पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए कांग्रेस ने जारी किया अपना घोषणापत्र
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टीएमसी और कांग्रेस के लिए चुनौती
उत्तर बंगाल के नाम से मशहूर पश्चिमी बंगाल का उत्तरी इलाका सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए साख और नाक का सवाल बनता जा रहा है। इस इलाके में हालांकि लोकसभा की आठ सीटों के तहत विधानसभा की 54 सीटें ही हैं। लेकिन बीते लोकसभा चुनावों में इनमें से 34 सीटों पर भाजपा को बढ़त मिली थी। तब भाजपा ने लोकसभा की सात सीटें जीती थीं। यही वजह है कि यह इलाका ममता बनर्जी और उनकी पार्टी की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर है। वह इलाके में अपनी पकड़ को मजबूत करने में जुटी है।
बीते लोकसभा चुनाव में यहां तृणमूल का खाता तक नहीं खुल सका था, इसलिए सत्ता की दावेदार के तौर पर उभरी भाजपा ने सत्तारूढ़ पार्टी की इस कमजोर नस पर वार करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
इस इलाके में राजवंशी, आदिवासी और गोरखा वोटरों की खासी तादाद है। इसलिए तमाम राजनीतिक दलों ने इनको लुभाने की कवायद शुरू कर दी है।
चाय बागानों वाले इस इलाके में आदिवासी चाय मजदूर दर्जन भर से ज्यादा सीटों पर किसी का भी खेल बना या बिगाड़ सकते हैं। उनको लुभाने की कवायद के तहत केंद्र सरकार ने जहां अपने बजट में बागान मजदूरों के लिए एक हजार करोड़ का प्रावधान किया है वहीं ममता बनर्जी भी इलाके में पहुंच कर सरकारी योजना के तहत मजदूरों को पक्के मकानों के कागज बांट चुकी हैं। चुनावी आचार संहिता लागू होने के बाद यह काम फिलहाल बंद है। लेकिन ममता ने इन मजदूरों की समस्याएं दूर करने के लिए बड़े-बड़े वादे किए हैं।
हाल में आए ओपिनियन पोल के मुताबिक उत्तर बंगाल में ममता बनर्जी को झटका लगता नजर आ रहा है। यहां भाजपा उसका का खेल बिगाड़ सकती है। आंकड़ों की बात करें तो तृणमूल कांग्रेस को इलाके की 14 से 18 तक सीटें मिल सकती हैं। दूसरी ओर भाजपा को 21-25 सीटें मिलने की संभावना है। कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन 13 से 15 सीटों के साथ उत्तर बंगाल में तीसरे स्थान पर नजर आ रहा है।
भाजपा भी इलाके में अपनी पकड़ और मजबूत करने में जुटी है।
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टीएमसी के लिए फायदेेमंद रहा
पिछले चुनावी नतीजों को ध्यान में रखें तो यह इलाका तृणमूल कांग्रेस के लिए कभी मुफीद नहीं रहा है। वर्ष 2016 के चुनावों में उसे महज 26 सीटें मिली थीं जबकि वर्ष 2011 में ममता की भारी लहर में भी उसे महज 16 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। इसी तरह लोकसभा चुनावों के दौरान भी पार्टी को महज दर्जन भर सीटों पर ही बढ़त मिली थी।
बीते लोकसभा चुनावों के बाद ही ममता बनर्जी इस इलाके में पार्टी की जड़ें मजबूत करने के लिए लगातार दौरे करती रही हैं। तृणमूल कांग्रेस के जिला संगठनों में गुटबाजी को ध्यान में रखते हुए ममता ने बीते साल अगस्त में ही कई कदम उठाए थे। इसके तहत कुछ नेताओं को पार्टी से निकाला गया तो कइयों को चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।
बीते साल के आखिर में उन्होंने इलाके के लिए मेडिकल कॉलेज अस्पताल समेत कई परियोजनाएं शुरू की हैं। इसके साथ ही उन्होंने हर जिले नें प्रशासनिक बैठक कर पहले से चल रही विकास परियोजनाओं का जायजा भी लिया है।
तृणमूल कांग्रेस सरकार के फैसलों ने उसके प्रति समर्थन बढ़ाया है। अलग कूचबिहार राज्य की मांग आंदोलन करने वाले ग्रेटर कूचबिहार पीपुल्स एसोसिएशन (जीसीपीए) के महासचिव बंशी बदन बर्मन कहते हैं-“राजबंशी समुदाय के लिए ममता ने जितना किया है उतना पहले कभी किसी मुख्यमंत्री ने नहीं किया था।”
कामतापुर पीपुल्स पार्टी (केपीपी) के अध्यक्ष अतुल राय भी विकास परियोजनाओं के लिए सरकार की सराहना करते हैं। लेकिन केपीपी (यूनाइटेड) के नेता निखिल राय विकास परियोजनाओं को चुनावी हथकंडा मानते हैं। उनका कहना है कि कामतापुरी भाषा को मान्यता देने और अलग कूचबिहार राज्य के गठन के मामले में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों ने चुप्पी साध रखी है।
जहां तक मुद्दों का सवाल है, इलाके में चाय बागान मजदूर और उनकी समस्याओं का मुद्दा तो बरसों से चला आ रहा है। इसके अलावा कामतापुरी औऱ कोच राजवंशी समुदाय की अपनी कई मांगें लंबे अरसे से लंबित हैं। इलाके में कोच राजवंशी और कामतापुरी तबके के वोट निर्णायक हैं।
दूसरी ओर, भाजपा भी इलाके में अपनी पकड़ और मजबूत करने में जुटी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल में कूचबिहार दौरे के दौरान पूर्व राजा के वंशज अनंत राय से मुलाकात की थी। राजनीतिक हलकों में इस मुलाकात को अहम माना जा रहा है। प्रदेश भाजपा के महासचिव सायंतन बसु दावा करते हैं कि इलाके में 42 से 45 सीटों पर पार्टी की जीत तय है।
उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर आनंद गोपाल घोष कहते हैं, “राजनीतिक दलों के लुभावने चुनावी वादे फायदे की बजाय नुकसान ही पहुंचा रहे हैं। तमाम दल सियासी फायदे के लिए धार्मिक, जातिगत और अल्पसंख्यक कार्ड खेल रहे हैं। इससे लोकतांत्रिक मूल्यों में भारी गिरावट आई है।”
लाख टके का सवाल यह है कि क्या ममता की कवायद इलाके में तृणमूल कांग्रेस के पैरों तले से खिसकी जमीन पर अंकुश लगाने में कामयाब होगी? इस सवाल का जवाब तो आने वाले दिनों में ही मिलेगा। लेकिन पिछले रिकार्ड और मौजूदा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इसकी संभावना तो कम ही है।
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