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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: जेन कैंपियन- नारीवादी निर्देशक

सार

जेन कैंपियन की फिल्म ‘द पियानो’ 1993 में प्रदर्शित हुई। यह एक अनोखी एवं जटिल फिल्म है। सृजनात्मकता, एकाकीपन और पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की भावनाओं और शारीरिक दमन तथा कलात्मकता द्वारा स्व-अभिव्यक्ति को दिखाने में कुशल जेन कैंपियन इस फिल्म में भी इन्हीं बातों को उभारती हैं। इस फिल्म को ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका में तमाम पुरस्कार प्राप्त हुए।
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जेन कैंपियन- फिल्म निर्देशक - फोटो : Twitter
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विस्तार
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गिलियन आर्मस्ट्रॉन्ग को अपना आदर्श मानने वाली जेन कैंपियन न्यूजीलैंड से आती हैं। विश्वभर में उनकी बनाई फिल्म ‘द पियानो’ की धूम है। शीर्ष नारीवादी फिल्मों में इसकी गिनती होती है और नारीवादी फिल्म अध्ययन के लिए सब स्थानों पर इस फिल्म ‘द पियानो’ का प्रयोग किया जाता है।

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इन्होंने ऑस्ट्रेलिया में फिल्म निर्माण का प्रशिक्षण लिया और जब इनकी पहली फिल्म ‘स्वीटी’ कान फिल्मोत्सव में दिखाई गई तो उसकी खूब चर्चा हुई और जेन को एक गंभीर फिल्म निर्देशक के रूप में स्वीकार कर लिया गया। ‘स्वीटी’ दो बहनों की कहानी है जिसमें दोनों बहनें स्वभाव में एक-दूसरे से सर्वथा विपरीत हैं। यह परिवार के भीतर आवेश और तनाव की कहानी है। 


टेलीविजन के बाद फिल्मों में कदम

भावनाओं और मानसिक स्थिति को बयान करने में कुशल जेन कैंपियन ने 1990 में पहले टेलीविजन के लिए और बाद में फीचर फिल्म के रूप में ‘एन एंजेल एट माई टेबल’ बनाई। यह फिल्म न्यूजीलैंड की एक सर्वाधिक प्रसिद्ध लेखिका जेनेट फ्रेम की आत्मकथा पर आधारित है और पूरी तौर पर इसकी शूटिंग न्यूजीलैंड में ही हुई।

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आत्मकथा तीन भागों में है, तीनों को मिलाकर फिल्म बनी है। मोटी, भद्दी, बेढ़ंगे दांतों वाली लड़की कविता लिखकर जेनेट फ्रेम अपने एकाकीपन में चैन पाती है। उसकी दो बहनें एक दुर्घटना में पानी में डूबकर मर जाती हैं, वह खुद आत्महत्या का प्रयास करती है। उसे आराम करने के लिए मानसिक अस्पताल भेज दिया जाता है, जहां आठ साल की अवधि में उसे गलत निदान के कारण खंडित व्यक्तित्व का  मरीज घोषित कर इलाज के नाम पर 200 बार से अधिक बिजली के झटके दिए जाते हैं।

फिल्म को हृदय के निकट लाने के लिए जेन कैंपियन ने बहुत सारे तकनीकि उपकरणों तथा कई शैली का प्रयोग किया है। नायिका के लिए विभिन्न उम्र की तीन अलग-अलग अभिनेत्रियां उन्होंने ली हैं। जेन कैंपियन लेखिका जेनेट फ्रेम की ओर इसलिए आकर्षित हुईं, क्योंकि उनका अपना बचपन कुछ इसी प्रकार की कठिनाइयों से हो कर गुजरा था।

1993 की क्लासिक फिल्म ‘द पियानो’

मगर जेन कैंपियन को असली प्रसिद्धि 1993 में बनाई अपनी अगली फिल्म ‘द पियानो’ से मिली। निजी तौर पर यह उनके लिए खुशी और गम का मिला-जुला समय था। यह फिल्म जब कान उत्सव में दिखाई गई तो इसे पुरस्कार के साथ-साथ एक मास्टरपीस का दर्जा भी दिया गया। जेन ने इस फिल्म के निर्देशन के दौरान, इस फिल्म के सेकेंड यूनिट डॉयरेक्टर कोलीन एंग्लर्ट से विवाह किया था। जेन उस समय गर्भवती थीं। उन्हें बेटा जेस्पर पैदा हुआ, जो केवल बारह दिन जीवित रहा। यह उनके लिए भारी सदमे का समय था। मगर वे काम में जुटी रहीं।

संकेतों-बिंबों में अपनी बात कहने वाली जेन कैंपियन ने हेनरी जेम्स के प्रसिद्ध उपन्यास ‘पोर्ट्रेट ऑफ अ लेडी’ पर खूब स्वतंत्रता लेते हुए एक फिल्म बनाई। इनकी साहित्यिक कृति से स्वतंत्रता लेने की खूब जम कर आलोचना हुई। इसमें नायिका इसाबेल की भूमिका निकोल किडमैन ने की है।

जेन कैंपियन ने इस आलोचना की बहुत परवाह न की और अपनी अगली फिल्में ‘होली स्मोक’ तथा ‘इन द कट’ बना डाली जिन्हें कान फिल्मोत्सव में खूब प्रशंसा मिली।

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फिल्म द पियानो- तमाम पुरस्कारों से सम्मानित - फोटो : Twitter
पांच साल की मेहनत के बाद जेन कैंपियन की फिल्म ‘द पियानो’ 1993 में प्रदर्शित हुई। ‘द पियानो’ एक अनोखी एवं जटिल फिल्म है। सृजनात्मकता, एकाकीपन और पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की भावनाओं और शारीरिक दमन तथा कलात्मकता द्वारा स्व-अभिव्यक्ति को दिखाने में कुशल जेन कैंपियन इस फिल्म में भी इन्हीं बातों को उभारती हैं। इस फिल्म को ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका में तमाम पुरस्कार प्राप्त हुए।

जेन कैंपियन ने खुद इस फिल्म की पटकथा लिखी। नायिका एडा को उसके पिता ने शादी करके स्कॉटलैंड से एक दूर, अनजान देश न्यूजीलैंड भेज दिया है। एडा (होली हंटर) के साथ उसकी आठ साल की बेटी फ्लोरा (एना पाकिन) है। फिल्म का समय उन्नीसवीं शताब्दी का पांचवां दशक है, वही जब जेन के पूर्वज न्यूजीलैंड आए थे।

नए देश की जलवायु, संस्कृति-सभ्यता सब से अनजान एडा को उसका नया पति एलिसडाएर स्टेवार्ट (सैम नेल) उसके पियानो से भी दूर कर देता है। पियानो उसकी अभिव्यक्ति का एक साधन है। एडा मूक प्राणी है। उसने बिना किसी शारीरिक खामी के बोलना बंद कर रखा है। बेटी फ्लोरा उसकी एकमात्र साथिन है।

अपना पियानो वापस पाने के लिए एडा अपने शरीर का सहारा लेती है, मगर इसी कारण बेटी उससे दूर छिटक जाती है। मनुष्य के स्वभाव के श्याम पक्ष को दिखाती यह एक जटिल फिल्म है। कैसे एडा अपने पियानो और जॉर्ज बाइन्स (हार्वे केटल) प्रेम को वापस पाती है, उसके रास्ते में कौन-कौन सी बाधाएं आती हैं, यह बताने की नहीं देखने की चीज है। प्रकृति को इस फिल्म में बड़ी खूबसूरती से फिल्माया गया है। शरीर और उसकी आवश्यकता को जिस संवेदनशीलता से इसमें दिखाया गया है, वैसा बहुत कम फिल्मों में दिखाया जाता है।


जेन कैंपियन पर भारत की आध्यात्मिकता का प्रभाव

जेन कैंपियन पर भारत और भारत की आध्यात्मिकता का प्रभाव है, हालांकि वे आध्यात्म को अपनी फिल्म में हल्के ढंग से प्रस्तुत करती हैं। उनकी फिल्म ‘होली स्मोक’ इसी नाम के उपन्यास पर बनी है, जिसे जेन ने अपनी बहन एना के साथ मिलकर लिखा है। इसमें एक ऑस्ट्रेलियन स्त्री रूथ छुट्टी बिताने भारत आती है और यहां एक गुरु बाबा के संपर्क में आकर सोचती है कि उसे उसके जीवन का मकसद मिल गया है। परंतु उसे उसका परिवार पिता की बीमारी की झूठी खबर दे कर वापस बुला लेता है और उसकी डीप्रोग्रामिंग के लिए पी. जे. वाटर्स को बुलाता है। मगर रूथ जल्द ही उसे अपने प्रभाव में ले लेती है। फिल्म के अंत में रूथ अपनी मां के साथ भारत में रहती दिखाई देती है।

जेन कैंपियन की अगली फिल्म ‘इन द कट’ एक थ्रिलर है। यह फिल्म वे निकोल किडमैन को लेकर बनाना चाहती थीं, परंतु कुछ कारणवश उन्हें मेग रायन को लेना पड़ा। मेग रायन ने इस फिल्म में एक इंग्लिश टीचर फ्रैनी की भूमिका की है। यह सनकी टीचर एक किताब लिखने के लिए स्लैंग शब्द और मुहावरे इक्कट्ठे कर रही है। वह अपनी नोटबुक में लोगों की बातचीत को नोट करती रहती है।

पूरी फिल्म फ्रैनी और उसकी बहन पाऊलीन को लेकर चलती है। यह एक मर्डर मिस्ट्री है, जिसे देख कर ही इसका आनंद उठाया जा सकता है। कई हत्याओं के बाद हत्यारे का पता चलता है। फिल्म की काफी आलोचना हुई। 

जो भी हो जब नारीवादी फिल्मों की बात चलेगी जेन कैंपियन और उनकी फिल्म ‘द पियानो’ की चर्चा अवश्य होगी।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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