एक दशक पहले तक पश्चिम बंगाल की राजनीति में अहम खिलाड़ी रही कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट अबकी बार विधानसभा चुनावों में खुद को राज्य की राजनीति में प्रासंगिक बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। एक दशक से पैरों तले लगातार खिसकती राजनीतिक जमीन को बचाने की कोशिश कर रहे इन दोनों दलों के लिए यह करो या मरो की लड़ाई है, लेकिन इस गठबंधन और इनके साथ पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की पार्टी इंडियन सेक्यूलर फ्रंट (आएसएफ) के आने की वजह सत्तारुढ़ टीएमसी के साथ ही सत्ता के प्रमुख दावेदार के तौर पर उभरी भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें गहराने लगी हैं।
मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में यह गठबंधन सत्ता के दोनो प्रमुख दावेदारों यानी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के लिए खतरा बन सकता है। दरअसल, बीते लोकसभा चुनावों में लेफ्ट और काफी हद तक कांग्रेस के वोट बैंक पर भाजपा ने कब्जा कर लिया था। ऐसे में अगर अबकी यह गठबंधन बेहतर प्रदर्शन करते हुए अपनी खोई जमीन वापस हासिल करता है तो उसका खामियाजा भाजपा को ही भुगतना होगा। दूसरी ओर, अब्बासी के गठबंधन में शामिल होने की वजह से तृणमूल कांग्रेस के अल्पसंख्यक वोट बैंक में भी सेंधमारी का अंदेशा है। आईएसएफ ने खुद को मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों की पार्टी घोषित किया है।
दिलचस्प बात यह है कि शुरुआती दौर में इस गठबंधन को कोई तवज्जो नहीं देने के बावूजद अब तृणमूल और भाजपा दोनों दलों ने इस गठबंधन पर हमले तेज कर दिए हैं। तृणमूल के वरिष्ठ नेता और पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी कहते हैं कि मुख्यधारा के दो राजनीतिक दल अब जाति और धर्म की राजनीति को अपना रहे हैं। यह शर्मनाक है। उनका इशारा अब्बास सिद्दिकी की ओर है। भाजपा ने भी सिद्दिकी के साथ हाथ मिलाने पर लेफ्ट-कांग्रेस की खिंचाई की है। पार्टी के प्रवक्ता शमीक भट्टाचार्य कहते हैं, “लेफ्ट और कांग्रेस भी अब तुष्टिकरण की राजनीति पर उतर आई हैं, लेकिन लोग इसे नकार देंगे।”
लेकिन कांग्रेस और सीपीएण नेताओँ का कहना है कि उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की तर्ज पर तृणमूल कांग्रेस औऱ भाजपा ही सांप्रदायिक और धर्म के आदार पर राज्य को बांटने का प्रयास कर रही हैं और उलटे इस गठबंध पर तोहमत लगा रही हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह गठबंधन अगर कुछ मजबूती से लड़ता है तो उसे भले ज्यादा लाभ नहीं मिले, वह कइयों का खेल तो बिगाड़ ही सकता है।
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