भारत ने कई सदी अपनी आजादी की जद्दोजहद में बिताई है। गुलामी की बादशाहत भारतीय राजे- रजवाड़ों ने भी कम न की थी। अंग्रेजी हुकूमत के शोषण से खस्ताहाल लोगों के जीवन को मुश्किल बनाने में कई रजवाड़ों का भार इन मजदूर, किसानों की पीठ पर था।
भारतीय रजवाड़ों के द्वारा किसानों से 80 से भी अधिक प्रकार के कर वसूले जाते थे। पथिक जी ने इन अत्याचारों के खिलाफ किसानों को संगठित कर उनमें यह चेतना जगाई कि अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना जरूरी है। उनका आन्दोलन न केवल कर वसूली और सामंती दबाव के खिलाफ था, बल्कि स्थानीय राजपूत राजाओं के दमनकारी ढांचे को भी चुनौती देने वाला था।
भारत के गौरव विजय सिंह पथिक अंग्रेजी हुकूमत के गहरे आलोचक थे, इसलिए युवावस्था में ही परिवार की जिम्मेदारी उठाने से ज्यादा देश में आजादी की वकालत की हिमाकत की, और जुड़ गए रास बिहारी बोस एवं शचींद्र नाथ सान्याल जैसे क्रान्तिकारियों के साथ। यह वह दौर था जब ब्रिटिश हुकूमत उन तमाम क्रान्तिकारी गतिविधियों को कुचलने में देर नहीं लगाती थी, जिनमें स्वतंत्रता की किरण नज़र आने लगती थी।
सन् 1915 में फिरोजपुर षडयन्त्र की घटना के पश्चात् इन्होंने अपना असली नाम भूपसिंह से बदलकर विजयसिंह पथिक रख लिया, और इसी नाम से ना केवल भारत अपितु इंग्लैंड की भी ब्रिटिश हुकूमत की आंखों में खटकते रहे। गरीब को गरीबी से बाहर निकालने का जो प्रण उन्होंने लिया वह उनकी विरासत की देन थी।
आजादी के इतने पहले यदि मजदूर, किसानों की समस्याओं को किसी ने फांक कर देखा, तो वो वीर गुर्जर विजय सिंह पथिक जी ही थे, जिनकी आंखों में हर वक्त मजबूर किसानों की तंगहाली दिखती थी, मजदूरों के शोषण और अन्याय को दूर करने की जददो जहद में हर वक्त तल्लीन रहते थे, भूप सिंह गुर्जर जी।
पथिक जी का स्वप्न था कि भारत को शोषण, अन्याय मुक्त बनाना है, वो भी तत्कालीन परिस्थितियों में, जबकि आम जनमानस का जीवन अंग्रेजो के हाथों जकड़ा हुआ था, उनका अथक प्रयास जारी था।
महात्मा गांधी के किसान आन्दोलनों से बहुत पहले अपने देश में पहला विशाल किसान आंदोलन ’बिजौलिया आन्दोलन’ के रूप में खड़ा किया। जिसका उद्देश्य मजबूती से किसान के शोषण और अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाना। सन 1912 में राजधानी परिवर्तन और हार्डिंग पर बम कांड की गतिविधियों में रास बिहारी बोस, जोरावर सिंह, प्रताप सिंह, के साथ पथिक जी का भी नाम शामिल था जिससे अंग्रेजों से बचने में सफल हुए और फरार हो गए।
पथिक जी रास बिहारी बोस के नेतृत्व में 1857 की तर्ज पर एक बड़ा आंदोलन तैयार करना चाहते थे। जिसमें अंग्रेजों को उकसाने और राजाओं को अपनी तरफ विद्रोह में शामिल करना था। पथिक जी को राजस्थान का नेतृत्व संभालना था। लेकिन पथिक जी फिरोजपुर षड्यंत्र में अंग्रेजों की आंखों में पहले से चुभ रहे थे, जिसके लिए उन्हें भूमिगत होना पड़ा।
यकीनन हवाओं का रूख दूसरी ओर था, लेकिन पथिक जी का हौसला सदैव बुलन्द रहा, इसलिए अंग्रेजों से छुपते-छुपाते अपनी तैयारियों में कभी कमी नहीं होने दी। आगे जाकर लाहौर केस में भी उनका नाम उछला, तब भी वीर गुर्जर अंग्रेजों की आंखों में धूल झोकने में सफल रहे। ब्रिटिश हुकूमत से बचने के लिए उन्होंने राजस्थानी राजपूतों सा वेश धारण किया एवं चित्तौडगढ़ में रहने लगे।
बिजौलिया से आए एक साधु सीताराम दास से वे बहुत प्रभावित हुए और उनके कहने पर ही बिजौलिया आन्दोलन का नेतृत्व संभाला। बिजौलिया उदयपुर रियासत का एक छोटा सा हिस्सा था, जहां किसानों पर घोर अन्याय किया जा रहा था। शोषण और अन्याय से पीड़ित किसानों को तंगदस्ती में भी मोटी रकम हुकूमत को मालगुजारी के रूप में देनी पडती थी।
बिजौलिया जाकर पथिक जी ने उन किसानों की हालत देखकर उन्हें इस अन्याय से मुक्ति का प्रण लिया और सन् 1916 में आन्दोलन का नेतृत्व अपने हाथों में ले लिया। किसानों का आर्थिक शोषण इस हद तक था कि उनसे 84 प्रकार के कर वसूल किए जाते थे, युद्ध कोष कर, साहूकारों का शोषण जैसी समस्याओं के कारण किसानों की कमर तोड़ कर रख दी थी। उन्होंने गांव-गांव में किसान पंचायत की कई शाखाएं खोली।
किसानों की भूमि सुधार मांग, अधिभार एवं बेगार से सम्बन्धित मुद्दों को समाज और सरकार के समक्ष रखने का सफल प्रयास किया। जमीन से जुड़े इस जननायक के प्रयासों का परिणाम था, कि पंचायत ने भूमि कर न देने का निर्णय लिया। यह वह दौर था जब विश्व में रूसी क्रांति 1917 की खूब चर्चा हो रही थी, समाज को साधने के महारथी जननायक पथिक जी ने आम-जनमानस को इस क्रांति से प्रेरित करके भारत में किसानों की शोषण से आजादी का बिगुल फूंका। जिसकी चर्चा गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने अखबार 'प्रताप' में जोर-शोर से की हैं।
पथिक जी ने किसानों के दर्द को बम्बई जाकर महात्मा गांधी को बताया। गांधी जी ने वचन दिया कि यदि मेवाड़ की सरकार किसानों का दर्द दूर नहीं करती तो वे स्वयं बिजौलिया आन्दोलन का नेतृत्व संभालेंगे। गांधी जी ने महाराणा को पत्र भी लिखा, लेकिन कोई समाधान न निकला।
पथिक जी जननायक थे! उन्होंने जनता की बात, जनता के साथ रखने का निश्चय किया। तत्पश्चात वर्धा से राजस्थान केसरी नामक पत्र निकाला जो कि जनता में बहुत लोकप्रिय हो गया, लेकिन उनकी विचारधारा जमनालाल बजाज से मेल न खाई और वे वर्धा छोड़कर अजमेर आ गए। जनता के नायक अपनी कोशिशों में धार लाने के लिए सन् 1920 में अजमेर में ही राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की, ताकि लोगों से जुड़ाव और भी ज्यादा हो सके।
देखते ही देखते इस संस्था ने पूरे प्रदेश में अपनी शाखाएं प्रसारित कर ली, और कई जन आन्दोलन का नेतृत्व किया। आगे चलकर अजमेर से पथिक जी का एक नया पत्र ' नवीन राजस्थान' प्रकाशित हुआ। दिनों-दिन पथिक जी के प्रयासों से आन्दोलनों एवं सत्याग्रहों के माध्यम से किसानों की समस्याओं ने खूब जोर पकड़ा जिसमें देशी राजे रजवाड़ों की निरंकुशता पर अंकुश लगाने का उन्होंने पुरजोर प्रयास किया।
सन् 1921 आते-आते उन्होंने राजस्थान सेवा संघ के माध्यम से बेगू, पारसोली, भिंडर, बासी और उदयपुर के कई स्थानों में आंदोलन का शंख बजाया। उत्तर प्रदेश में जन्में इस वीर ने राजस्थान के किसानों की जिम्मेदारी बड़े शौक से निभाई, देखते ही देखते देश के कई हिस्सों में बिजौलिया आन्दोलन एक किसान शक्ति का सिंबल बन गया।
ब्रिटिश हुकूमत की रातों की नींद उड़ना आरम्भ हो गयी। सरकार की दहशत इस हद तक बढ़ी की उसने राजस्थान के ए.जी.जी. हालैण्ड को बिजौलिया किसान पंचायत बोर्ड और राजस्थान सेवा संघ से बातचीत करने के लिए नियुक्त किया। पथिक जी के परिश्रम के आगे ब्रिटिश हुकूमत ने घुटने टेकना आरम्भ कर दिया। उन्होंने एक प्रस्ताव की पेशकश की जिसमें किसानों की कई परेशानियां हल होती थी। अतः दोनों पक्षों के मध्य समझौता हो गया, किसानों की 84 में से 35 लागतें माफ़ कर दी गई। कई सरकार के नुमाइदें बर्खास्त कर दिये गये, राजस्थान सहित भारत के प्रत्येक हिस्से के किसानों के आत्मबल को मजबूती मिली।
किसानों की यह बड़ी जीत थी। इसी समय बेगू में आन्दोलन की तीव्रता ने जोर पकड़ लिया। मेवाड़ सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और पांच साल की सजा सुनाई, पथिक जी अप्रैल 1927 में जेल से आजाद हुए।
विजय सिंह पथिक जी हाशिये पे खड़े लोगों के हीरो थे। उनका जीवन समाज और राष्ट्र चिंतन से भरा-पूरा है, जिसके प्रयासों में उन्होंने कई अखबार, पत्र-पत्रिकाओं का आरम्भ किया, जो समाज चिन्तन में बेहतरीन हथियार साबित हुए, उन्होंने नव संदेश और राजस्थान संदेश, तरुण संदेश जो कि साप्ताहिक था प्रसारित किए। साथ ही राष्ट्रीय पथिक नाम से अपने विचार देश के सामने प्रकट किए।
देश को नई राह बता पथिक जी 29 मई सन् 1954 को चिर निद्रा में लीन हो गए। उनके प्रयासों से किसान, मजदूर, हाशिये पर खड़े लोगों को जो प्रेरणा मिली वो आजादी की लड़ाई से अब तक जारी है। यकीनन जननायक वीर गुर्जर, विजय सिंह पथिक के संघर्षों को देश कभी भुला नहीं पाएगा।
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