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पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव: यहीं से तय होगा माकपा का भविष्य

सार

पिछले पंचायत चुनाव के परिणाम पर अगर नजर डालें तो तस्वीर साफ हो जाती है। जिला परिषद की कुल 825 सीटों में से माकपा को एक भी सीट नहीं मिली थी। कांग्रेस को छह सीटें मिली थी। पंचायत समिति की नौ हजार से भी अधिक सीटों में से माकपा को कुल 111 सीटें मिली थी। इस बार बदलाव आने की उम्मीद बनी है।
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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव - फोटो : Twitter
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विस्तार
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पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव 8 जुलाई को होना है और उसके परिणाम 15 जुलाई को आ जाएंगे। यही तय करेंगे कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) को अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन का कितना हिस्सा वापस करने में कामयाबी मिली है। क्योंकि 2021 के विधानसभा के चुनाव के बाद से माकपा की ताकत दिन-ब-दिन कमजोर होती गई है।

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मौजूदा विधानसभा में माकपा का एक भी विधायक नहीं है। पश्चिम बंगाल से माकपा का कोई सांसद भी नहीं है। इन दो वर्षों में तस्वीर कुछ बदली है। दरअसल उम्मीद की किरण इसलिए दिख रही है क्योंकि इस बार के पंचायत चुनाव में माकपा के करीब 49 हजार और सहयोगी कांग्रेस के 18 हजार उम्मीदवार चुनावी मैदान में मौजूद है। जबकि भाजपा के 57 हजार उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं।

पिछले पंचायत चुनाव के मुकाबले सिर्फ उम्मीदवार ही उल्लेखनीय नहीं है बल्कि पूरे दमखम के साथ चुनाव भी लड़ रहे हैं। यह स्थिति इसलिए बनी है क्योंकि माकपा के जमीनी स्तर के कार्यकर्ता तृणमूल समर्थकों की हिंसा का मुकाबला कर रहे हैं। जब उन्हें पुलिस वाले परेशान करते हैं तो वे थाने के सामने जमा होकर प्रतिवाद करते हैं। पश्चिम बंगाल में अब तक हुई चुनावी हिंसा में करीब 15 लोग मारे जा चुके हैं फिर भी विपक्ष मजबूती के साथ मुकाबला कर रहा है।

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पिछले पंचायत चुनाव से अलग है स्थिति

पिछले पंचायत चुनाव में ऐसी स्थिति नहीं थी। भाजपा सहित पूरे विपक्ष ने कमोबेश सरेंडर कर दिया था। पिछले पंचायत चुनाव के परिणाम पर अगर नजर डालें तो तस्वीर साफ हो जाती है। जिला परिषद की कुल 825 सीटों में से माकपा को एक भी सीट नहीं मिली थी। कांग्रेस को छह सीटें मिली थी। पंचायत समिति की नौ हजार से भी अधिक सीटों में से माकपा को कुल 111 सीटें मिली थी। इस बार बदलाव आने की उम्मीद बनी है।

इसकी वजह यह है कि माकपा की शक्ति तो भाजपा के अंदर निहित है और अब इसकी वापसी की प्रक्रिया शुरू हो गई है। जब केंद्र में भाजपा की सरकार बनी तो तृणमूल कांग्रेस के सरकार की दमन से त्रस्त माकपा और कांग्रेस के समर्थक भाजपा की शरण में चले गए थे। इसलिए बंगाल में यह मुहावरा काफी प्रचलित हुआ था कि पहले राम फिर वाम। अब राम से वाम की तरफ जाने की राह खुल गई है। 
 

अगर 2016 और 2021 के विधानसभा चुनाव के परिणाम पर एक नजर डालें तो राम-वाम की तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाती है। 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को करीब 11 फीसदी, माकपा को 20 फीसदी और कांग्रेस को 12 फीसदी वोट मिले थे। 2021 के विधानसभा चुनाव में स्थिति पूरी तरह बदल गई। भाजपा को  38 प्रतिशत वोट मिला था। माकपा को पांच प्रतिशत और कांग्रेस को तीन प्रतिशत वोट मिले थे। यानी माकपा और कांग्रेस ने 24 फीसदी गवाया था तो भाजपा के वोट में 27 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई थी। अब इन समर्थकों की वापसी का कयास दो कारणों से लगाए जा रहे हैं। 


पहला तो यह है कि विपक्ष इस बार काफी मजबूत स्थिति में है। दूसरी वजह तृणमूल कांग्रेस नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप। शिक्षक नियुक्ति घोटाले में एक मंत्री, कई विधायक, तृणमूल कांग्रेस के नेता और शिक्षा विभाग के अफसर इन दिनों विभिन्न जेलों में बंद है। केंद्र सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप के कारण राज्य सरकार को मनरेगा के तहत दिया जाने वाला फंड बंद कर दिया है। हाईकोर्ट ने इसकी जांच सीएजी को सौंपी है। इस वजह से लोगों को सौ दिन की रोजगार योजना के तहत रोजगार नहीं मिल रहा है।

प्रधानमंत्री आवास आवास योजना में भी घोटाले के आरोप लगे हैं। पंचायत चुनाव में इन मुद्दों का खासा असर पड़ सकता है। इस वजह से तृणमूल कांग्रेस की सरकार बचाव की मुद्रा में आ गई है और विपक्ष के हमले की धार तेज हो गई है। 

माकपा की राज्य कमेटी के सचिव मोहम्मद सलीम कहते हैं कि इस बार के चुनावी मुकाबले में जो संकेत मिल रहे हैं वह पिछले चुनाव में नहीं दिखे थे। इस पंचायत चुनाव का एक और पहलू है जो अन्य राज्यों में देखने को नहीं मिलेगा। कुछ पंचायत सीटों पर तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए माकपा, भाजपा और कांग्रेस एक ही कतार में नजर आ रही हैं।

प्रदेश स्तर के सभी नेता कहते हैं कि इस तरह का तालमेल हो ही नहीं सकता है। स्थानीय स्तर पर अगर  होता है तो अलग बात है। कई सहकारी समितियों के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार को इसी तरह हराया गया है। अब देखना है कि पंचायत चुनाव में भी क्या इस तरह का गठजोड़ होता है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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