विश्कर्मा जयन्ती 'श्रमशील समुदाय' की प्रतिष्ठा स्थापित करने की भी जयन्ती है।
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वास्तुकला का प्रमुख स्थान
अपने शास्त्रीय ग्रंथों में जिन चौसठ कलाओं की चर्चा की गई है, उसमें वास्तुकला का भी प्रमुख स्थान है। यह कला भवन निर्माण से सम्बंधित है। मूर्ति कला में मां लक्ष्मी की मूर्ति और भगवान शिव की नटराज की मूर्ति को आज भी मूर्ति कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना जाता है। इतिहासविद और कला विशेषज्ञ कुमार आनंद स्वामी कहते है कि" कला जीवन का अभिन्न अंग है। कला का आसन बहुत ही ऊंचा है और उतना जरूरी भी जितना साहित्य, धर्म, आधात्म और दर्शन का।"
इसलिए हम कला की उपासना के बहाने दरअसल कलाकार की ही उपासना कर रहें होते हैं, जिसकी वे कृतियाँ हैं। भगवान विश्वकर्मा का स्मरण भी इस लिहाज से भी हर साल 'श्रमशील संस्कृति' की ही उपासना है। मनीषी इतिहासकार वासुदेव शरण अग्रवाल बताते है कि-"एक चतुर शिल्पी जिस पाषाण खंड को अपने कौशल से छू देता है वही सौंदर्य का प्रतीक बन जाता है और उसी में से रस का अक्षय सोता फूट जाता है।
भौतिक उपकरणों को ऐसे रूप में ढ़ालना कि वे प्रतिक्षण सौंदर्य और रमणीयता के अर्थ हमारे सामने प्रकट करते रहें संस्कृति का स्वाभाविक अंग और सभ्यता की अनिवार्य विशेषता मानी गयी है।" इसी अर्थ में बाणभट्ट ने अजंता की कला को त्रिलोक का संपुंजन कहा है, अर्थात् तीनों लोक में जितने चर-अचर प्राणी हैं उन सबके लिए कला का द्वार खुला है।
परवर्ती काल में ऐसे हर उस कलाकार के शिल्प इंजीनियरिंग और डिजाइन को 'विश्वकर्मा की कृति' बताया जाने लगा जो अपने अनुपम सौंदर्य और जनकल्याण में बेजोड़ साबित हुआ है। आधुनिक काल में ऐसा ही एक नाम है- मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का। भारत सरकार ने देश के लिए उनकी इंजीनियरिंग के क्षेत्र में किये गये योगदान के लिए सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न'से नवाजा। वे ऐसे इंजीनियर थे जिन्होंने बिना सीमेंट का उपयोग किये पूरा बांध तैयार कर दिया।
'इंजीनियरिंग दिवस'
उनकी जयंती 15 सितम्बर को 'इंजीनियरिंग दिवस' के रूप में मनाया जाता है। वे सचमुच आधुनिक भारत के 'विश्वकर्मा' है। सन् 1932 में उन्होंने 'कृष्ण राजा सागर' बांध के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई। विशश्वरैया ने सन् 1903 में पुणे के खड़कवासला जलाशय के 'ऑटोमेटिक फ्लडगेट' तैयार किया।
इसके अलावा ग्वालियर, भोपाल, नागपुर ,गोवा कोल्हापूर, सांगली, पूरे बिहार और उड़ीसा की जल आपूर्ति प्रणालियां तैयार करवाया। आधुनिक युग में होमी भाभा, विक्रम साराभाई, जैसे न जाने कितने इंजीनियरों ने 'विश्वकर्मा रूप' में देश की उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज भी दे रहे हैं। विश्कर्मा जयंती उन वैज्ञानिकों, इंजीनियरों आविष्कारकों और अनुसंधानकर्ताओं को भी स्मरण करनी की भी जयंती होनी चाहिए, जिनके बदौलत आज भारत मंगलग्रह पर जाने के उपक्रम में कामयाबी हासिल करने की स्थिति में पहुंच चुका है।
साथ ही विश्कर्मा जयन्ती 'श्रमशील समुदाय' की प्रतिष्ठा स्थापित करने की भी जयन्ती है। आज समाज की भौतिक, नैतिक, आधात्मिक और ग्राहस्तिक इज्ज़त भी इस समुदाय के श्रम की वजह से ही बची है। यहीं नहीं कलाओं का चिरकालिक सौंदर्य भी हमारे बीच श्रमिक समुदाय की उन्नति और प्रतिष्ठा से ही कायम रह सकती है। इस अर्थ में विश्कर्मा जयन्ती को 'श्रम शक्ति सम्मान' दिवस के रूप में मनना सर्वथा उपयुक्त होगा।
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