क्या इस समय में किसी लेखक या रचनाकार को हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाना चाहिए?
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परिवार, दोस्त, परिचित, नाते-रिश्तेदार या कोई भी अब आपका नहीं रहा। चिंतित सब हैं लेकिन सब के सब बेहद मजबूर। जाहिर है, सबको अपनी जान प्यारी है और अब शब्दों की संवेदना के मायने भी खोखले से हो चले हैं। वक्त बदल गया है। पहले सोशल मीडिया नहीं था, इतने टीवी चैनल नहीं थे, इसलिए आतंक और अफवाह भी इतना नहीं था। ख़बरों और सूचनाओं का इतना बड़ा नेटवर्क नहीं था। अब आपके पास मिनट मिनट की खबरें हैं – सही हो या गलत। सरकारी अव्यवस्थाएं हैं। सिस्टम की लाचारी है। बेबसी है और निराशा से भरा एक बहुत ही खतरनाक संसार सामने नज़र आ रहा है।
तो क्या किसी लेखक या रचनाकार को हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाना चाहिए? पिछले साल कोरोना काल में ढेर सारा साहित्य रचा गया। सैकड़ों कविताएं-कहानियां लिखी गईं। ऑनलाइन चर्चाएं हुईं और हरेक के केन्द्र में कोरोना रहा। कोरोना काल पर पुस्तकें लिखी गईं, मज़दूरों का पलायन भी एक विषय रहा। तकरीबन हर लेखक-साहित्यकार खुद को अभिव्यक्त करता रहा। आपदा में अवसर तलाशता रहा। लेकिन अब वो थक गया है। उसे भी लगता है कि लगातार वही वही बातें कितनी बार और क्यों लिखी जाएं। पढ़ने वाला भी ऊब चुका है और कुछ न कुछ अलग हटकर चाहता है। कुछ ऐसा लेखन जो जीवन का संचार करे, जो कहीं न कहीं आपको निराशा के इस गर्त से बाहर निकाले।
कठिन समय में चुनौतियां ज्यादा हैं
बेशक यह बहुत ही विकट समय है। हर परिवार के आसपास कई त्रासद घटनाओं और बहुत से अपनों के खोने का दर्द भी है। लेकिन हमें इस संकट से उबरना है। अपने भीतर की ताकत को जगाना है। अपनी खूबसूरत दुनिया के एहसास को जगाना है और यह नहीं मान लेना है कि अब कुछ नहीं है। आज भी प्रेम है, सौंदर्य है, प्रकृति है, संवेदनाएं हैं, पूरी की पूरी पृथ्वी है और वो सबकुछ है जो पहले था। बस आपको इस निराशा से बाहर आकर फिर से कुछ बेहतर रचना है, कुछ अच्छे चित्र बनाने हैं, अच्छी और उम्मीदों भरी कविताएं और कहानियां रचनी हैं, अच्छा संगीत सुनना है।
घटनाएं होती रहती हैं, खबरों का संसार अपनी गति से चलता रहता है, सोशल मीडिया पर अच्छी बुरी सूचनाओं का अंबार बना रहता है। कई अपनो के, कई परिचितों के जाने का सिलसिला बेशक मन को कहीं गहरे तक आहत करता है, लेकिन हम आप बेबस हैं। व्यवस्था, सरकार और हालात को कोस सकते हैं, और कुछ नहीं कर सकते। ऐसे में एक बेहतर कल की कल्पना को जीवित रखना ही हम रचनाकारों का धर्म है। हमें इस निराशा के दौर से निकल कर एक उम्मीदों से भरी खूबसूरत दुनिया को रचना है।
हमें अब इस त्रासदी का रोना रोने से बचना है, सावधानी और सुरक्षा के बीच हमें एक सकारात्मक संगीत, ऊर्जा से भरपूर कविता और उम्मीदों से भरी कहानी रचनी है। हमें ये कोशिश करनी है कि हम भी इस स्थिति से बाहर आएं और अपने साथियों को, अपने पाठकों और श्रोताओं को भी बाहर लाएं। महामारी आई है तो जाएगी भी, लेकिन दुनिया खूबसूरत है और हमेशा रहेगी।
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