पाक लीडरों को मंजूर नहीं थी एक बंगाली की हुकूमत
संयुक्त पाकिस्तान में चुनाव में मुजीबुर रहमान की पार्टी अवामी लीग ने जबर्दस्त जीत हासिल कर सत्ता की वाजिब हकदार बन गई थी। उसने पूर्वी पाकिस्तान की 169 से 167 सीट मुजीब की पार्टी को मिली। इस तरह 313 सीटों वाली पाक नेशनल एसेंबली में मुजीब के पास सरकार बनाने के लिए जबरदस्त बहुमत था। लेकिन पाकिस्तान को नियंत्रित कर रहे पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं और सैन्य लीडरों को एक बंगाली लीडर का शासन मंजूर नहीं था।
मुजीब के साथ इस धोखे से पूर्वी पाकिस्तान में बगावत की आग स्वाभाविक थी। पूर्वी पाकिस्तान के लोग सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने लगे।
पाकिस्तान के चुनावों में धोखा खाने के बाद पूर्वी पाकिस्तान में आजादी का आंदोलन दिन-ब-दिन तेज होता गया। पाकिस्तान की सेना ने आंदोलन को दबाने के लिए अत्याचार का सहारा लिया। मार्च 1971 में पाकिस्तानी सेना ने क्रूरतापूर्वक अभियान शुरू किया। पूर्वी बंगाल में बड़े पैमाने पर अत्याचार किए गए। हत्या और बलात्कार की पराकाष्टा हो गई।
मुजीब को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी और टॉर्चर से बचने के लिए बड़ी संख्या में अवामी लीग के सदस्य भागकर भारत आ गए। शुरू में पाकिस्तानी सेना की चार इन्फैंट्री ब्रिगेड अभियान में शामिल थी लेकिन बाद में उसकी संख्या बढ़ती चली गई।
भारत में शरणार्थी संकट बढ़ने लगा। एक साल से भी कम समय के अंदर बांग्लादेश से करीब 1 करोड़ शरणार्थियों ने भाग कर भारत के पश्चिम बंगाल में शरण ली। इससे भारत पर पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव बढ़ गया और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पाकिस्तान को सबक सिखाना ही पड़ा।
भारतीय विमान का अपहरण भी युद्ध का कारण बना
बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम को 30 जनवरी 1971 के एयर इंडिया के ‘‘गंगा’’ नाम के विमान के अपहरण और फिर कश्मीरी अलगाववादियों द्वारा गंगा को जला देने की घटना से भी जोड़ा जाता है। माना जाता रहा है कि विमान अपहरण की इस घटना ने इंदिरा गांधी को झकझोर दिया था। उसके बाद भारतीय आकाश से पाकिस्तानी विमानों के उड़ने पर भारत ने रोक लगा दी थी जिससे पाकिस्तानी सेना का मूवमेंट काफी प्रभावित हुआ।
माना जाता है कि मार्च 1971 के अंत में भारत सरकार ने मुक्तिवाहिनी की मदद करने का फैसला लिया। मुक्तिवाहिनी दरअसल पाकिस्तान से बांग्लादेश को आजाद कराने वाली पूर्वी पाकिस्तान की सेना थी। मुक्तिवाहिनी में पूर्वी पाकिस्तान के सैनिक और हजारों नागरिक शामिल थे।
31 मार्च, 1971 को इंदिरा गांधी ने भारतीय सांसद में भाषण देते हुए पूर्वी बंगाल के लोगों की मदद की बात कही थी। 29 जुलाई, 1971 को भारतीय संसद में सार्वजनिक रूप से पूर्वी बंगाल के लड़कों की मदद करने की घोषणा की गई। भारतीय सेना ने अपनी तरफ से तैयारी शुरू कर दी। इस तैयारी में मुक्तिवाहिनी के लड़ाकों को प्रशिक्षण देना भी शामिल था। मुक्ति वाहिनी में भारत के पैरामिलिट्री के सैनिक भी सादी वर्दी में शामिल हुए।
3 दिसम्बर को युद्ध की घोषणा
जब पूर्वी पाकिस्तान का संकट विस्फोटक स्थिति तक पहुंच गया तो पश्चिमी पाकिस्तान में बड़े-बड़े मार्च हुए और भारत के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की मांग की गई। दूसरी तरफ भारतीय सैनिक पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पर चौकसी बरते हुए थे। 23 नवंबर, 1971 को पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान ने पाकिस्तानियों से युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा।
3 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान की वायु सेना ने भारत पर हमला कर दिया। भारत के अमृतसर और आगरा समेत कई शहरों को निशाना बनाया गया। इसके साथ ही 1971 के भारत-पाक युद्ध की शुरुआत हो गई। 16 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान की सेना के आत्मसमर्पण और बांग्लादेश के जन्म के साथ युद्ध का समापन हुआ।
आत्मसमर्पण के दस्तावेज पर 16 दिसंबर 1971 को ढाका में रमना रेस कोर्स में 4 बजकर 31 मिनट पर भारतीय सेना के पूर्वी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा और पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के कमांडर जनरल ए.ए.के. नियाजी ने हस्ताक्षर किए।
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