मैसी के भारत दौरे से आखिर किस चीज का प्रमोशन हुआ?
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आखिर इस दौर का उद्देश्य क्या था?
लेकिन मैसी के दौरे के पीछे मकसद क्या था? क्या यह भारत में फुटबॉल को नए सिरे से लोकप्रिय बनाने के कैम्पेन का हिस्सा है या फिर ‘ग्रेट प्लेयर टूरिज्म’ का नया चोंचला है अथवा नामी खिलाडि़यों को भारत दर्शन करवाकर भारतीयों की जेब ढीली करवाने का नया पैंतरा है? GOAT दौरे के आयोजक शतद्रु दत्ता के बारे में कहा जा रहा है कि वो इवेंट मैनेजमेंट कंपनी चलाते हैं और खेलों के रसिया हैं। ऐसे आयोजन पहले भी करते रहे हैं और पूर्व भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान सौरव गांगुली के करीबी हैं। शतद्रु की अपनी सम्पत्ति का खुलासा अभी नहीं हुआ है, लेकिन मैसी के इस दौरे में अरबों के वारे-न्यारे हुए हैं, इसमें संदेह नहीं।
यूं भारत में फुटबॉल का इतिहास डेढ़ सौ साल से ज्यादा पुराना है। देश में पहला फुटबॉल क्लब 1872 कोलकाता में रजिस्टर्ड हुआ था। लेकिन देश में फुटबॉल का विकास और प्रगति उस तरह से कभी नहीं हुई, जैसी कि अपेक्षित थी। 1948 के लंदन ओलम्पिक भारतीय फुटबॉल टीम नंगे पैर ही मैदान में उतरी थी, क्योंकि उसके पास जरूरी जूते ही नहीं थे। इसके बाद टीम पर बैन लगा दिया गया था। भारत में फुटबॉल लोकप्रिय खेल है।
देश में 122 फुटबॉल स्टेडियम भी हैं, लेकिन खेल का स्तर बहुत ही नीचा है। फीफा वर्ल्ड रैंकिंग में भारत का नंबर दुनिया में 142 वां है। भारतीय टीम फीफा कप तो क्या एशिया कप के लिए भी क्वालिफाई नहीं कर पाती। GOAT इंडिया के आायोजन पर कुल कितने रुपये खर्च हुए यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन फुटबॉल प्रेमियों को यह जानकर हैरानी हो सकती है कि भारत सरकार ने देश में फुटबॉल के लिए पिछले साल बजट में 8.78 करोड़ रुपये दिए थे और अखिल भारतीय फुटबॉल फेडरेशन उसमें भी केवल 4 करोड़ रुपये साल भर में खर्च कर सका था। जबकि GOAT दौरे में इससे कई गुना ज्यादा खर्च हो गए।
इसमें दो राय नहीं कि लियोनेल मैसी दुनिया के महानतम फुटबॉल खिलाडि़यों में से हैं। वो अब तक 46 टीम ट्रॉफियां जिता चुके हैं। 600 मिलियन डाॅलर की सम्पत्ति के मालिक मैसी एक परोपकारी भी हैं और अर्जेंटीना में अपने पिता के साथ टैक्स फ्रॉड के मामले में भी फंस चुके हैं। बेहतर होता कि मैसी के नाम पर महंगा तमाशा करने की जगह इतना पैसा भारत में फुटबॉल के जमीनी स्तर पर विकास और विस्तार पर खर्च किया जाता। क्रिकेट की तर्ज पर एक व्यापक फुटबॉल नेटवर्क खड़ा कर ग्रामीण प्रतिभाओं को तराशकर उन्हें भारतीय फुटबॉल टीम में शामिल करने का व्यापक कार्यक्रम चलाया जाता। गांव-गांव में फुटबॉल क्लब और अकादमियां खड़ी कर ग्रामीण स्तर से राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉल टूनामेंट आयोजित किए जाते। ऐसा नहीं है कि अभी कुछ नहीं हो रहा है। लेकिन जो हो रहा है, वो नाकाफी है।
मैसी के भारत दौरे से आखिर किस चीज का प्रमोशन हुआ?
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मैसी के इस प्रायोजित दौरे की कई नामी भारतीय खिलाडि़यों ने आलोचना की है। भारत के ओलंपिक में स्वर्ण पदक विजेता शूटर अभिनव बिंद्रा ने सवाल किया कि क्या एक समाज के तौर पर हम खेल संस्कृति बना रहे हैं या फिर किसी दूसरे देश की खेल शख्सियत का उत्सव मना रहे हैं? मैसी का जयगान करने के बाद अब समय आत्मनिरीक्षण का है। ओलंपियन पहलवान विनेश फोगाट ने कहा कि ‘मैं उम्मीद करती हूं कि कोई तो वक्त आएगा, जब सिर्फ एक दिन के लिए नहीं, बल्कि हर दिन के लिए हम सचमुच खेल के लिए जाग सकेंगे।
भारतीय फुटबॉल टीम के पूर्व कप्तान बाइचुंग भूटिया ने भी कोलकाता के आयोजन की कड़ी आलोचना की है। सवाल यह भी है कि हमने भले मैसी को भारत बुला लिया हो, लेकिन अर्जेंटीना ने कभी किसी नामी भारतीय खिलाड़ी को इस तरह बुलाकर सम्मानित किया? क्रिकेट वहां खेला नहीं जाता, लेकिन क्या कोई भारतीय हाॅकी अथवा अन्य खिलाड़ी भी इस लायक नहीं समझा गया?
दरअसल जहां वैश्विक स्तर के खिलाडि़यों की फसल तैयार की जाती है, वहां ऐसे तमाशों की जगह ठोस काम ज्यादा होता है और वहां की जनता भी तमाशबीन बनने की जगह नायकों को पैदा करने में भरोसा करती है। बेहतर तो यह होता कि मैसी जैसा कोई शानदार खिलाड़ी भारतीय फुटबाॅल खिलाडि़यों के लिए कोच और मार्गदर्शक के रूप में नियुक्त किया जाता।
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