हालत कुछ ऐसी ही है, आप ‘कोरोना’से बच सकते हैं, लेकिन वेबीनार से नहीं। एक से पल्ला छुड़ाएंगे तो दूसरा जकड़ लेगा और चाहे-अनचाहे आपके वाॅ्टसएप पर लिंक डाल देगा। कभी तो लगता है कि ‘वेबीनार शिकारी’ मानो ढूंढते ही रहते हैं कि कौन बंदा कहां खाली है और कब उसे ऑनलाइन बुक कर दिया जाए।
आजकल ‘वेबीनार विशेषज्ञों’की एक ऐसी संकर नस्ल भी तैयार हो गई है जो बिना थके, बिना रूके दिन में पांच-दस वेबीनार निपटा सकती है। कई लोगों के लिए यह नई आभासी तकनीक अपने ‘एक्टिविटी अकाउंट’में नंबर बढ़वाने का सबसे आसान उपाय है।
गोया मैरेज रिसेप्शन की जगह बर्थ-डे पार्टी से काम चला लिया जाए। लेकिन एक्चुअल दुनिया में जीने के आदी रहे कई लोगों का मानना है कोविड 19 के समांतर यह एक नई सामाजिक और तकनीकी बीमारी है, जिससे छुटकारा पाना लगभग नामुमकिन है। क्योंकि इसने इंसानों के बीच दूरियों को अपने ढंग से पाटने और पुरानी नजदीकियों को स्थायी दूरियों में तब्दील करने का काम किया है।
वैसे वेबीनार की दुनिया के धुरंधरों का मानना है कि कोरोना रहे न रहे, ‘वेबीनार संस्कृति’ का ये वायरस हमारी जिंदगी में घुस चुका है। इसकी कोई वैक्सीन बनने की संभावना भी नहीं है।
दरसअल कोरोना काल ने हमारे शब्दकोश को जो नए शब्द दिए हैं, उनमें से एक वेबीनार भी है। कुछ समय पहले तक ‘सेमीनार’, ‘सम्मेलन’या ‘परिचर्चा’ जैसे शब्दों, उनकी तासीर और उनकी आड़ में पनप रहे तंत्र से हम वाकिफ थे।
कोरोना की वजह से देश भर में लाॅकडाउन हुआ और भौतिक-सामाजिक गतिविधियां भी ठप हो गईं। ऐसे में लोगों के सामने सवाल खड़ा हो गया कि क्या करें? अपना वजूद बताने और बचाने के लिए कुछ तो करना होगा। लिहाजा ‘ऑनलाइन वेबीनार’ का कनसेप्ट तेजी से फैलने लगा।
पढ़ाने लिखाने, मार्केटिंग,कई जरूरी और गैर जरूरी विषयों तथा आत्मप्रचार के लिए वेबीनारों की बाढ़- सी आ गई। बीते 6 माह में देश में कुल कितने वेबीनार हुए या हो रहे हैं, इसका कोई आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन माना जा सकता है कि सामाजिक कार्यक्रमों और लोगों के जमावड़ों के दम पर अपनी दुकान चलाने वालों के लिए तो यह मानो घर चल कर आया ‘सुनहरा’अवसर है।
अपने देश में वेबीनार कल्चर भले अभी फलता दिख रहा हो, लेकिन दुनिया में यह कनसेप्ट काफी पहले आ गया था। वास्तव में वेबीनार शब्द भी अंग्रेजी के ‘वेब’और ‘इनार’ शब्दों से मिलकर बना है। डिक्शनरी में इसे पहली बार जगह 2008 में मिली।
इसे वेब कांफ्रेंसिंग भी कहते हैं। ऑनलाइन बैठकों, सम्मेलनों के आयोजन और प्रसारण की इस विधा को वेबकास्ट कहा जाता है। यह काम इंटरनेट और ऑनलाइन प्लेटफार्म के जरिए होता है। इसमें संबंधित लिंक के माध्यम से आप अपने घर या दफ्तर से ही सीधे जुड़ सकते हैं। अपनी बात रख सकते हैं,चर्चा में भाग ले सकते हैं।
इसके लिए जरूरी है,स्मार्ट फोन,लैपटाॅप या कम्प्यूटर। इस ऑनलाइन संचार के लिए कई साॅफ्टवेयर भी उपलब्ध हैं। वेबीनार कई उद्देश्यों, जैसे स्लाइड शो, वेब टूर, टैक्स्ट चैट, मार्केटिगं, ओपिनयन पोल और सर्वेक्षण आदि के लिए किया जाता है। इसके कुछ मापदंड भी बनाए गए हैं।
दुनिया में इसकी शुरूआत ‘रियल टाइम टैक्स्ट चैट सुविधा’ के रूप में 1980 में हो चुकी थी। तब इसका उपयोग तत्काल संदेश भेजने के लिए किया जाता था। 1995 में पिक्चरटेल कंपनी ने विडोंज पर आधारित साॅफ्टवेयर ‘लाइवशेयर प्लस’ लांच किया। इसमें रिमोट कंट्रोल से शेयरिंग की सुविधा थी।