जीत के बाद पहली बार सबके सामने आईं ममता बनर्जी
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बीजेपी ने ममता पर अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण का आरोप लगाते हुए धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण का प्रयास किया। लेकिन उसका नतीजा यह रहा कि ज्यादातर सीटों पर मुकाबला सीधा हो गया और हाशिए पर रहने वाले या लेफ्ट और कांग्रेस के वोटरों ने टीएमसी का समर्थन करना पसंद किया।
इसके साथ ही जातिगत पहचान की राजनीति के तहत बीजेपी ने मतुआ, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोगों को लुभाने के लिए अपने घोषणा-पत्र में जो वादे किए उनका इस तबके पर कोई असर नहीं नजर आया। ममता ने चुनाव आयोग पर भी बीजेपी के इशारों पर काम करने का आरोप लगाया और बार-बार आखिरी कुछ चरणों के चुनाव एक साथ कराने की अपील करती रहीं। इससे विपत्ति के समय आम लोगों के साथ खड़ी रहने वाली नेता के तौर पर उनकी छवि और मजबूत हुई।
चुनाव अभियान के दौरान बीजेपी के नेताओं खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस तरह दीदी-दीदी कह कर ममता बनर्जी की खिल्ली उड़ाते रहे उसका राज्य के वोटरों पर प्रतिकूल असर पड़ा। बीजेपी की ऐसी रणनीति की वजह से खासकर हाशिए पर रहने वाले वोटरों ने उसके खिलाफ टीएमसी का समर्थ किया। मालदा और मुर्शिदाबाद जिलों को कांग्रेस को गढ़ माना जाता था। लेकिन वहां टीएमसी को जैसी कामयाबी मिली है उससे साफ है कि कांग्रेस के अलावा लेफ्ट के वोटरों ने भी अबकी बीजेपी से मुकाबले के लिए ममता का साथ दिया है।
दरअसल, बीजेपी ने अपनी पूरी रणनीति लोकसभा चुनावों की कामयाबी के आधार पर तैयार की थी। तब उसे 121 विधानसभा इलाकों में बढ़त मिली थी। अपने धुंआधार चुनाव अभियान के जरिए ही बीजेपी इस बढ़ते को दो सौ के पार या कम से कम सरकार बनाने लायक बहुमत के करीब पहुंचने की उम्मीद बांधे बैठी थी। लेकिन वोटरों ने उसकी रणनीति को नकार दिया।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि येन-केन-प्रकारेण बंगाल की गद्दी हासिल करने के प्रयास में बीजेपी के केंद्रीय नेताओं ने स्थानीय नेतृत्व को किसी भी मामले में खास तरजीह नहीं दी। बड़े पैमाने पर दलबदलुओं को टिकट दिए गए और ऊपर से बनाई रणनीति थोपी गई। इससे निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ी। यही वजह है कि ज्यादातर दलबदलू नेताओं का हार का मुंह देखना पड़ा है।
राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर समीरन पाल कहते हैं, “बीजेपी की पूरी रणनीति ही हवा-हवाई थी। जमीनी हकीकत को समझे बिना पार्टी ने कई ऐसे मुद्दे उठाए जो उस पर भारी पड़े। मिसाल के तौर पर उसने इतना जबरदस्त ध्रुवीकरण किया कि टीएमसी के साथ लगभग हर सीट पर सीधा मुकाबला हो गया।
इससे लेफ्ट और कांग्रेस के वोटरों ने बीजेपी के खिलाफ ममता का समर्थन किया। फुरफुरा शरीफ वाली पार्टी हो या असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी, वह ममता के अल्पसंख्यक वोट बैंक में वैसी सेंध नहीं लगा सकी जैसी बीजेपी ने उम्मीद की थी। इसके अलावा स्थानीय बनाम बाहरी और बांग्ला अस्मिता का मुद्दा भी बीजेपी पर भारी पड़ा। ”
अब नतीजे सामने आने के बाद बीजेपी में असंतोष उभरने लगा है और हार का ठीकरा केंद्रीय नेतृत्व पर फोड़ने की तैयारी हो रही है। बीजेपी के एक स्थानीय नेता कहते हैं, “जब चुनाव अभियान की पूरी बागडोर केंद्रीय नेतृत्व के हाथों में ही थी तो हार का जिम्मा भी उनको लेना होगा। आखिर जीतने की हालत में तो पूरा श्रेय वही लेते। ”
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