भवानीपुर में भी विकास का मुद्दा गौण हो गया है।
- फोटो : social
कुछ अलग हैं यहां के वोटर्स
इस बार, बंगाल के चुनाव में बंगाली और बाहरी, खेला होबे के नारे धूम मचा रहे हैं। गुजराती समुदाय के रमेश का कहना है कि हम यहीं पैदा हुए और कारोबार कर रहे हैं। अब बाहरी का लेबल लगाने के कारण हमारे सामने अस्तित्व का संकट दिख रहा है। बीते सालों में कभी नहीं देखा था कि ऐसा होता है।
स्कूल-कालेज में बंगाली मित्रों की संख्या काफी थी, लेकिन अब वे हम लोगों को शक की निगाह से देख रहे हैं। गुरुद्वारा संत कुटीया के नजदीक अखबार विक्रेता यादव जी का कहना है कि लिख लो कि बाहरी-भीतरी का असर नतीजों पर पड़ेगा। इस तरह की बातें सीधे दिल को छू जाती हैं। मेरे पिता यहां पेपर बेचते थे, 20 साल से मैं यही काम कर रहा हूं।
तृणमूल समर्थक एक युवक यहां गांजा पार्क में बैठा था, पूछने पर कहा कि दीदी ने स्कूल शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर राशन तक सब मुफ्त कर दिया है। छात्र-छात्राओं को मुफ्त में साईकिल, टैब और उच्च शिक्षा व शादी में सरकारी मदद प्रदान की जाती है। उम्मीदवार कोई भी हो, जीत तो तृणमूल की ही होगी क्योंकि दीदी ने कहा है कि सभी 294 सीटों पर वे उम्मीदवार हैं। शकील न्यू टाउन के आईटी सेक्टर में काम करते हैं। उनका कहना है कि रोजगार पर संकट दिख रहा है, वोट तो देंगे लेकिन ऐसे उम्मीदवार को जो रोजगार की बात करे।
तृणमूल-भाजपा-माकपा के पारंपरिक वोट उन्ही दलों का समर्थन कर रहे हैं लेकिन, कोरोना के दौरान नौकरियां गवां चुके नाराज लोगों की कमी भी नहीं। माकपा उम्मीदवार को इससे फायदा मिलने पर तृणमूल-भाजपा के समीकरण बिगड़ने की बात जग्गू बाजार के एक दुकानदार करते हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।