भारत के विपरीत जिन देशों में डिजिटलीकरण हुआ, वहां डाटा सुरक्षा और साइबर फ्राॅड रोकने के उपाय भी समांतर रूप से किए गए। हमारे यहां न तो इसके लिए पुलिस समुचित रूप से प्रशिक्षित है और न ही जांच एजेंसियां उतनी अपडेट हैं। आलम यह है कि साइबर अपराधी पुलिस और जांच एजेंसियों से दस गुना आगे हैं। आप कह सकते हैं कि इस देश में जब फर्जी पीएमओ अधिकारी, फर्जी बैंक ब्रांच और नकली अदालत धड़ल्ले से चल सकती हो तो डिजिटल अरेस्ट हमारी नियति ही है।
हालांकि देश में लगातार बढ़ते साइबर अपराधों के चलते कुछ साइबर अपराध थाने खोले गए हैं, जो नाकाफी हैं। इस बीच केन्द्र सरकार ने देश में 5 हजार साइबर कमांडो की भर्ती का ऐलान किया है, जिनमें से 1 हजार की ट्रेनिंग शुरू भी हो चुकी है लेकिन यह भी बढ़ते साइबर अपराधों के मुकाबले अपर्याप्त है।
हैरानी की बात यह है कि लगातर बढ़ते साइबर अपराधों के साथ-साथ देश में साइबर अपराधों के अड्डे भी बढ़ते जा रहे हैं और सुरक्षा एजेंसियां उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं कर पा रही हैं। यहां बुलडोजर से किसी आरोपी का घर ढहाया जा सकता है, लेकिन साइबर क्राइम लिप्त पूरे गांव पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
आज देश के 9 राज्यों के कई दर्जन गांव ऐसे हैं, जहां से खुले आम साइबर अपराधों को संचांलित किया जा रहा है। अकेले झारखंड में 42 ऐसे गांव हैं, जहां साइबर ठगी लोगों की आय का मुख्य साधन बन चुका है। घर बैठे लूट की यह कमाई बेरोजगार युवाओं और गरीबों को इस कदर आकर्षित कर रही है कि वो दूसरा कामों में मेहनत करने की जगह एक लैपटाॅप और फोन के जरिए लाखों की ठगी घर बैठे कर रहे हैं। सख्त कानूनों और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में ये धंधा बेखौफ चल रहा है।
इसका कारण शायद यह है कि हत्या, सार्वजनिक लूट, बलात्कार या हिंसक अपराधों के कारण समाज में जो दहशत फैलती है, वह खामोश और व्यक्तिगत रूप से टारगेट कर किए जाने वाले साइबर अपराधों से नहीं फैलती। कई बार साइबर ठगी में अपनी जिंदगी भर की कमाई एक झटके में गंवा देने वाला व्यक्ति शर्म के मारे से दूसरे से कुछ कह भी नहीं पाता। लेकिन पानी सर के ऊपर से गुजरने लगा है। ये नए किस्म का साइबर आतंकवाद है, जो हमारे जीवन का सुख छीनने में लगा है।
डिजिटल अरेस्ट से बचने के तरीके
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में डिजिटल अरेस्ट से बचने के लिए तीन सूत्र दिए। ये हैं रुको, सोचो और एक्शन लो!
यह कहने में तो आसान है, लेकिन साइबर अपराधी जिस चालाकी से सामने वाले व्यक्ति को आतंकित कर देते हैं, उससे पीड़ित अपनी सामान्य विवेक बुद्धि भी खो बैठता है। उसका क्या? जरूरत इस बात की है कि ऐसे फर्जी काॅल्स पर नकेल कैसे लगे। अब तो साइबर अपराधियों ने फ्राॅड का एक और नया तरीका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। वे इसके लिए सरकारी सेवा AePS का इस्तेमाल कर रहे हैं।
यह एक ऐसी सेवा है, जिसके जरिए आप आधार कार्ड और बायोमैट्रिक के जरिए बैंक अकाउंट से पैसे निकाल सकते हैं। जिन यूजर्स का बैंक अकाउंट आधार कार्ड से लिंक होता है और AePS इनेबल रहता है, वो बिना किसी चेकबुक, एटीएम कार्ड आदि के भी अपने अकाउंट से पैसे निकाल सकते हैं। हालांकि, इसके लिए रिजर्व बैंक ने एक लिमिट सेट की है।
यहां एक सवाल यह भी है कि इस डिजिटल अरेस्ट के पीछे कौन सा मनोविज्ञान काम करता है?
इस बारे में दिल्ली के जाने माने मनोवैज्ञानिक डाॅ. अरविंद अओट्टा का कहना है-
साइबर अपराधी भावनात्मक रूप से अपने शिकार को ब्लैकमेल करते हैं। साइबर अपराधी मनोवैज्ञानिक तरकीब (ट्रिक्स) हेलो इफेक्ट का उपयोग करते हैं। इसका अर्थ यह है कि आप सीमित जानकारी के आधार पर किसी के प्रति एक सकारात्मक मान्यता रखते हैं। साइबर अपराधी इसी का नाजायज फायदा उठाते हैं। वो आपके आधार कार्ड, वाहन क्रमांक, आप का कार्यस्थल या पारिवारिक जानकारियां हासिल कर आपको बताते हैं तो आपको लगता है कि सामने वाला कोई आधिकारिक व्यक्ति है और सच बोल रहा है। आप डर जाते हैं और कई बार वो जानकारियां भी सामने वाले को दे बैठते हैं, जो नहीं दी जानी चाहिए।
साइबर अपराधी आपके मनोविज्ञान को तेजी से भांपते हैं और जैसे ही उन्हें लगता है कि आप उसकी बातों से डर गए हैं, वो आपका और भी दबंगई से भयादोहन करने लगता है। आप भयवश उसके हर आदेश का पालन करने लगते हैं, बजाय यह सोचने कि उसे आदेशित करने वाला कौन है, वो ऐसा क्यों कर रहा है और उसकी प्रामाणिकता क्या है?
इसे मनोविज्ञान की भाषा में ‘फुट इन द डोअर’ मनस्थिति कहा जाता है। कुल मिलाकर साइबर अपराधी मानव मनोविज्ञान का दोहन करके आपसे आपके पसीने की कमाई लूट लेते हैं और आप बेबस होकर लुटते जाते हैं। ऐसा करते वक्त साइबर अपराधी के मन में कोई समानुभूति नहीं होती कि वो जिसे अपना शिकार बना रहे हैं, वो कौन है और अपना सब कुछ गंवाने के बाद उसकी मानसिक स्थिति क्या होगी?
इससे बचने का एक ही तरीका है कि ऐसा कोई भी फोन आए, आप अपना मानसिक संतुलन न खोएं और सामने वाले द्वारा दिए जाने वाले आदेशों को बिना सोचे समझे फाॅलो करने से बचें। यथा संभव ऐसे किसी भी फोन काॅल के बारे में परिजनो, मित्रो अथवा पुलिस से शेयर करें। एक क्षण ठंडे दिमाग से सोचना आप को डिजिटल अरेस्ट से बचा सकता है।
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