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Valentine day 2019: कितना जरूरी है भारतीय समाज में वैलेंटाइन डे मनाना?

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एक कुप्रथा के कलंक से यूरोप को मुक्त कराने के लिए संत वेलेंटाइन का ये कत्लेआम इतिहास में यादगार हो गया। - फोटो : amar ujala
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फरवरी माह की सात से चौदह तारीख के बीच मनाये जाने वाले वेलेंटाइन डे से आज कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। खासकर इस दिवस के लिए युवा पीढ़ी पूरे साल लालायित और बेसब्र दिखती है। मानों हमने वेलेंटाइन डे को एक परंपरा का रूप देकर इसका निर्वहन करना अपना परम कर्त्तव्य समझ लिया है। आज की युवा पीढ़ी जिस वेलेंटाइन डे को प्रेम दिवस की संज्ञा देकर मना रही है उन्हें वेलेंटाइन डे की हकीकत से रू-ब-रू कराना बेहद जरूरी है। कहा जाता है कि पहले यूरोप में लोग बिना शादी के ही वो सबकुछ करने में स्वतंत्र थे, जो शादी के सात फेरों के बाद करने की हमें समाज इजाजत देता है।

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एक बेहूदा कल्चर चल पड़ा था संपूर्ण यूरोपीय महाद्वीप में। लोग किसी के भी साथ चले जाते थे और मनमर्जी पर छोड़ भी देते थे। यह सब इटली के संत वेलेंटाइन को रास नहीं आया और उन्होंने इसकी भर्त्सना कर एक अलग मार्ग अपनाया। संत वेलेंटाइन ने लोगों को शादी के बंधन में बांधकर दाम्पत्य जीवन के सच्चे अर्थों से परिचित करवाया। लेकिन यह सब रोम के राजा क्लोडियस को नागवार गुजरा और उन्होंने संत वेलेंटाइन को बुलाकर इसे अपनी यूरोपीय संस्कृति और परंपराओं के विरुद्ध बताकर इस पर तुरंत रोक लगाने को कहा। पर वेलेंटाइन नहीं माने और उन्हें राजा ने फांसी पर लटका दिया।


एक कुप्रथा के कलंक से यूरोप को मुक्त कराने के लिए संत वेलेंटाइन का ये कत्लेआम इतिहास में यादगार हो गया। बेशक, वेलेंटाइन ने एक बुरी परंपरा का दमन कर एक नई परंपरा का शुभारंभ करना चाहा जो काबिले तारीफ है, लेकिन यह सब यूरोप में हुआ जिसका दूर-दूर तक भारत से कोई ताल्लुक़ नहीं है। फिर भी हमारे देश की नौजवान पीढ़ी इस सब को अपने बाप-दादाओं की बनाई परंपरा मानकर वेलेंटाइन डे मनाते ही जा रही है। हमारी युवा पीढ़ी आज अंधी होकर इन सब चीजों में अपना धन बर्बाद कर रही है।

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वेलेंटाइन डे के नाम पर अपनी वस्तुओं को बेचने के लिए भारत जैसा देश एक सर्वश्रेष्ठ बाजार के रूप में नजर आता है। - फोटो : फाइल फोटो
क्या वैलेंटाइन डे के लिए बाजार बन गया है भारत?
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण-उत्तर कोरिया, चीन जैसे कई देशों को वेलेंटाइन डे के नाम पर अपनी वस्तुओं को बेचने के लिए भारत जैसा देश एक सर्वश्रेष्ठ बाजार के रूप में नजर आता है। और यहां के लोग उनको अपने सबसे बड़े ग्राहक दिखते हैं। ग्रीटिंग कार्ड, टेडी बियर, चॉकलेट, तरह-तरह के गुलाब, गिफ्टस इत्यादि वस्तुओं को बेचकर विदेशी कंपनियां भारी मात्रा में मुनाफा कमाती हैं। इन सब से अनजान रहकर युवा अपनी प्रेमिका के लिए ये सारी चीजें मुंहमांगे दामोें पर खरीदता है। यदि ये सारी चीजें नहीं खरीदें तो आपने वेलेंटाइन डे भी नहीं मनाया कंपनियां यह साफ तौर पर कहती है। 

अब सवाल यह उठता है क्या वेलेंटाइन डे मनाने के लिए यह सब संसाधन होने जरूरी हैं जो विदेशी कंपनियां मुनाफे की आड़ में हमें मूर्ख बनाकर बेचती है। क्या इनके बगैर वेलेंटाइन डे मनाया तो संत वेलेंटाइन नाराज हो जायेंगे? और सबसे जरूरी बात यह है कि क्या हमें प्रेम और उसका अर्थ यूरोप जैसे पाश्चात्य देश से सीखना पड़ेगा? जो आज तक भोगवाद की बीमारी से ग्रस्त है। जहां प्यार की आड़ में छल, कपट और फरेब चलता है। जबकि हमारी भारतीय संस्कृति का आधार प्रेम है और हमारे जीवन की शुरुआत ही प्रेम से होती है। वो हमारा प्रेम ही है जो हमें 29 राज्यों और 7 केन्द्र शासित प्रदेशों के बावजूद भी एक बनाकर रखता है।
 
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हमारी संस्कृति प्रेम के मार्ग पर चलकर ही फलीभूत हुई है। - फोटो : फाइल फोटो
क्या है भारतीय संस्कृति में प्यार का अर्थ? 
हमारी संस्कृति प्रेम के मार्ग पर चलकर ही फलीभूत हुई है, जिस देश में सिर्फ सजीव ही नहीं निर्जीव चीजों में भी प्रेम का भाव देखा जाता हो और जिस देश के लोग गुड़ से भी ज्यादा मधुर हों और जिस सरजमीं पर प्रेममूर्ति व सोलह हजार रानियों के दिलों के राजा श्रीकृष्ण ने अवतरित होकर प्रेम के प्रतिमान गढ़े हों, जहां की माटी के कण-कण में प्रेम की सुगंध शरीर में रक्त की तरह घुली-मिली हो, क्या उस देश के लोगों को प्रेम का ढाई अक्षर किसी यूरोप या उस जैसे किसी अन्य देश से सीखने की जरूरत है? वेलेंटाइन डे जैसे दिन केवल शारीरिक संबंधों तक ही सीमित है। जिनके अंत में हताशा और दुख ही छिपा हुआ है। ये सारे ढकोसले तो चमड़े के पुजारियों की देन है। 
 
आज जरूरत है कि इस वेलेंटाइन डे की बीमारी से पीड़ित हुए युवाओं को प्रेम के सच्चे अर्थों और असल मायनों से परिचित कराते हुए इस बला का भूत उनके सिर से अतिशीघ्र उतारें। और प्रेम का इजहार करना ही है तो भारतीय रीति-रिवाजों के अनुरूप करें और उपहार देने इतने ही जरूरी है तो भारतीय कंपनियों की निर्मित वस्तुएं ही भेंट करें ताकि देश का धन देश में ही रहें। अंततः हमें विदेशी षड्यंत्रों की चंगुल में फंसती देश की युवा पीढ़ी को इन खतरों के प्रति अगाह करना होगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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