शिकार के खिलाफ जन आक्रोश
पिछले हफ्ते बलोचिस्तान लेविस फोर्स (पाकिस्तान का अर्ध सैनिक बल) की एक टुकड़ी दश्त जिले के जरीन बाग इलाके में तैनात हुई। उनका मकसद कतर के शेख परिवार के आगमन हेतु सभी बंदोबस्त का जायजा लेना था। अभी ये टुकड़ी वहां मुआयना ही कर रही थी कि एक शक्तिशाली बम धमाका हुआ जिसमें दो सैनिकों की जान चली गई और चार सिपाही जख्मी हो गए।
ये हमला पाकिस्तानी सेना पर हुआ था लेकिन इस से ये भी अंदाजा होने लगा कि स्थानीय लोगों में अरब शेखों द्वारा पाकिस्तान में आकर शिकार करने की परंपरा के खिलाफ गुस्सा पनप रहा है।
वैसे गुजरे वक्त में भी भी ऐसे कुछ हादसे हो चुके हैं। मसलन अस्सी के दशक में बलोच अलगाववादियों ने अरब शाही परिवार के काफिले पर हमला किया था। बलोचिस्तान में ही नब्बे के दशक में कतर शाही परिवार के आने से पहले उनके कैंप को आग लगा दी गई। दस साल पहले भी बलोचिस्तान के केच जिले में एक कैंप पर फायरिंग हुई थी जिसमें एक सुरक्षा कर्मी मारा गया था। खासकर बलोचिस्तान में आजादी के लिए लड़ रहे कई गुटों ने अक्सर इन अरब शेखों के काफिलों पर हमला किया है । मगर इन घटनाओं का जनता की भावना से कभी भी ज्यादा ताल्लुक नहीं रहा।
लेकिन तीन साल पहले जब सिंध प्रांत में नाज़िम जोखियो नाम के युवा की हत्या का मामला सामने आया तो इस शिकारी प्रवृत्ति पर कई सवाल खड़े होने शुरू हो गए। हत्या का कारण ये था कि उस नौजवान ने अपने गांव के पास तल्लूर के शिकार को लेकर विदेशी क़ाफ़िले का एक वीडियो बनाया जिसके चलते वहां के स्थानीय नेता ने उसे धमकी दी। अगले दिन एक फॉर्महाउस से उसकी लाश बरामद हुई। नतीजन सिंध के विभिन्न हिस्सों में लोगों ने बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शन किया और तल्लूर के शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की।
प्रकृति और वन जीवन के सरंक्षण में रुचि रखने वाले लोगों को भी इस शिकार से गहरी आपत्ति है क्योंकि पिछले कुछ सालों में ना केवल इस दुर्लभ पक्षी की संख्या में भारी कमी आई है बल्कि उनके पारंपरिक आवास स्थल भी अब सिकुड़ने लगे हैं। इसी के चलते सन 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस शिकार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था और पाकिस्तान सरकार को निर्देश दिया कि वो खाड़ी देशों को जारी किए हुए सभी परमिट को निरस्त कर दें।
मगर सरकार ने कूटनीतिक कारणों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दायर की जिसके बाद पांच सदस्य बेंच ने राष्ट्रीय हित में शिकार पर प्रतिबंध हटाने का फैसला सुना दिया।
हालांकि शेख परिवारों की तरफ से इन सभी विवादों पर कभी भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। शायद उनका नजरिया हमेशा ये रहा है कि उन्हें शिकार करने का पूरा हक है क्योंकि वो इस पूरे बंदोबस्त की पाकिस्तान सरकार को मनचाही कीमत अदा कर रहें है। हां, ये जरूर हुआ है कि पिछले कुछ सालों में इन शाही शेख परिवारों ने पाकिस्तान के दूर दराज इलाकों को बुनियादी जरूरतें उपलब्ध कराने की कोशिश की है।
मिसाल के तौर पर दक्षिण पंजाब के रहीम यार ख़ान जिले में हवाई अड्डा संयुक्त इमीरात के सुल्तान शेख़ ज़ायद ने बनवाया था। इसी प्रकार बलोचिस्तान के पसनी क्षेत्र में कतर के शेख ने स्कूल और पानी का बंदोबस्त करवाया है। इसके अलावा इन परिवार की खिदमत करने वाले स्थानीय लोगों को दिलखोल कर कीमती पुरस्कार और बख्शीश दी जाती है।
इसमें कोई शक नहीं कि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है और सरकार के लिए बिना अरब देशों की मदद लिए अपने देश को सुचारू रूप से चलाना नामुमकिन है। इसके अलावा इस्लामिक दृष्टिकोण से भी खाड़ी मुल्क खासकर सऊदी अरब की पाकिस्तान के समाज पर अच्छी खासी पकड़ है। ऐसे में शेख परिवार के शौक और मांगों को पूरा करने में ही पाकिस्तान का फायदा है।
और इसलिए ये लगभग तय है कि पाकिस्तान में कूटनीति की चौखट पर इन बेचारे परिंदों की बलि यूं ही चढ़ती रहेगी।
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