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पितृपक्ष 2026: क्या आपका भी कहीं श्राद्ध हो रहा है?

सार

पुनर्जन्म की मान्यता पर विचार करें, तो मन में एक प्रश्न उठता है। यदि हम भी पहले किसी जन्म में किसी परिवार का हिस्सा रहे होंगे, तो क्या वहाँ हमारे प्रियजन हमें याद करते होंगे? कृष्णा गुरुजी ने पुनर्जन्म से सेवा तक समझाया पितृपक्ष का भाव।
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क्या आपका भी कहीं श्राद्ध हो रहा है? - फोटो : AI
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विस्तार
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पितृपक्ष में कृतज्ञता को सेवा से जोड़ें, जरूरतमंदों की सहायता करें और सबके लिए आशीर्वाद का भाव रखें

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“क्या आपका भी कहीं श्राद्ध हो रहा है?” अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक चिंतक कृष्णा गुरुजी ने पितृपक्ष के अवसर पर यह प्रश्न आत्मचिंतन के लिए उठाया। उन्होंने कहा कि यह विचार हमें जीवन की निरंतरता, रिश्तों और कृतज्ञता के अर्थ पर सोचने का अवसर देता है।

कृष्णा गुरुजी ने श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2, श्लोक 22 का भावार्थ बताते हुए कहा कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण करती है। उन्होंने कहा, “पुनर्जन्म की इस मान्यता पर विचार करें, तो मन में एक प्रश्न उठता है। यदि हम भी पहले किसी जन्म में किसी परिवार का हिस्सा रहे होंगे, तो क्या वहाँ हमारे प्रियजन हमें याद करते होंगे? क्या कोई हमारे लिए भी श्राद्ध करता होगा? यह निश्चित दावा नहीं, बल्कि अपने भीतर संवेदना जगाने वाला प्रश्न है।”
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पितरों के प्रति कृतज्ञता, किसी जीवित व्यक्ति का सहारा बने
अपनी ‘कलियुग पुराण’ की विचारधारा के माध्यम से कृष्णा गुरुजी ने कहा कि पितरों के प्रति श्रद्धा को दैनिक जीवन की सेवा से जोड़ना चाहिए। उनके नाम पर किसी भूखे को सम्मानपूर्वक भोजन कराएँ। किसी जरूरतमंद की दवा, उपचार या कपड़ों की आवश्यकता पूरी करें। किसी अकेले बुजुर्ग के पास बैठकर उनका हाल पूछें।

उन्होंने कहा, “जिन अपनों ने हमें जीवन दिया, पाला और कठिन समय में संभाला, उनके प्रति कृतज्ञता हमारे व्यवहार में भी दिखाई दे। उनकी स्मृति में किसी के आँसू पोंछ सकें, तो हमारी श्रद्धा को एक मानवीय अभिव्यक्ति मिलती है।”

उन्होंने आग्रह किया कि सहायता अपनी क्षमता के अनुसार करें। सेवा के लिए बड़ी धनराशि आवश्यक नहीं है। किसी की बात सुनना, समय देना और सम्मान बनाए रखना भी मूल्यवान सहयोग है। सहायता करते समय सामने वाले की गरिमा और निजता का ध्यान रखें।

पूरे पितृपक्ष में रखें आशीर्वाद की मुद्रा
कृष्णा गुरुजी ने पितृपक्ष के पूरे पखवाड़े में स्वयं को ‘आशीर्वाद मुद्रा’ में रखने का संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका अर्थ केवल हाथ उठाना नहीं, बल्कि मन, वचन और व्यवहार से दूसरों के कल्याण की कामना करना है। उन्होंने कहा, “हम पितरों से आशीर्वाद माँगते हैं। इन दिनों स्वयं भी किसी के लिए शुभकामना बनें। कटु वचन से बचें, बच्चों को स्नेह दें और बुजुर्गों को आदर दें। मन में यह भाव रखें। सबका भला हो, सबको सहारा मिले।” उन्होंने प्रतिदिन कुछ समय शांत बैठकर पितृ ध्यान करने का सुझाव दिया। अपने दिवंगत प्रियजनों को प्रेम से याद करें। उनके अच्छे गुणों और जीवन से मिली सीख पर मनन करें। फिर उनकी स्मृति में किसी एक अच्छे कार्य का संकल्प लें।

स्मृति के साथ जीवित रिश्तों की भी देखभाल करें
कृष्णा गुरुजी ने कहा कि परिवार अपनी आस्था और परंपरा के अनुसार श्राद्ध कर्म करते हुए सेवा को भी उसका हिस्सा बना सकते हैं। साथ ही, घर के जीवित माता-पिता और बुजुर्गों की जरूरतों, स्वास्थ्य और भावनाओं का ध्यान रखना आवश्यक है। किसी परिवार के शोक या उसकी श्रद्धा की तुलना दूसरों से नहीं करनी चाहिए।

उन्होंने संदेश दिया, “पितरों को याद करते हुए केवल यह न सोचें कि उन्होंने हमारे लिए क्या छोड़ा। यह भी सोचें कि उनके संस्कारों से हम दुनिया को क्या दे रहे हैं। उनकी स्मृति में किसी को भोजन, उपचार या अपनापन मिले—यही श्रद्धा को जीवन में उतारने का सुंदर मार्ग है।”
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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