझे स्वयं को देने हैं और उसके बाद ही अब कोई दूसरा काम होगा। आपको जानकर हैरानी होगी कि कीर्ति की सलाह और बताई हुई दिनचर्या पर अमल करने से लगभग दो महीनों के भीतर ही मेरा वज़न 92 किलोग्राम से 83 किलोग्राम पर पहुंच गया है और मेरा बाहर निकला हुआ पेट कब और कहां चला गया , इसका मुझे इल्म भी नहीं है।
हम जब कीर्ति की टीम में हुआ करते थे, तो वह अक्सर ‘ लॉन्ग-टर्म रिलेशनशिप ’ पर ज़ोर दिया करते थे। उनका यह मंत्र मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत कारगर साबित हुआ है। हम अब अलग-अलग शहरों में रहते हैं, दूसरी कम्पनीज़ के लिए कार्य करते हैं , पर जब भी मौक़ा मिलता है तो उसी गर्म जोशी से मिलते हैं। यह शायद उसी मंत्र का फैज़ है। शुक्रिया कीर्ति ! इतनी आसानी से यह समझाने के लिए कि अच्छा स्वास्थ्य हमारे लिए कितना ज़रूरी है, मुझे आपसे अगली मीटिंग का बेसब्री से इंतेज़ार है।
(लेखक रियाज़ ख़ान हैदराबाद स्थित एक आई.टी व इंजीनियरिंग सर्विसेज कम्पनी में निदेशक व स्तम्भकार हैं)
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