पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, ममता बनर्जी
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भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल प्रदेश के मूल चरित्र को समझने में भूल की। हिंदुस्तान विविध संस्कृतियों और आस्थाओं वाला मुल्क है । इस राष्ट्र के लोग भी संवेदनाओं के धरातल पर अलग-अलग भावुक संसार में निवास करते हैं। प्रचार की जो शैली गुजरात के मतदाता को लुभा सकती है, वह बंगाल के वोटर को नाराज़ कर सकती है। जो खांटी अंदाज़ उत्तर प्रदेश के देसी मतदाता को ठीक लग सकता है ,वह पुद्दुचेरी के मतदाता को खफा कर सकता है।
भारतीय जनता पार्टी के नियंताओं में इस सियासी परिपक्वता की कमी रही। उन्हें अब अटल बिहारी वाजपेई और लाल कृष्ण आडवाणी की शैली पर ही लौटना पड़ेगा।इसके अलावा बीजेपी को उधार के सिंदूर पर भरोसा करने का कुटैव छोड़ देना चाहिए ।किसी पार्टी के भीतर सेंध लगाकर या उसके नेताओं को ख़रीदकर अपनी पार्टी में लाने की आदत लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाती है ।प्रतिपक्ष में फूट डालो और अपनी ओर मिलाओ ,यही तो अंग्रेज करते थे। बांटो और राज करो वाली शैली अब बासी हो चुकी है।
कुल मिलाकर बंगाल का चुनाव सिर्फ़ राजनीतिक दलों के लिए एक सबक है, बल्कि लोकतंत्र की सेहत को भी एक चेतावनी है ।कोरोना काल में क्रूर तथा अमानवीय रवैया आम अवाम को पसंद नही आया। बंगाल के चुनाव ने बीजेपी को यह संदेश दे दिया है कि चौबीस घंटे चुनावी मोड में रहना किस हद तक खतरनाक हो सकता है।
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