सीने में जलन आखों में तूफान सा क्यों है
गांव की संस्कृति बहुत ही निराली है और बहुत ही ज्यादा आत्मनिर्भर भी। वह किसी भी चीज के लिए बाहरी वस्तुओं पर ज्यादा आश्रित नहीं होते हैं। उन के पास जो भी सामान है, वह अपनी जरूरतों और मुश्किलों को हल करने के लिए उस का इस्तेमाल करते हैं। जैसे कि चिड़ियों को भगाने के लिए उन का यह प्यारा सा मचान।
इस शहर का हर शख्स परेशान सा क्यों है?
यकीनन शहर की कुछ ऐसी ही कैफियत हो चली है। सुबह से शाम तलक बेकरार आदमी। भागता-थकता और टूटता आदमी। उम्मीदों से टूटा हलकान आदमी। जिंदगी की सजा का तलबगार आदमी। इस गर्मी की छुट्टी में गांव का एक छोटा सा टूर करके आइए। वहां आज भी इंसान फुरसत में मिलता है। उनके पास ढेरों किस्से हैं। उन्हें बैठकर सुनिए। उनके पास उम्मीदों का घनेरा पेड़ है। उसके साय तले सुस्ता कर देखिए। उनके पास अपनी परेशानियों का आसान सा हल है। जिंदगी के इस गुणा-गणित को समझकर देखिए। यकीन मानिए आपको बहुत ज्यादा मजा आएगा।
गांव आज भी बहुत सुकून और फुरसत की जगह है। उनका मंत्र मेहनत है। वह मेहनत पर भरोसा करते हैं, शार्टकट या जुगाड़ पर नहीं। वैसे भी जुगाड़ हर जगह तो चलता नहीं है। गांव के लोगों के अपने अनुभव और उनसे निकाले गए रास्ते हैं। उनके पास वेदर का मोबाइल ऐप नहीं बल्कि घाघ की कहावतें हैं। वह जानते हैं कि बारिश होगी या नहीं। चींटी अंडे लेकर ऊपर की तरफ जा रही है, यानी ज्यादा बरखा होगी।
उनके अपने परंपरागत तरीके हैं। वहां अभी भी अंटा बनाया जाता है। बड़ी ही मजे की जगह है। कभी गांव जाइए तो अंटे पर जरूर बैठिएगा। खेतों के किनारे के साइड एक मचान बनाया जाता है। उसे अंटा कहते हैं। इस अंटे पर बैठ कर तोते और कव्वों को भुट्टे की फसल खराब करने रोका जाता है। गांवों में अभी भी पशु-पंछियों को मारा नहीं जाता है। खेतों से चिड़ियों को उड़ाने के लिए वहां गुलेल या एयर गन को वर्जित रखा गया है।
जब ककड़ी और भुट्टे की फसल तैयार हो जाती है तो सुग्गे यानी तोतों और कव्वों के झुंड के झुंड इन खेतों की तरफ रुख करते हैं। इन्हें भगाने के लिए ही अंटा बनाया जाता है। यह अंटे फसल वाले खेत के किनारे कोने में बनाया जाता है। चार बांसों को जमीन में गाड़ दिया जाता है। उसके बाद ऊंचाई पर इन्हें चार दूसरें बांसों से आयताकार आकार में मजूबती से बांध दिया जाता है। फिर इसके ऊपर दो तख्त लाकर रख दिए जाते हैं। इस तख्त को तीन तरफ से सरपत की टटिया से घेर दिया जाता है। ऊपर भी छप्पर रख दिया जाता है, ताकि बारिश में यहां बैठने वाला भीगे नहीं।
यहां पर दिन भर किसान और उसके बच्चे बैठे फसल रखाते हैं। जब भी सुग्गों का हमला हुआ तो यह पीतल या स्टील की थाली पर चम्मच मार-मार कर शोर मचाते हैं। इस शोर से घबराकर तोते खेतों पर उतरने का इरादा त्याग देते हैं और किसी दूसरे खेत की तरफ उड़ जाते हैं। दूसरे खेत की तरफ जाने पर भी वहां भी कुछ ऐसा ही हल्ला मचता है।
हरे-हरे ट्यूं-ट्यूं करते तोते दूर किसी पेड़ पर बैठ जाते हैं। मानो दोबारा हमला करने की रणनीति बना रहे हों। कई बार वह रणनीति बना भी लेते हैं और छोटे-छोटे टुकड़ों में खेतों की तरफ पहुंचते हैं। अगर किसी खेत पर अंटा नहीं हुआ तो फिर तो इनके मजे आ जाते हैं। हवा से झूमते पौधों पर बड़े आराम से बैठकर अपनी तीखी लाल चोंच से भुट्टे का मजा ले रहे होते हैं।
आम तौर पर सुबह ही ऐसे अंटे गुलजार हो जाते हैं। दोपहर को चने की मोटी रोटी और लस्सन-मिर्चे की चटनी और गुड़ का मजा इसी अंटे पर बैठकर लिया जाता है। कई बार भात और मट्ठा भी दोपहर के खाने में होता है। किसान अपने खेतों को सूरज ढले तक रखाते हैं। आमतौर पर सूरज डूबने पर तोते और कव्वे अपने बसेरों में चले जाते हैं और किसान अपने बसेरों में।
कभी मौका मिले तो इस अंटे पर जरूर बैठिएगा। खास तौर से जब रिमझिम बारिश हो रही हो। हवा के साथ आती हल्की फुहारें शरीर ही नहीं मन को भी भिगा जाती हैं। पानी की यह शीलतता सभी तनाव को घुला देता है। छप्पर से टप-टप टपकता पानी। मुंह में आहिस्ता-आहिस्ता घुलते मीठे गुड़ की डली और पुरवाई हवा का झोंका। यह सब कुछ मन को बहुत भला लगता है। भुट्टे के इन पेड़ों को देखकर आपको वह पहेली जरूर याद हो आएगी,
हरी थी मन भरी थी... दो लाख मोती जड़ी थी... राजा जी के बाग में दोशाला ओढ़े खड़ी थी।
अंटे पर लेटकर कृश्न चंदर की कोई रूमानी कहानी पढ़ना या रेडियो पर बजते सावन के गाने को सुनना बहुत आनंदित करता है। किसान अक्सर इस अंटे पर रेडियो साथ रखते हैं। उन्हें खूब अंदाजा होता है कि किस रेडियो स्टेशन पर कितने बजे गाना आता है। एक स्टेशन से गाना बंद होने पर वह उसे ट्यून करके दूसरे स्टेशन पर तुरंत ही पहुंचा देते हैं। मेहनत की कठोरता को वह इस तरह से बहुत मुलायम बना देते हैं।
सच पूछो तो बहुत कम पढ़े-लिखे इन लोगों को जीने का हुनर मालूम होता है। सरलता, सहजता और थोड़े में ही जीने की उनकी यह कला सीखने की जरूरत है।
गांव की गुलजार जिंदगी
गांव में एक खास बात और होती है। वहां हर उम्र के लोगों के लिए उन की भूमिका होती है। जो जरा बुजुर्ग हैं, वह सुबह जानवरों का दूध दुहेंगे। दोपहर को सन से रस्सी बटेंगे। चूल्हे में जलाने के लिए जलावन का इंतजाम करेंगे। बुजुर्ग महिलाएं मक्खन बिलोएंगी। अनाज सुखाएंगी। जवान लोग खेती करते हैं। जवान महिलाएं और लड़कियां घर के बाकी काम काज निपटाते हैं। और बच्चे उनके जिम्मे अकसर अंटा और खेतों पर खाना-पानी पहुंचाने की जिम्मेदारी आती है।
जब कभी शहर में बाजार से भुट्टा खरीदें तो सहज सी समसझ लीजिएगा कि किसान ने इसे आपके लिए बड़ी मेहनत और मुहब्बत से तैयार किया है। सावन के गीतों के बीच उसने इसे आपके लिए तोड़ा है। बारिश की फुहारों के बीच इसे आप तक पहुंचाया है, ताकि आप भुट्टे के साथ ही जिंदगी का भी स्वाद पा सकें।
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