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बंगाल चुनाव 2021: नंदीग्राम के बाद सबसे ज्यादा हॉट सीट बनी भवानीपुर, जानें क्यों हो रही चर्चा

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दक्षिण कोलकाता लोकसभा सीट के तहत यहां की आधी आबादी बंगाली तो आधी पंजाबी-गुजराती-मारवाड़ी और दूसरे लोगों की है। - फोटो : सोशल मीडिया
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ममता बनर्जी का संसदीय इलाका होने के कारण भवानीपुर वर्षों से बंगाल विधानसभा में हॉट सीट माना जाता रहा है, लेकिन 34 साल के वाममोर्चा के सत्ता पलट के बाद जब उन्होंने यहां से जीत के बाद विधानसभा में जाने का फैसला किया तो इसका महत्व और बढ़ गया। परिवर्तन की लहर में  54 हजार से अधिक मतों से जीत कर जनता में अपनी पैठ साबित की, लेकिन 2016 में जीत का अंतर घट कर 25 हजार रह गया और 2021 में वे यहां से चुनाव नहीं लड़ रही हैं। रासबिहारी से अपने भरोसे के बिजली मंत्री को यहां से उम्मीदवार बनाया, उनका मुकाबला भाजपा के स्टार उम्मीदवार रुद्रनील घोष और कांग्रेस के युवा नेता शादाब खान से है।

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मिनी इंडिया के तौर पर प्रसिद्ध भवानीपुर
दक्षिण कोलकाता लोकसभा सीट के तहत यहां की आधी आबादी बंगाली तो आधी पंजाबी-गुजराती-मारवाड़ी और दूसरे लोगों की है। मिनी इंडिया के तौर पर प्रसिद्ध भवानीपुर में भी राज्य के दूसरे हिस्सों की तरह है, जहां मुद्दे गौण हो गए हैं और लोगों का मूड कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहा है।

मुख्यमंत्री के सीट छोड़ने और 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां भाजपा को बढ़त मिलने और 2015 के पालिका चुनाव में 70 नंबर वार्ड में भाजपा और 77 नंबर वार्ड में फारवर्ड ब्लाॅक उम्मीदवार की जीत के बाद इस बार विधानसभा सीट के नतीजों को लेकर कोई साफ तौर पर कुछ कहने को तैयार नहीं दिखता। 
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महानगर कोलकाता से दो पंजाबी दैनिक प्रकाशित होते थे, इसमें एक नवीं प्रभाव के पूर्व संपादक और कवि हरदेव सिंह ग्रेवाल का कहना है कि मुख्यमंत्री का इलाका होने के कारण हम लोगों को कभी भी बिजली,पानी, जलजमाव, राशन की समस्या का पता ही नहीं चला। लोडशेडिंग क्या होती है, लोग भूल चुके हैं, इसलिए अब घरों में इनवर्टर नहीं दिखते। इलाके में शांति का माहौल है और साफ-सफाई भी दूसरे इलाकों से बेहतर होती है। इलाके में एक खालसा स्कूल भी है, जहां सभी समुदाय के बच्चे पढ़ते हैं। पूर्णबंदी में भी किसी तरह की समस्या नहीं हुई। 

दूसरी ओर, कुलवंत सिंह का मानना है कि यह सीट शोभनदेव को देने का कारण यह लगता है कि तृणमूल उन्हें खुद हराना चाहती है। पास की सीट से यहां लाकर टिकट देने से दल में गुटबाजी दिख रही है, इससे तृणमूल की स्थिति कमजोर दिख रही है। 

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भवानीपुर में भी विकास का मुद्दा गौण हो गया है। - फोटो : social
कुछ अलग हैं यहां के वोटर्स
इस बार, बंगाल के चुनाव में बंगाली और बाहरी, खेला होबे के नारे धूम मचा रहे हैं। गुजराती समुदाय के रमेश का कहना है कि हम यहीं पैदा हुए और कारोबार कर रहे हैं। अब बाहरी का लेबल लगाने के कारण हमारे सामने अस्तित्व का संकट दिख रहा है। बीते सालों में कभी नहीं देखा था कि ऐसा होता है।

स्कूल-कालेज में बंगाली मित्रों की संख्या काफी थी, लेकिन अब वे हम लोगों को शक की निगाह से देख रहे हैं। गुरुद्वारा संत कुटीया के नजदीक अखबार विक्रेता यादव जी का कहना है कि लिख लो कि बाहरी-भीतरी का असर नतीजों पर पड़ेगा। इस तरह की बातें सीधे दिल को छू जाती हैं। मेरे पिता यहां पेपर बेचते थे, 20 साल से मैं यही काम कर रहा हूं।
 
तृणमूल समर्थक एक युवक यहां गांजा पार्क में बैठा था, पूछने पर कहा कि दीदी ने स्कूल शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर राशन तक सब मुफ्त कर दिया है। छात्र-छात्राओं को मुफ्त में साईकिल, टैब और उच्च शिक्षा व शादी में सरकारी मदद प्रदान की जाती है। उम्मीदवार कोई भी हो, जीत तो तृणमूल की ही होगी क्योंकि दीदी ने कहा है कि सभी 294 सीटों पर वे उम्मीदवार हैं। शकील न्यू टाउन के आईटी सेक्टर में काम करते हैं। उनका कहना है कि रोजगार पर संकट दिख रहा है, वोट तो देंगे लेकिन ऐसे उम्मीदवार को जो रोजगार की बात करे। 

तृणमूल-भाजपा-माकपा के पारंपरिक वोट उन्ही दलों का समर्थन कर रहे हैं लेकिन, कोरोना के दौरान नौकरियां गवां चुके नाराज लोगों की कमी भी नहीं। माकपा उम्मीदवार को इससे फायदा मिलने पर तृणमूल-भाजपा के समीकरण बिगड़ने की बात जग्गू बाजार के एक दुकानदार करते हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 
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