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West Bengal Election 2021: टीएमसी और बीजेपी की चिंता का सबब बनता लेफ्ट-कांग्रेस-आईएसएफ गठबंधन

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कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट अबकी बार विधानसभा चुनावों में खुद को राज्य की राजनीति में प्रासंगिक बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं - फोटो : अमर उजाला
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एक दशक पहले तक पश्चिम बंगाल की राजनीति में अहम खिलाड़ी रही कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट अबकी बार विधानसभा चुनावों में खुद को राज्य की राजनीति में प्रासंगिक बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। एक दशक से पैरों तले लगातार खिसकती राजनीतिक जमीन को बचाने की कोशिश कर रहे इन दोनों दलों के लिए यह करो या मरो की लड़ाई है, लेकिन इस गठबंधन और इनके साथ पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की पार्टी इंडियन सेक्यूलर फ्रंट (आएसएफ) के आने की वजह सत्तारुढ़ टीएमसी के साथ ही सत्ता के प्रमुख दावेदार के तौर पर उभरी भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें गहराने लगी हैं। 

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कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे पर उपजे गतिरोध के बाद अब लेफ्ट की पहल पर इसके दूर होने और अब्बासी के गठबंधन में शामिल होने की राह खुलती नजर आ रही है। यह गठबंधन इस बार भाजपा और तृणमूल कांग्रेस से समान दूरी बरतते हुए राज्य में तीसरा विकल्प बनने के दावे कर रहा है। कोलकाता के ब्रिगेड परेड मैदान में विशाल रैली के जरिए अफने चुनाव अभियान की शुरुआत करने वाले गठबंधन को उम्मीद है कि तृणमूल औऱ भाजपा की सांप्रदायिक नीतियों से आजिज आ चुके लोग अब उस पर ही भरोसा जताएंगे। 


कांग्रेस की निगाहें मुर्शिदाबाद जिले के 22 सीटों के अलावा पड़ोसी मालदा की छह और उत्तर बंगाल की कुछ सीटो पर टिकी हैं। बीते विधानसभा चुनावो में पार्टी ने 44 सीटें जीती थीं। अबकी उसका मकसद इसमें वृद्धि करना है। इसी तरह लेफ्ट सिलीगुड़ी के अलावा दुर्गापुर-आसनसोल क्षेत्र और कोलकाता की कुछ सीटों पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने का प्रयास कर रहा है।

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अब्बास सिद्दीकी का हाथ थाम कर यह गठबंधन उत्तर व दक्षिण 24-परगना, हावड़ा, हुगली और पूर्व मेदिनीपुर जैसे तृणमूल के गढ़ में उसके लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है। इसी तरह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी अपने गढ़ मुर्शिदाबाद में तृणमूल को कड़ी चुनौती देने के लिए तैयार हैं। वैसे, लेफ्ट और कांग्रेस ने वर्ष 2016 का विधानसभा चुनाव भी मिल कर लड़ा था, लेकिन तब उसे उम्मीद के अनुरूप कामयाबी नहीं मिली थी। गठबंधन को 32.5 फीसदी वोट के साथ 70 सीटें जरूरी मिली थीं, लेकिन तीन साल बाद वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावो में जहां यह महज दो सीटो तक समिट गया वहीं उसे मिले वोट भी घट कर 11.9 फीसदी रह गए।


मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में यह गठबंधन सत्ता के दोनो प्रमुख दावेदारों यानी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के लिए खतरा बन सकता है। दरअसल, बीते लोकसभा चुनावों में लेफ्ट और काफी हद तक कांग्रेस के वोट बैंक पर भाजपा ने कब्जा कर लिया था। ऐसे में अगर अबकी यह गठबंधन बेहतर प्रदर्शन करते हुए अपनी खोई जमीन वापस हासिल करता है तो उसका खामियाजा भाजपा को ही भुगतना होगा। दूसरी ओर, अब्बासी के गठबंधन में शामिल होने की वजह से तृणमूल कांग्रेस के अल्पसंख्यक वोट बैंक में भी सेंधमारी का अंदेशा है। आईएसएफ ने खुद को मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों की पार्टी घोषित किया है।


दिलचस्प बात यह है कि शुरुआती दौर में इस गठबंधन को कोई तवज्जो नहीं देने के बावूजद अब तृणमूल और भाजपा दोनों दलों ने इस गठबंधन पर हमले तेज कर दिए हैं। तृणमूल के वरिष्ठ नेता और पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी कहते हैं कि मुख्यधारा के दो राजनीतिक दल अब जाति और धर्म की राजनीति को अपना रहे हैं। यह शर्मनाक है। उनका इशारा अब्बास सिद्दिकी की ओर है। भाजपा ने भी सिद्दिकी के साथ हाथ मिलाने पर लेफ्ट-कांग्रेस की खिंचाई की है। पार्टी के प्रवक्ता शमीक भट्टाचार्य कहते हैं, “लेफ्ट और कांग्रेस भी अब तुष्टिकरण की राजनीति पर उतर आई हैं, लेकिन लोग इसे नकार देंगे।”


लेकिन कांग्रेस और सीपीएण नेताओँ का कहना है कि उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की तर्ज पर तृणमूल कांग्रेस औऱ भाजपा ही सांप्रदायिक और धर्म के आदार पर राज्य को बांटने का प्रयास कर रही हैं और उलटे इस गठबंध पर तोहमत लगा रही हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह गठबंधन अगर कुछ मजबूती से लड़ता है तो उसे भले ज्यादा लाभ नहीं मिले, वह कइयों का खेल तो बिगाड़ ही सकता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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