ममता बनर्जी विक्ट्री साइन दिखाते हुए (फाइल फोटो)
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जमीन से जुड़ी हैं ममता
जाहिर सी बात है आज जिस बंगाल की संस्कृति की बात होती है, वहां की परंपराओं की बात होती है, उससे ममता जिस गहराई और मजबूती से जुड़ी हैं और जीवन के संघर्षों से तपकर जिस तरह उन्होंने अपने जीवन में सही अर्थों में कम्युनिज्म को उतारा है, वह बड़े बड़े तथाकथित कम्युनिस्टों को प्रेरणा देता है।
इसलिए सवाल ये नहीं है कि ममता बनर्जी कांग्रेसी रही हैं या तृणमूल कांग्रेसी, मूल बात ये है कि उन्होंने बचपन से संघर्ष देखा है, जमीन से जुड़ी रही हैं, वामपंथ के मूल सिद्धांतों को समझा और पढ़ा है। बेशक कालेज के दिनों में उन्होंने छात्र परिषद बनाई हो, लेकिन उनके मूल में तबके वामपंथी छात्र संगठन का चेहरा भी था।
जाहिर है 1977 में पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु की वामपंथी सरकार के आते आते ममता बनर्जी ने खूब पढ़ा, इतिहास में ऑनर्स किया, इस्लामी इतिहास में मास्टर्स किया, शिक्षा और कानून की डिग्री ली, पेंटिंग करती रहीं, कविताएं लिखती रहीं और राजनीति में एक मुखर नेता के तौर पर उभर कर सामने आईं। उन्होंने लेफ्ट को खूब पढ़ा, मार्क्स को पढ़ा, लेनिन को पढ़ा और भारतीय संदर्भों में वामपंथी आंदोलन का इतिहास और वर्तमान पढ़ा और देखा। उन्होंने काडर आधारित पार्टी की ताकत को समझा और लेफ्ट को उन्हीं की रणनीति से मात दी।
ऐसे रचा इतिहास
सबसे पहले 1984 में दिग्गज वामपंथी सोमनाथ चटर्जी को हराकर सबसे युवा महिला सांसद बनकर इतिहास रचा और फिर 2011 में उसी लेफ्ट की सत्ता को उखाड़ फेंका, जिसने 34 साल बंगाल पर राज किया, जिसके दिग्गजों में ज्योति बसु से लेकर बुद्धेव भट्टाचार्य रहे, लेकिन इस युवा और सबसे जुझारू नेता ने वामपंथ की निचली कतारों को हमेशा से प्रभावित किया।
इसी वजह से कांग्रेस से अलग होते ही नई पीढ़ी के वामपंथियों के लिए ममता भीतर ही भीतर आदर्श रहीं और चुनावों में परंपरागत लेफ्ट सिमटता चला गया। और इस बार तो ये एकदम साफ हो गया कि बंगाल ही नहीं इस वक्त केन्द्र की दक्षिणपंथी सरकार के खिलाफ अगर सचमुच कोई एक मजबूत विपक्ष बन सकता है तो वो ममता बनर्जी ही है।
जाहिर है दक्षिणपंथ के इस उभार से त्रस्त लेफ्ट के लिए और यहां तक कि बेबस हो चुकी कांग्रेस के लिए भी अब उनका साथ देने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है। सब फिलहाल अपनी वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं। कांग्रेसी, समाजवादी या विपक्ष के नाम पर सियासत करने वाली कोई भी पार्टी एक डरी सहमी सी हालत में है।
उनके भीतर अपने पुराने कुकर्मों और भ्रष्टाचार को लेकर मोदी सरकार ने पहले से ही एक डर बैठा दिया है, जाहिर है उनकी राजनीति इसलिए सिमटती चला जा रही है। लेकिन ममता बनर्जी बेदाग हैं, ईमानदार हैं और निडर हैं, ऐसे में वामपंथ भी उन्हें भीतर ही भीतर ही अपना चेहरा मानने लगा है। जाहिर है बंगाल की जीत का ये एक अहम मायना है।
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