वेलेंटाइन डे के नाम पर अपनी वस्तुओं को बेचने के लिए भारत जैसा देश एक सर्वश्रेष्ठ बाजार के रूप में नजर आता है।
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क्या वैलेंटाइन डे के लिए बाजार बन गया है भारत?
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण-उत्तर कोरिया, चीन जैसे कई देशों को वेलेंटाइन डे के नाम पर अपनी वस्तुओं को बेचने के लिए भारत जैसा देश एक सर्वश्रेष्ठ बाजार के रूप में नजर आता है। और यहां के लोग उनको अपने सबसे बड़े ग्राहक दिखते हैं। ग्रीटिंग कार्ड, टेडी बियर, चॉकलेट, तरह-तरह के गुलाब, गिफ्टस इत्यादि वस्तुओं को बेचकर विदेशी कंपनियां भारी मात्रा में मुनाफा कमाती हैं। इन सब से अनजान रहकर युवा अपनी प्रेमिका के लिए ये सारी चीजें मुंहमांगे दामोें पर खरीदता है। यदि ये सारी चीजें नहीं खरीदें तो आपने वेलेंटाइन डे भी नहीं मनाया कंपनियां यह साफ तौर पर कहती है।
अब सवाल यह उठता है क्या वेलेंटाइन डे मनाने के लिए यह सब संसाधन होने जरूरी हैं जो विदेशी कंपनियां मुनाफे की आड़ में हमें मूर्ख बनाकर बेचती है। क्या इनके बगैर वेलेंटाइन डे मनाया तो संत वेलेंटाइन नाराज हो जायेंगे? और सबसे जरूरी बात यह है कि क्या हमें प्रेम और उसका अर्थ यूरोप जैसे पाश्चात्य देश से सीखना पड़ेगा? जो आज तक भोगवाद की बीमारी से ग्रस्त है। जहां प्यार की आड़ में छल, कपट और फरेब चलता है। जबकि हमारी भारतीय संस्कृति का आधार प्रेम है और हमारे जीवन की शुरुआत ही प्रेम से होती है। वो हमारा प्रेम ही है जो हमें 29 राज्यों और 7 केन्द्र शासित प्रदेशों के बावजूद भी एक बनाकर रखता है।
हमारी संस्कृति प्रेम के मार्ग पर चलकर ही फलीभूत हुई है।
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क्या है भारतीय संस्कृति में प्यार का अर्थ?
हमारी संस्कृति प्रेम के मार्ग पर चलकर ही फलीभूत हुई है, जिस देश में सिर्फ सजीव ही नहीं निर्जीव चीजों में भी प्रेम का भाव देखा जाता हो और जिस देश के लोग गुड़ से भी ज्यादा मधुर हों और जिस सरजमीं पर प्रेममूर्ति व सोलह हजार रानियों के दिलों के राजा श्रीकृष्ण ने अवतरित होकर प्रेम के प्रतिमान गढ़े हों, जहां की माटी के कण-कण में प्रेम की सुगंध शरीर में रक्त की तरह घुली-मिली हो, क्या उस देश के लोगों को प्रेम का ढाई अक्षर किसी यूरोप या उस जैसे किसी अन्य देश से सीखने की जरूरत है? वेलेंटाइन डे जैसे दिन केवल शारीरिक संबंधों तक ही सीमित है। जिनके अंत में हताशा और दुख ही छिपा हुआ है। ये सारे ढकोसले तो चमड़े के पुजारियों की देन है।
आज जरूरत है कि इस वेलेंटाइन डे की बीमारी से पीड़ित हुए युवाओं को प्रेम के सच्चे अर्थों और असल मायनों से परिचित कराते हुए इस बला का भूत उनके सिर से अतिशीघ्र उतारें। और प्रेम का इजहार करना ही है तो भारतीय रीति-रिवाजों के अनुरूप करें और उपहार देने इतने ही जरूरी है तो भारतीय कंपनियों की निर्मित वस्तुएं ही भेंट करें ताकि देश का धन देश में ही रहें। अंततः हमें विदेशी षड्यंत्रों की चंगुल में फंसती देश की युवा पीढ़ी को इन खतरों के प्रति अगाह करना होगा।
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