-इस मध्यमवर्गीय इलाके में बांग्लादेश मूल के लोग सत्ता का समीकरण बदलने की कूवत रखते हैं।
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बदला-बदला है माहौल
दमदम स्टेशन से आगे बढऩे पर बेदियापाड़ा इलाके में समीकरण बदला हुआ दिखता है। इलाके के कई बाहुबली यहां भाजपा का झंडा थाम चुके हैं। मतुआ समाज की कई बस्तियों में तृणमूल कांग्रेस को चुनौती मिलती दिख रही है। रेत, बाली, ईंट के सिंडिकेट से जुड़े युवा बदलाव की बात कह रहे हैं।
रेल पटरियों और खाल के किनारे बस्तियों में रहने वाले मतदाता कमर कस कर मतदान के दिन का इंतजार कर रहे हैं। संकरी गलियों और सड़कों वाले इस मध्यमवर्गीय इलाके में बांग्लादेश मूल के लोग सत्ता का समीकरण बदलने की कूवत रखते हैं। जिन्हें साधने में भाजपा प्रत्याशी जुटे हुए हैं।
हिंदी भाषी मतदाता बदल सकते हैं समीकरण
गोराबाजार से लेकर माल रोड तक हिंदीभाषी मतदाता किसी भी प्रत्याशी का खेल बनाने या बिगाडऩे में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए सभी राजनीतिक दल यहां हिंदी भाषी मतदताओं को अपने पाले में लाने के लिए अलग अलग रणनीति बना रहे हैं। कैंटोनमेंट इलाके के निवासी शंकर प्रसाद कहते हैं तृणमूल कांग्रेस ने इलाके के हिंदी भाषी नेताओं को प्रचार की कमान सौंप दी है। वहीं भाजपा तृणमूल कांग्रेस के पूर्व में दिए गए बाहरी बनाम बांग्लाभाषियों के बयान को आधार बनाकर हिंदीभाषियों का विश्वास जीतने में लगी हुई है। वाममोर्चा प्रत्याशी बिहार, उत्तरप्रदेश के प्रवासी श्रमिकों, टैक्सी चालकों, छोटे दुकानदारों को महंगाई जैसे मुद्दों पर अपने पक्ष में खड़ा करने के प्रयास में है।
पूर्व वामपंथी बड़ा फैक्टर
राजनीतिक विशषज्ञ देवराज देवनाथ कहते हैं कि नौकरीपेशा, पेंशनधारी, मध्यमवर्गीय मतदाताओं के प्राधन्य वाली इस विधानसभा सीट पर वामपंथी जड़ें गहरी रही हैं। ब्रात्य बसु भले ही तृणमूल कांग्रेस के विधायक रहे हों लेकिन उन्हें मिली पहली जीत में वामपंथियों का बड़ा योगदान रहा। उन्हें जिताने वाले वामपंथी वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में घरवापसी कर चुके थे लेकिन फिर भी ब्रात्य जीते लेकिन वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की इसविधानसभा सीट पर अप्रत्याशित परिणाम साबित करते हैं कि पूर्व वामपंथी भाजपा की ओर आ रहे हैं। इस बार भी ऐसा हुआ तो ब्रात्य की राह आसान नहीं होने वाली है।
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