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कोरोना की भयावहता के बीच.. फिर भी ये दुनिया खूबसूरत है और हमेशा रहेगी

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कोरोना काल में रचनात्मक अपनी तरह से व्यथित हुई है। - फोटो : Pexels
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जिस देश में अबतक बीते 14 महीनों में करीब डेढ़ करोड़ लोग संक्रमित हो गए हों, मौत का आंकड़ा दो लाख के पार पहुंच चुका हो और यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। सिस्टम और सरकार सब फेल है, ऐसे में अगर हम साहित्य लेखन या कविता कहानी लिखने की बात करते हैं तो वह एक तरह से बेमानी करार दिया जाता है।

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दरअसल, हम जो पढ़ते हैं वो हमारे इर्द गिर्द कहीं न कहीं घट रहा होता है। वह लेख की शक्ल में भी सामने आ सकता है, रिपोर्ताज की शक्ल में भी या फिर कथा कहानी के तौर पर भी। लेकिन उस लेखन के मूल में कहीं न कहीं आज के दौर की त्रासदी, आम लोगों की चीत्कार, सरकारी अव्यवस्थाएं, सियासत के घिनौने खेल और निजी ज़िंदगी की तकलीफें होंगी। बेबसी होगी, संत्रास होगा, महामारी का खौफ और इससे जुड़ी रोजमर्रा की मुश्किलें होंगी। तो क्या आज के दौर में अब कोई और विषय रह नहीं गया है?

लेकिन क्या आप लगातार लंबे समय तक इसी त्रासदी को पढ़ सकते हैं? क्या आप इसी से जुड़ी कविताएं लगातार रच सकते हैं, कहानियां बुन सकते हैं? क्या आप सोशल मीडिया पर लगातार मौत की खबरें पढ़ सकते हैं, नमन और श्रद्धांजलियों के लिए क्या आपके पास शब्द अब कम नहीं पड़ गए हैं? क्या लगातार ऐसी सूचनाएं आपके भीतर एक खौफ, एक आतंक और जीवन के प्रति गहरी निराशा नहीं भरती हैं?

तो ऐसे में एक रचनाकार क्या करे? एक संवेदनशील और कोमल हृदय वाला लेखक, कवि या पत्रकार क्या करे? क्या वो यही सोचे कि अब दुनिया बेकार है, सबकुछ बेमानी है, लिखना पढ़ना सब व्यर्थ है, हम लिख पढ़कर क्या कर लेंगे, किसके लिए लिखेंगे, कौन पढ़ेगा। जीवन का क्या मतलब है। पता नहीं किसका नंबर कब लग जाए। ऐसी निराशा और ऐसी सोच का दिनोदिन विस्तार होता जा रहा है, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन क्या ऐसी सोच सही है?

कुछ हादसों को याद कीजिए 
याद कीजिए, जब भोपाल गैस कांड हुआ था और हजारों लोग इसके शिकार हुए थे, तब भारत भवन में जिस कविता उत्सव को लेकर इसके आयोजक और कवि-प्रशासक अशोक वाजपेयी अपने एक बयान से इस कदर आलोचनाओं के शिकार हुए कि उन्हें आजतक अपने उस बयान पर बार बार सफाई देनी पड़ती है। वो बयान था कि ‘मरने वालों के साथ कोई मर नहीं जाता’।

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इस संदर्भ की चर्चा यहां करने का मकसद सिर्फ ये है कि अगर आप काम करेंगे तो आलोचनाओं के शिकार भी होंगे। कुछ खेमे आपके खिलाफ भी होंगे। बेशक अगर बयान की बात करें तो अशोक वाजपेयी आज भी कहते हैं कि उनके बयान को गलत अर्थ में लिया गया। उनके कहने का मतलब सिर्फ यही था कि त्रासदियां होती हैं, समाज में घटनाएं होती हैं, लेकिन साहित्य या रचनात्मकता तो बरकरार रहती है।

बेशक वो घटनाएं या त्रासदी आपकी कला में, आपके लेखन में अभिव्यक्त हो, लेकिन एक रचनाकार और संवेदनशील व्यक्ति कैसे खामोश रह सकता है।इसे अब ज़रा आज के संदर्भ में देखें। भोपाल गैस कांड और कोरोना जैसी विश्वव्यापी महामारी में फर्क है। भोपाल गैस त्रासदी लापरवाहियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अमानवीय रवैये का नतीजा था जिसका दंश बरसों तक वहां के लोग झेलते रहे। 

और सबसे बड़ी बात कि वह एक क्षेत्र विशेष तक सीमित था। अबतक की तमाम महामारियों में कोरोना या कोविड-19 इतनी बड़ी त्रासदी है कि इसका मनोवैज्ञानिक असर बहुत गहराई तक दिखाई दे रहा है। एक ऐसा डर, एक ऐसी आशंका और एक ऐसी अनिश्चितता जिसने आपको भीतर तक हिलाकर रख दिया है। पिछले चौदह महीनों में सब अपनी अपनी चिंता करने को मजबूर हो गए हैं।
 

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क्या इस समय में किसी लेखक या रचनाकार को हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाना चाहिए?  - फोटो : Pixabay

परिवार, दोस्त, परिचित, नाते-रिश्तेदार या कोई भी अब आपका नहीं रहा। चिंतित सब हैं लेकिन सब के सब बेहद मजबूर। जाहिर है, सबको अपनी जान प्यारी है और अब शब्दों की संवेदना के मायने भी खोखले से हो चले हैं। वक्त बदल गया है। पहले सोशल मीडिया नहीं था, इतने टीवी चैनल नहीं थे, इसलिए आतंक और अफवाह भी इतना नहीं था। ख़बरों और सूचनाओं का इतना बड़ा नेटवर्क नहीं था। अब आपके पास मिनट मिनट की खबरें हैं – सही हो या गलत। सरकारी अव्यवस्थाएं हैं। सिस्टम की लाचारी है। बेबसी है और निराशा से भरा एक बहुत ही खतरनाक संसार सामने नज़र आ रहा है।

तो क्या किसी लेखक या रचनाकार को हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाना चाहिए? पिछले साल कोरोना काल में ढेर सारा साहित्य रचा गया। सैकड़ों कविताएं-कहानियां लिखी गईं। ऑनलाइन चर्चाएं हुईं और हरेक के केन्द्र में कोरोना रहा। कोरोना काल पर पुस्तकें लिखी गईं, मज़दूरों का पलायन भी एक विषय रहा। तकरीबन हर लेखक-साहित्यकार खुद को अभिव्यक्त करता रहा। आपदा में अवसर तलाशता रहा। लेकिन अब वो थक गया है। उसे भी लगता है कि लगातार वही वही बातें कितनी बार और क्यों लिखी जाएं। पढ़ने वाला भी ऊब चुका है और कुछ न कुछ अलग हटकर चाहता है। कुछ ऐसा लेखन जो जीवन का संचार करे, जो कहीं न कहीं आपको निराशा के इस गर्त से बाहर निकाले।

कठिन समय में चुनौतियां ज्यादा हैं 
बेशक यह बहुत ही विकट समय है। हर परिवार के आसपास कई त्रासद घटनाओं और बहुत से अपनों के खोने का दर्द भी है। लेकिन हमें इस संकट से उबरना है। अपने भीतर की ताकत को जगाना है। अपनी खूबसूरत दुनिया के एहसास को जगाना है और यह नहीं मान लेना है कि अब कुछ नहीं है। आज भी प्रेम है, सौंदर्य है, प्रकृति है, संवेदनाएं हैं, पूरी की पूरी पृथ्वी है और वो सबकुछ है जो पहले था। बस आपको इस निराशा से बाहर आकर फिर से कुछ बेहतर रचना है, कुछ अच्छे चित्र बनाने हैं, अच्छी और उम्मीदों भरी कविताएं और कहानियां रचनी हैं, अच्छा संगीत सुनना है।

घटनाएं होती रहती हैं, खबरों का संसार अपनी गति से चलता रहता है, सोशल मीडिया पर अच्छी बुरी सूचनाओं का अंबार बना रहता है। कई अपनो के, कई परिचितों के जाने का सिलसिला बेशक मन को कहीं गहरे तक आहत करता है, लेकिन हम आप बेबस हैं। व्यवस्था, सरकार और हालात को कोस सकते हैं, और कुछ नहीं कर सकते। ऐसे में एक बेहतर कल की कल्पना को जीवित रखना ही हम रचनाकारों का धर्म है। हमें इस निराशा के दौर से निकल कर एक उम्मीदों से भरी खूबसूरत दुनिया को रचना है।

हमें अब इस त्रासदी का रोना रोने से बचना है, सावधानी और सुरक्षा के बीच हमें एक सकारात्मक संगीत, ऊर्जा से भरपूर कविता और उम्मीदों से भरी कहानी रचनी है। हमें ये कोशिश करनी है कि हम भी इस स्थिति से बाहर आएं और अपने साथियों को, अपने पाठकों और श्रोताओं को भी बाहर लाएं। महामारी आई है तो जाएगी भी, लेकिन दुनिया खूबसूरत है और हमेशा रहेगी।       

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

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