किस करवट बैठेगा ऊंट?
पार्टी की निगाह असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के अलावा फुरफुरा शरीफ के पीरजादा की पार्टी आईसीएफ पर भी है। यह पार्टियां अल्पसंख्यक वोटरों के सहारे ही मैदान में उतरती रही हैं। भगवा पार्टी अगले साल ऐसे दलों और नेताओं को परदे के पीछे से व्यापक समर्थन देने पर विचार कर रही है।
पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस को टक्कर देने के लिए अगले साल चुनाव के दौरान नागरिकता अधिनियम को भी अपना हथियार बनाने का फैसला किया है। इसके लिए पार्टी के तमाम नेताओं को बड़े पैमाने पर लोगों को इसके लिए आवेदन कराने का निर्देश दिया गया है। पूजा की छुट्टियां खत्म होने के बाद ही यह अभियान जोर पकड़ेगा।
दूसरी ओर, वह दुर्गा पूजा को भी सियासी हथियार बनाने का प्रयास कर रही है। इसी रणनीति के तहत इस त्योहार के यूनेस्को के अमूर्त विरासत की सूची में शामिल होने के चार साल बाद प्रधानमंत्री ने अपने 'मन की बात' कार्यक्रम की ताजा कड़ी में इसका श्रेय लेने की कोशिश की है। इस मुद्दे पर विवाद पैदा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस ने प्रधानमंत्री के इस दावे को निराधार करार दिया है। उसका कहना है कि इस मामले में केंद्र की भूमिका डाकिए की थी।
विशेषज्ञों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा शायद पिछले दो चुनावों की गलतियों से सबक लेकर समय रहते अगले चुनाव की तैयारी में जुट गई है।
राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ घोष का कहना है कि पार्टी हर बार यहां सत्ता हासिल करने के लिए पूरी ताकत झोंकती रही है। लेकिन वह कामयाबी से कोसों दूर है। इसी वजह से अबकी उसने तृणमूल कांग्रेस के अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाने की योजना बनाई है। इसके साथ ही उसने वामपंथी दलों और कांग्रेस के वोटरों से भी तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए भाजपा का समर्थन करने की अपील की है।
वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी कहती हैं कि भाजपा अब तक धार्मिक ध्रुवीकरण के सहारे ही चुनाव जीतने की रणनीति पर चल रही थी। लेकिन इससे खास फायदा नहीं होते देख कर उसने इस बार अपनी रणनीति में बदलाव किया है और बंगाल के आम लोगों का समर्थन हासिल करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। क्या उसे अगले चुनाव में इसका फायदा मिलेगा? विश्लेषकों का कहना है कि इस सवाल का जवाब तो चुनावी नतीजों से ही मिलेगा।
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