OSS को लेकर आशंकाओं में घिर गए थे हैरी ट्रूमैन
द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद यह सवाल उठा कि अब OSS का क्या किया जाए? इस पर उस वक्त के अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने कहा कि हम इसे रखकर American Gestapo (Political Police) का जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। American Gestapo उन्होंने जर्मन नाजी के संदर्भ में कहा था। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जर्मनी के पास एक सीक्रेट इंटेलिजेंस एजेंसी थी, जिसका नाम Gestapo था। इसने हिटलर के समय जर्मनी में राजनीतिक मानदंडों को लागू करके तानाशाही को मजबूत किया था। हैरी ट्रूमैन OSS को रखकर इस तरह का जोखिम नहीं लेना चाहते थे।
ट्रूमैन को इस बारे में पता था कि OSS ने युद्ध जिताने में जरूर काफी मदद की है, लेकिन इसके लोकतांत्रिक ढंग से न चुने गए अधिकारियों के हाथों में काफी ज्यादा शक्ति और सीक्रेट इंफॉर्मेशन है, जो कि अमेरिकी लोकतंत्र के लिए काफी खतरनाक साबित हो सकती है। हालांकि, इन सबके बीच ट्रूमैन ने इस संस्था को आधिकारिक तौर पर तो समाप्त कर दिया, लेकिन यह इतना आसान काम नहीं था।
OSS से CIA का सफर
द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद दुनियाभर में एक बेहद ही शांत दौर चल रहा था। कई देश आजाद हो रहे थे। इस समय शीत युद्ध की भी शुरुआत नहीं हुई थी। कुछ सालों के अंतराल के बाद अचानक अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव के दौर की शुरुआत हो जाती है। दोनों महाशक्तियां एक-दूसरे को शक की निगाहों से देख रही थीं।
इन सबके बीच OSS में काम कर चुके कई इंटेलिजेंस के लोग दोबारा किसी केंद्रीकृत इंटेलिजेंस एजेंसी के पुनः उत्थान की बात करने लगे ताकि इस नए युद्ध में सोवियत संघ को हराया जा सके। हालांकि, इस पर कई कांग्रेस सदस्यों ने यह कहा कि इस तरह की सेंट्रलाइज्ड इंटेलिजेंस एजेंसी की कोई जरूरत नहीं है। हमारा संविधान इस तरह से नहीं बना है कि हम दोबारा OSS की तरह इतनी ज्यादा शक्ति कुछ ऐसे लोगों के हाथों में दें, जो लोकतांत्रिक ढंग से चुने नहीं गए हैं। ऐसा करने से देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर चोट पहुंचेगी।
अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव की स्थिति लगातार बढ़ती जा रही थी। इन सब को देखते हुए हैरी ट्रूमैन का मन बदलता है और वह National Security Act के तहत CIA यानी Central Intelligence Agency की शुरुआत करते हैं। CIA की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा कि हमें इसको लेकर ध्यान रखना होगा कि हमारे पास कोई American Gestapo न हो।
शीत युद्ध के समय CIA अमेरिका के लिए एक नया हथियार था। अमेरिका और सोवियत संघ के बीच चल रहे शीत युद्ध में ये दोनों देश प्रॉक्सीज के माध्यम से एक-दूसरे के साथ लड़ रहे थे। इन सबके बीच CIA दुनिया के कई देशों में शासन परिवर्तन, चुनावों में धांधली, और कोवर्ट ऑपरेशन्स करवा रहा था। फेहरिस्त काफी लंबी है। आइए देखते हैं CIA के कुछ चुनिंदा रिजीम चेंज ऑपरेशन्स के बारे में -
1948: इटली के चुनाव
CIA ने इटली के 1948 के चुनावों में शामिल होकर इस बात को सुनिश्चित किया कि उसकी सहयोगी पार्टी चुनाव जीते।
1953: ईरान - ऑपरेशन Ajax
1953 में ऑपरेशन Ajax के तहत CIA और MI6 ने ईरान में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार को हटा दिया। इसकी जरूरत क्यों पड़ी? ईरान अपनी ऑइल इंडस्ट्री का राष्ट्रीयकरण करना चाहता था, लेकिन उस समय ब्रिटेन का एक बड़ा स्टेक ईरान की ऑइल इंडस्ट्री में था। ब्रिटेन का कहना था कि ईरान में ऑइल फील्ड की खोज उसने की थी, इस कारण इस पर पहला हक ब्रिटेन का है।
ब्रिटेन ईरान में मौजूद तेल को बेचकर जितना पैसा कमाता था, उसका केवल 16 फीसदी हिस्सा वह ईरान को देता था। ईरान से निकले तेल को बेचकर कितना रेवेन्यू आया है, इन सबका ऑडिट उस समय ब्रिटेन में होता था। हालांकि, ईरान के प्रधानमंत्री चाहते थे कि इसका ऑडिट उनके देश में हो ताकि पारदर्शिता बनी रहे। यह बात CIA और ब्रिटेन को पसंद नहीं आई, तो दोनों ने मिलकर ऑपरेशन Ajax की शुरुआत कर दी।
CIA के एक डिसक्लासिफाइड डॉक्यूमेंट के मुताबिक, उन्होंने ईरान में सरकार गिराने के लिए एक डिसइंफॉर्मेशन कैंपेन चलाया। बड़े स्तर पर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू कराया गया। ईरान के बड़े सैन्य अधिकारियों को रिश्वत देकर खरीदा गया और अंत में सेना की मदद से ईरान में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार को गिरा दिया गया।
1954 ग्वाटेमाला
1954 में CIA ने ग्वाटेमाला में तख्तापलट करवाया। इस दौरान अमेरिका के कुछ निजी कॉरपोरेशनों का प्रभाव CIA में काफी बढ़ गया था और CIA उनके लिए काम कर रहा था।
1960 कॉन्गो
60 के शुरुआती दशक में CIA ने कॉन्गो में तख्तापलट करवाया।
1973 चिली
1973 में CIA ने चिली में शासन परिवर्तन करवाया।
1981 इक्वाडोर
1981 में CIA चाहता था कि इक्वाडोर के राष्ट्रपति हाईवे और पावर प्लांट बनाने के लिए अमेरिका से लोन लें। हालांकि, इक्वाडोर के राष्ट्रपति अमेरिका से लोन लेना नहीं चाहते थे। इसके बाद एक रहस्यमयी प्लेन हादसे में इक्वाडोर के राष्ट्रपति की जान चली जाती है। चौंकाने वाली बात यह थी कि इस प्लेन हादसे में ब्लैक बॉक्स तक नहीं मिला।
अन्य ऑपरेशन्स
इसके बाद CIA ने इंडोनेशिया, फिर ग्रीस, और अन्य देशों में भी शासन परिवर्तन करवाया। यह फेहरिस्त काफी लंबी है।
प्रोजेक्ट सेमरॉक
CIA ने 1945 से 1975 तक प्रोजेक्ट सेमरॉक भी चलाया, जिसके अंतर्गत उसने अपने ही नागरिकों की जासूसी की।
CIA की ताकत
इस समय CIA दुनिया की सबसे शक्तिशाली इंटेलिजेंस एजेंसी थी, जो कि दुनियाभर में कई सीक्रेट प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही थी। ये लोग कानूनी तौर पर व्हाइट हाउस में चुनकर आए कांग्रेस सदस्य (सांसदों) को ब्लैकमेल करते थे। यही नहीं, 60 के दशक में अमेरिका के सबसे शक्तिशाली राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की कई गुप्त सूचनाएं CIA के इंटेलिजेंस ऑफिसर्स के पास थीं।
इन्हीं सूचनाओं का इस्तेमाल CIA के इंटेलिजेंस ऑफिसर्स अपने पर्सनल इंटरेस्ट के लिए भी करते थे। इस समय तक CIA काफी शक्तिशाली बन गया था।
साल 1963 में जॉन एफ कैनेडी की अचानक मौत हो जाती है, उसके 1 महीने के बाद हैरी ट्रूमैन ने वाशिंगटन पोस्ट में लिखा - "Limit CIA Role to Intelligence” इंटेलिजेंस में सीआईए की भूमिका पर जल्द से जल्द लगाम लगाई जानी चाहिए। CIA के ऑपरेशन्स लगातार दुनियाभर में हलचल पैदा कर रहे थे। कोवर्ट मिशन करने के साथ-साथ CIA प्रोजेक्ट सैमरॉक जैसे गुप्त अभियान चलाकर अपने ही देश के लोगों की जासूसी कर रहा था।
70 के दशक में वियतनाम में जो कुछ हुआ, उसको लेकर लोग सरकार के खिलाफ हो गए थे। 1970 के दशक तक आते-आते अमेरिकी लोगों को पता चल गया था कि ये सीक्रेट एजेंसी उनकी जासूसी कर रही है। इसी की जांच करने के लिए साल 1975 में चर्च कमेटी बनाई गई, जिसका काम CIA, FBI, NSA और दूसरी इंटेलिजेंस एजेंसियों के गलत कामों की जांच करनी थी।
जांच के बाद 10 हजार सीक्रेट डॉक्यूमेंट्स साझा किए गए। इनमें Project SHAMROCK और COINTELPRO जैसे सीक्रेट ऑपरेशन्स के बारे में पता चला। चर्च कमेटी की रिपोर्ट में CIA द्वारा फिदेल कास्त्रो को मारे जाने की साजिश, मार्टिन लूथर किंग जूनियर पर जासूसी, ये सब चीजें सामने आईं।
चर्च कमेटी ने बताया कि सरकार में गैर लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए ऐसे अधिकारी हैं, जिनके पास इतनी ज्यादा शक्ति और संसाधन हैं, जिनकी मदद से वे इस तरह के सीक्रेट काम कर रहे हैं, जो कि अमेरिका के लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। इसको लेकर वे किसी के प्रति जवाबदेह भी नहीं हैं। चर्च कमेटी के इन खुलासों के बाद चीजों को नियंत्रित करने के लिए नए कानून और रेगुलेशन्स लाए गए। इनके काम को मॉनिटर करने के लिए नई समितियां बनाई गईं। अमेरिका के इतिहास में चर्च कमेटी की ये सुनवाई एक ऐतिहासिक घटना थी।
हालांकि, ये सब यहीं खत्म नहीं होता है। CIA के ऑफिसर्स चर्च कमेटी के मुखिया फ्रैंक चर्च से काफी नाराज थे। उन्होंने फ्रैंक चर्च पर यह आरोप लगाया कि वह KGB (सोवियत यूनियन की सीक्रेट एजेंसी) के एजेंट हैं। चर्च कमेटी के खुलासों के बाद अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसी को कानून के दायरे में बांधने की कोशिश की गई।
1978 में Foreign Intelligence Surveillance Act (FISA) पास किया गया। इसके अंतर्गत सीआईए जैसी इंटेलिजेंस एजेंसी को किसी की स्पाइंग करने के लिए कोर्ट की परमिशन लेनी जरूरी थी। इसके लिए एक स्पेशल कोर्ट भी बनाया गया। चर्च गेट की सुनवाई के बाद इन इंटेलिजेंस एजेंसियों की शक्तियों को कम कर दिया गया। इन्हें एक दायरे में काम करने के लिए फ्रेमवर्क तैयार किया गया।
9/11 हमले के बाद दोबारा मजबूत हुईं शक्तियां
11 सितंबर 2001 को अमेरिका के इतिहास की सबसे बड़ी घटना होती है। एक प्लेन सीधे आकर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से टकराता है। इस घटना में कई लोगों की जान गई। अल कायदा का यह हमला अमेरिका को हिला कर रख देता है। इस घटना के बाद दोबारा राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए CIA के सीक्रेट इंटेलिजेंस ऑफिसर्स और ब्यूरोक्रेट्स को पहले की तरह ही शक्ति दी जाती है। पर्ल हार्बर अटैक के बाद जिस तरह OSS की शुरुआत की गई थी, ठीक उसी तरह 9/11 हमले के बाद CIA को दोबारा से राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर उसकी खोई हुई शक्ति वापस कर दी गई। डीप स्टेट दोबारा से शक्तिशाली हो गया था।
साल 2013 में एडवर्ड स्नोडन ने इस बात का खुलासा किया कि 9/11 हमले के बाद अमेरिका ने global mass surveillance system बनाया। इस सिस्टम के जरिए अमेरिका ने वैश्विक स्तर पर लोगों के फोन और इंटरनेट डाटा को इकट्ठा किया। इस सिस्टम की मदद से CIA के ऑफिसर्स दुनिया में किसी भी व्यक्ति, फिर चाहे वह किसी देश का राष्ट्रपति ही क्यों न हो, उसकी सारी डिटेल्स देख सकते थे। व्यक्ति जिस स्मार्टफोन या लैपटॉप का इस्तेमाल कर रहा है, उसके कैमरे और माइक्रोफोन का एक्सेस CIA और NSA के पास होता था। NSA उस समय जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल, ब्राजील के राष्ट्रपति समेत दुनिया के कई बड़े नेताओं की जासूसी कर रहा था।
इस लीक में पता चला कि माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, फेसबुक, एप्पल, याहू जैसी सारी बड़ी टेक कंपनियां अमेरिकी खुफिया एजेंसी NSA और CIA को उनके यूजर्स का डाटा साझा कर रही थीं। माइक्रोसॉफ्ट ने PRISM सर्विलांस प्रोग्राम के तहत अपने यूजर्स के Outlook और Skype का डाटा NSA के साथ साझा किया। गूगल ने जीमेल, गूगल सर्च और यूट्यूब जैसी सर्विसेस का डाटा NSA को दिया। वहीं, फेसबुक ने यूजर्स की एक्टिविटी, उनके मैसेज और लोकेशन का डाटा NSA के साथ साझा किया था।
स्नोडन के खुलासे के बाद अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में हलचल मच गई। इसे आतंकवाद के खतरे के नाम पर किया गया, लेकिन इन डाटा का कई गलत कामों में उपयोग किया गया।
इस डाटा के दम पर अमेरिका की इंटेलिजेंस एजेंसी दुनियाभर में अपना जियोपॉलिटिकल एजेंडा पूरा करती है। जरूरी नहीं है कि इस एजेंडा के पीछे अमेरिका फर्स्ट की नीति ही काम करती है कई बार निजी कॉर्पोरेशन, जिनके अच्छे संबंध अंदर होते हैं उनके उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भी डीप स्टेट काम करता है। कहा जाता है कि बड़े डीफेंस कॉन्ट्रैक्टर्स का काफी प्रभाव डीप स्टेट में है। ऐसे में दुनियाभर में कई जगहों पर युद्ध कराकर ये लॉबी खूब सारा पैसा कमाती है।
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