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West bengal election result 2021: बंगाल में भाजपा चमत्कार करेगी या माकपा के हाथ रहेगी डोर?

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बंगाल के नतीजे भाजपा के बहुत सारे मंसूबे पूरे करने वाले या खंडित होने वाले रहेंगे। - फोटो : Amar Ujala
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जिस पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को देश में कोरोना संक्रमण को बढ़ाने में योगदान देने वाले बताकर देश,दुनिया में हल्ला मचा,उनके नतीजे दो मई की शाम तक काफी हद तक स्पष्ट हो जाएंगे। देश में सर्वाधिक उत्सुकता बंगाल के नतीजों और ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य को लेकर है, तो मध्य प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में इस नतीजे का कैलाश विजयवर्गीय के कद पर होने वाले असर पर चर्चा सरगर्म है। राजनीतिक विश्लेषक और अनेक भविष्य वक्ता बंगाल,असम और पूड्डूचेरी में भाजपा की सरकार बनने की संभावना देख रहे हैं,जबकि कुछ बंगाल को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।

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बहरहाल इतना तय है कि खासकर बंगाल के नतीजे भाजपा के बहुत सारे मंसूबे पूरे करने वाले या खंडित होने वाले रहेंगे। यूं देखें तो 2016 के चुनाव में महज 3 सीटें जीतने वाली भाजपा जबरदस्त बढ़त ले रही है,लेकिन उसकी मंशा सरकार बनाने से कम की नहीं है। जिसके लिए ज़रूरी है है कि उसे 148 सीटें मिले। चुनाव नतीजों के पूर्वानुमानों के लिए जिन संस्थानों ने मशक्कत की,उनसे भी स्पष्ट मत उभरकर नहीं आ पाया।

दरअसल, उसकी वजह है इस चुनाव में माकपा,कांग्रेस के गठबंधन की भूमिका। उसकी दमदार उपस्थिति जहां भाजपा को नुकसान पहुंचा सकती है, वहीं उसकी कमजोरी तृणमूल कांग्रेस को बंगाल की सत्ता से बिदा कर देगी। भाजपा को लेकर जो संभावना बन रही है,उसके मद्देनजर वह जबरदस्त बहुमत जुटाकर बंगाल में इतिहास रच सकती है। ऐसा इसलिए कि बंगाल में कांग्रेस तो कब की खत्म हो चुकी है। उसने माकपा का सहारा लिया याने वह माकपा को भी डुबो सकती है।
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माकपा की लुटिया उसके तानाशाही पूर्ण रवैए,अराजकता,हिंसा और कारोबार विरोधी माहौल के कारण डूबी थी। - फोटो : Amar Ujala
क्या है माकपा की स्थिति
यूं देखा जाए तो माकपा की लुटिया उसके तानाशाही पूर्ण रवैए,अराजकता,हिंसा और कारोबार विरोधी माहौल के कारण डूबी थी। यही सब तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में भी हुआ।ऐसे में बंगाल की जनता तृणमूल के विकल्प के तौर पर माकपा,कांग्रेस गठबंधन को चुने,इसकी संभावना बिल्कुल नहीं है। वह विकल्पहीन होने पर तो ऐसा कर सकती थी,किन्तु इन चुनावों में भाजपा के तौर पर उसके पास मजबूत विकल्प है। इसका ठोस इशारा वह लोकसभा चुनाव में कर चुकी है। यदि उसका वह मानस बरकरार रहा होगा या और मजबूत हुआ होगा तो मानकर चलिए कि बंगाल में भाजपा को 160 से अधिक सीटें मिलना भी आश्चर्यजनक नहीं होगा। हां, इस मंशा में कुछ ढुलमुल हुई तो भी 125 से 140 सीट के बीच तो वह आसानी से दे देगी।

तब यह सवाल अहम होगा कि तृणमूल और माकपा,कांग्रेस कितनी सीटें ला पाती हैं। तब भाजपा को रोकने में लिए बेमेल गठबंधन खड़ा हो सकता है। तब यह भी हो सकता है कि कांग्रेस की सीटें नाममात्र की रही और भाजपा,तृणमूल दोनों को सहारे की दरकार रही तो वामपंथी भाजपा के साथ जाना चाहेंगे। उसकी वजह यह है कि ममता राज में जितना उत्पीड़न भाजपाइयों का हुआ,उससे कहीं कम वामपंथियों का नहीं हुआ। उनकी इस मंशा का फायदा भी भाजपा को पूर्ण बहुमत दिलाने में मददगार रहेगा। साथ ही वहां माकपा और कांग्रेस दोनों के पास चमकदार चेहरे नहीं है। कांग्रेस ने तो पूरी बेरुखी के साथ ये चुनाव लडे। 

बताते हैं कि ममता राज के जुल्मों से तंग आकर अनेक स्थानों पर खांटी कम्युनिस्टों ने भी भाजपा को समर्थन दिया। उनका मानना रहा कि तृणमूल के गुंडाराज से भाजपा बेहतर तरीके से निपट सकती है।उसकी बड़ी वजह केंद्र में उसकी सरकार होना भी है। इसीलिए तृणमूल के डूबते जहाज से अनेक विधायक,सांसद कूदकर भाजपा की कस्ती में सवार हुए। यह भी भाजपा का  समर्थन बढ़ने का कारण बनेगा।
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पिछले चार दशक से बंगाल में चुनावी लड़ाई कांग्रेस और वामपंथियों के बीच होती रही है। - फोटो : ANI
क्या कहता है वोटो का गणित?
यह माना जा रहा है कि ममता विरोधी वोट तो भाजपा को जाएगा , लेकिन हिन्दू वोट एकतरफा भाजपा को शायद ही जाए। यदि यह वोट माकपा,कांग्रेस को भी मिला तो उसका सीधा असर भाजपा की सीटों पर पड़ेगा। संभवत इसीलिए कोई अनुमान भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं दे रहा है।चूंकि बंगाल में ऐसे हालात पहली बार ही बने हैं तो इसका सटीक आकलन नतीजों के साथ ही हो पाएगा। पिछले चार दशक से बंगाल में चुनावी लड़ाई कांग्रेस और वामपंथियों के बीच होती रही है। तृणमूल कांग्रेस भी कांग्रेस से निकलकर ही बनी है। यह पहली बार है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों ने वहां नए समीकरण रचे हैं,जिसकी स्पष्ट परिणीती नतीजे ही तय करेंगे।

असम को लेकर बहुत ज्यादा दुविधा नहीं है। वहां भाजपा फिर से सरकार बनाने की स्थिति में है।कांग्रेस वहां संगठनात्मक रूप से मजबूत नहीं है और क्षेत्रीय दल भाजपा को चुनौती देते नहीं लगते। फिर भले ही कांग्रेस और शेष विपक्ष ने सी ए ए को मुद्दा बनाया हो। उस मुद्दे से हिन्दू वोट भाजपा की ओर ही खिसकेगा।वहां 126 सीटों की विधानसभा में 2016 के चुनाव में भाजपा को 60, कांग्रेस को 26, असम गण परिषद को 14 और अन्य को 26 सीटें मिली थीं। इसमें ज्यादा फर्क होता नहीं दिख रहा । केरल में ज़रूर वामपंथी लौट रहे हैं। यह भी दिलचस्प संयोग है कि चार दशक के इतिहास में वहां हर बार सरकार बदल जाती है।

ये बंटवारा कांग्रेस और कम्युनिस्ट के बीच ही होता आया है। तो इस बार कम्युनिस्टों की बारी है। भाजपा वहां किसी भी चमत्कार की स्थिति में नहीं है। बावजूद इसके कि उसका वोट प्रातिशत आहिस्ता,आहिस्ता बढ़ रहा है। इस बार भी वह एक, दो सीटों से आगे नहीं बढ़ पाएगी। अलबत्ता एक बात जरूर है कि इस बार यदि भाजपा बंगाल फतह कर लेगी तो अगला पड़ाव केरल ही होगा। इस मुस्लिम और ईसाई बहुल देश के सर्वाधिक सुशिक्षित राज्य में भाजपा के लिए जनाधार बनाने में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जी जान से लगा है। जिसके परिणाम 2024 के लोकसभा और 2026 के विधानसभा में ज़रूर देखने मिलेंगे।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 
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