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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021: जोड़ासांकू में क्या है जमीनी हाल?

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जोड़ासांकू विधानसभा महानगर कोलकाता का एक बहुत ही महत्वपूर्ण केंद्र है। - फोटो : सोशल मीडिया
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जोड़ासांकू विधानसभा महानगर कोलकाता का एक बहुत ही महत्वपूर्ण केंद्र है। इसका एक कारण यह है कि यहां ठनठनिया कालीबाड़ी जहां विश्व प्रसिद्ध है, वहीं गुरुद्वारा बड़ा सिख संगत, जहां गुरू नानक देव जी से लेकर नौवें गुरू गुरू तेगबहादुर के कदम यहां पड़ने के कारण इलाका पावन हो गया था। कवि गुरू रवींद्रनाथ टैगोर की जन्मस्थली ठाकुरबाड़ी भी यहीं मौजूद है। 

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इधर, बड़ाबाजार, पहले बगाल का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र रहा है। किसी को कपड़ा खरीदना हो, राशन-पानी, किताबें, बर्तन, पेन से लेकर कुछ भी थोक और खुदरा ग्राहक के लिए यही एक केंद्र था। बीते कुछ सालों में भले ही राज्य में व्यापारिक केंद्रों का विस्तार हो गया है, लेकिन यहां का महत्व कम नहीं हुआ। इलाके को मारवाड़ी बहुल के तौर पर भी जाना जाता है। 

भाजपा का मुख्यालय से लेकर दल की गतिविधियां भी पहले यहीं केंद्रित होती थी। अब भले ही दूसरी जगह भी मुख्यालय बना लिया गया और चुनाव में युद्द केंद्र एक पांच तारा होटल में बनाया गया है। विधानसभा केंद्र की चाबी भले ही मारवाड़ियों के हाथ रही हो, लेकिन अगर राजनीतिक तौर पर जीत कीबात करें तो 1952 में फॉरवर्ड ब्लाॅक, 1977 में जनता पार्टी ने जीती थी। इसके अलावा यह इलाका कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है। 
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1997 से लेकर 1996 तक कांग्रेस के मारवाड़ी उम्मीदवार देवकीनंदन पोद्दार 7 बार विजयी रहे। जनता पार्टी की टिकट पर चुनाव जीतने वाले विष्णुकांत शास्त्री भाजपा बनने के बाद बंगाल के बड़े भाजपा नेताओं में शामिल रहे और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भी बने। ममता बनर्जी ने 1998 में तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और बंगाल में उनका दल असली कांग्रेस बन गया। 

2001 से लेकर 2016 तक यहां तृणमूल का ही कब्जा है। 2006 के तृणमूल विधायक दिनेश बजाज को दो बार टिकट नहीं मिला, इस बार दल बदल करके भाजपा में शामिल हो गए। हालांकि भाजपा ने टिकट अपनी चार बार की पार्षद, एक बार मेयर परिषद की सदस्य रह चुकी मीनादेवी पुरोहित को बनाया है। तृणमूल कांग्रेस ने राज्यसभा सांसद, महानगर के सबसे बड़े हिंदी अखबार के प्रमुख और मारवाड़ियों में गहरी पैठ रखने वाले विवेक गुप्त को उम्मीदवार बनाया है। 
 

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पतंगों से राजनीति - फोटो : PTI
विमल सुरेका का इलाके में छापाखाना है। उनका मानना है कि वोट तो किसी को भी देना ही है, लेकिन उनकी नजर में मुद्दा कोई नहीं है। कारोबार करने वाले चाहते हैं कि उन्हें शांतिपूर्ण माहौल चाहिए, यह बीते सालों से बंगाल में कायम है। हम लोग नहीं चाहते कि माहौल बदले और किसी तरह की अशांति पैदा हो। गोविंद रावत कहते हैं कि बंगाल के हर चुनाव में कोई न कोई मुद्दा रहता है,लेकिन इस बार कोई मुद्दा नहीं है। 

इलाके में तीन  गुरूद्वारे हैं, गुरूद्वारे गुरूद्वारा छोटा सिख संगत में एक सिख श्रद्धालु गुरमीत सिंह ने बताया कि यहां ट्रांसपोर्ट कारोबार पर सिखों का कब्जा रहा है, लेकिन बीते सालों में केंद्र सरकार की नीतियों के कारण यह तबाह हो गया है। किसान आंदोलन को लेकर मोदी सरकार ने जिस तरह से हठी रवैया अपना रखा है, इलाके के सिख भाजपा को वोट नहीं देंगे। अखबार विक्रेता भी मानते हैं कि कारोबार तबाह हो गया है। 

विधानसभा चुनाव में हमेशा स्थानीय मुद्दे रहते हैं, लेकिन इलाके के कई कारोबारी मानते हैं कि केंद्र सरकार के बीते साल के फैसलों से उनका कारोबार करना मुशिकल हो गया है। कई लोगों का कहना है कि बंगाल में भाजपा की हार से केंद्र अपने गलत फैसलों पर पुनर्विचार करेगी। 

किसान आंदोलन के समर्थक कई लोगों ने बताया  कि बंगाल नतीजों की आशंका को देखते हुए किसानों से बातचीत की बातें सुनाई देने लगी हैं। एक कालेज छात्र शंकर ने बताया कि केंद्र सरकार रेलवे से लेकर बैंक, हवाई जहाज से लेकर सब कुछ निजी हाथों में सौंप रहे हैं, ऐसे में हमारे भविष्य पर अंधकार मंडरा रहा है। राज्य में भी रोजगार के अवसर नहीं दिखते और केंद्र में नौकरी के अवसर समाप्त होते जा रहे हैं। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 


 
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