कभी-कभी किसी व्यक्ति की वर्तमान तस्वीर सामने आती है तो बरबस अतीत आंखों के सामने घूम जाता है। इनदिनों पूर्व क्रिकेटर विनोद कांबली का एक वीडियो वायरल हो रहा है। उन्हें वृद्धाश्रम में देखकर उन लोगों को भी झटका लगा होगा, जिन्होंने उन्हें कभी भारतीय क्रिकेट की सबसे चमकदार प्रतिभाओं में देखा था। एक समय कांबली और सचिन तेंदुलकर की जोड़ी का नाम साथ लिया जाता था। स्कूल क्रिकेट में दोनों ने ऐसा प्रदर्शन किया था कि लगा था भारतीय क्रिकेट को दो असाधारण बल्लेबाज मिल गए हैं। सचिन ने अपना सफर जारी रखा और क्रिकेट के इतिहास में अमिट स्थान बनाया। कांबली की कहानी दूसरी दिशा में चली गई। उनके जीवन और करियर के बारे में समय-समय पर कई तरह की बातें सामने आती रही हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति के पूरे जीवन के उतार-चढ़ाव को एक कारण से समझना ठीक नहीं होगा। चोट, प्रदर्शन, चयन, निजी परिस्थितियां, आदतें और फैसले, कई चीजें मिलकर किसी करियर की दिशा तय करती हैं।
कांबली की कहानी एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ती है, क्या हम सफलता हासिल करना तो सीखते हैं, लेकिन सफलता को संभालना नहीं सीखते? सफलता अपने साथ सिर्फ पैसा और शोहरत नहीं लाती। उसके साथ अचानक मिलने वाली प्रशंसा, लोगों की भीड़, नए रिश्ते, आकर्षण और अपेक्षाएं भी आती हैं। जो व्यक्ति कल तक अपने काम के लिए पहचाना जाता था, वह आज खुद एक ब्रांड बन जाता है। यहीं से असली परीक्षा शुरू होती है।
अब जरा, पृथ्वी शॉ को याद कीजिए। बहुत कम उम्र में उन्होंने जिस तरह का क्रिकेट खेला, उसने लोगों को चौंका दिया था। स्कूल क्रिकेट के रिकॉर्ड, अंडर-19 विश्व कप की सफलता और फिर टेस्ट क्रिकेट में शानदार शुरुआत। उनकी प्रतिभा को लेकर इतनी चर्चा हुई कि उनकी तुलना बड़े खिलाड़ियों से होने लगी। उनके पिता ने बेटे के क्रिकेट करियर के लिए बहुत कुछ दांव पर लगाया। एक पिता का यह समर्पण अपने आप में बड़ी बात है, लेकिन किसी प्रतिभाशाली बच्चे की शुरुआती सफलता उसके पूरे करियर की गारंटी नहीं होती। असल चुनौती तो सफलता मिलने के बाद शुरू होती है। युवा उम्र में मिली प्रसिद्धि को संभालना आसान नहीं होता। मैदान के बाहर का जीवन भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है। कौन दोस्त है, कौन प्रशंसक है, कौन सिर्फ सफलता के साथ है और कौन जरूरत पड़ने पर सच बोल सकता है, इनका फर्क समझना जरूरी है।
हम बच्चों से कहते हैं, मेहनत करो, सफल बनो, बड़ा नाम कमाओ, लेकिन शायद हमें एक और बात सिखाने की जरूरत है, सफलता को संभालना भी सीखो, क्योंकि असफलता दिखाई देती है, इसलिए उससे बचने की कोशिश की जाती है, लेकिन सफलता के समय व्यक्ति को अक्सर अपनी कमजोरियां दिखाई नहीं देतीं। चारों तरफ प्रशंसा हो तो गलत बात कहने वाला कोई नहीं बचता। ऐसे समय में एक ऐसा व्यक्ति बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है जो आपकी तारीफ करने के बजाय आपकी गलती बता सके। वह माता-पिता हो सकते हैं, कोच हो सकते हैं, कोई वरिष्ठ मित्र या गुरु हो सकता है।
हमारे यहां गुरु की परंपरा इसलिए महत्वपूर्ण रही है कि गुरु केवल कौशल नहीं सिखाता था, जीवन का अनुशासन भी सिखाता था। वह शिष्य को यह समझाता था कि उपलब्धि अंतिम सत्य नहीं है। आज के दौर में भी एक अच्छे मार्गदर्शक की भूमिका कम नहीं हुई है, बल्कि शायद और बढ़ गई है। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को लगातार प्रशंसा और आलोचना के बीच ला खड़ा किया है। ऐसे में किसी अनुभवी व्यक्ति का यह कहना कि 'यह मत करो', 'यह रास्ता ठीक नहीं है', या 'अभी और सीखने की जरूरत है' बहुत मूल्यवान हो सकता है।
विराट कोहली जैसे क्रिकेटर अध्यात्म की ओर मुड़े। सचिन तेंदुलकर और सुनील गावस्कर भी अध्याम की राह पर चले। दरअसल, अध्यात्म का अर्थ संसार से भाग जाना नहीं है। इसका अर्थ अपने भीतर इतना संतुलन पैदा करना भी है कि सफलता मिलने पर पैर जमीन पर रहें और असफलता आने पर व्यक्ति टूटे नहीं। भगवद्गीता कहती है, कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” अर्थात् अपना कर्म करते रहना और परिणाम को अपनी पूरी पहचान न बना लेना। तालियां मिलें तो भी व्यक्ति वही रहे और आलोचना हो तो भी। शायद यही संतुलन सफलता को अहंकार बनने से रोकता है।
विनोद कांबली हों या पृथ्वी शॉ, जिन्होंने बहुत कम समय में बड़ी प्रसिद्धि हासिल की और फिर उनकी चमक कम हो गई, हर कहानी की अपनी परिस्थितियां हैं। इसलिए किसी व्यक्ति को देखकर यह फैसला देना कि वह अपनी सफलता संभाल नहीं पाया, उचित नहीं होगा, लेकिन इन कहानियों से एक साझा सवाल जरूर निकलता है। क्या हमारे बच्चों को सफलता के लिए जितनी तैयारी कराई जाती है, उतनी ही तैयारी सफलता के बाद के जीवन के लिए भी कराई जाती है? प्रतिभा आपको शिखर तक पहुंचा सकती है। मेहनत आपको वहां तक ले जा सकती है। लेकिन वहां टिके रहने के लिए संयम, अनुशासन, सही संगति और सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है, क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल यह नहीं कि दुनिया आपको पहचानने लगे। सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह है कि दुनिया की पहचान मिलने के बाद भी आप खुद को न खोएं।
विनोद पाठक
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