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उत्तराखंड के वनों में आग और हाहाकार: दहकते जंगल उगल रहे हैं ब्लैक कार्बन, संकट में पर्यावरण

सार

सबसे बड़ी चिन्ता का विषय तो यह है कि हिमालय की गोद में बसा उत्तराखण्ड इस दावानल से सर्वोधिक प्रभावित है जिसका सीधा असर उस हिमालय पर पड़ रहा है जिसे एशिया की जलवायु का नियंत्रक और महाद्वीप का जलस्तंभ या वाटर टावर कहा जाता है। इस समय आग जंगलों को निगल रही है और जंगल ब्लैक कार्बन उगल रहे हैं।

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उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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ग्रीष्म ऋतु के अपने चरम की ओर तेजी से बढ़ते जाने के साथ ही जंगलों में भड़की आग भी अपना विकराल रूप लेती जा रही है। हालात यह हैं कि जंगल की आग से उत्पन्न धुएं के घटाटोप में पहाड़ भी डूबते नजर आ रहे हैं, जिस कारण लोगों को श्वांस जैसी कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।

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सबसे बड़ी चिन्ता का विषय तो यह है कि हिमालय की गोद में बसा उत्तराखण्ड इस दावानल से सर्वोधिक प्रभावित है जिसका सीधा असर उस हिमालय पर पड़ रहा है जिसे एशिया की जलवायु का नियंत्रक और महाद्वीप का जलस्तंभ या वाटर टावर कहा जाता है। इस समय आग जंगलों को निगल रही है और जंगल ब्लैक कार्बन उगल रहे हैं।

वनाग्नि की घटनाओं में उत्तराखण्ड सबसे ऊपर

अगर आप भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग के वनाग्नि पोर्टल का अवलाकन करें तो उसमें पिछले 7 दिनों के दौरान उत्तराखण्ड का वनाग्नि के सर्वाधिक लगभग 4500 अलर्ट उत्तराखण्ड को भेजे गए हैं। इस अवधि में सर्वाधिक 350 वनाग्नि की बड़ी या गंभीर घटनाएं उत्तराखण्ड में दर्ज हुई है और उसके बाद बाद उड़ीसा और फिर छत्तीसगढ़ में दर्ज हुई है, उसमें 5 मई को प्रदर्शित देशभर में भड़की कुल बड़ी वनाग्नियों में से अकेले उत्तराखण्ड के जंगलों की 110 घटनाएं दर्शायी गई थी।

इधर, 8 मई 2024 को प्रातः 10 बजे तक देश में वनाग्नि की 22 बड़ी घटनाएं दर्ज हुईं जिनमें सर्वाधिक 15 भीषण वनाग्नियां उत्तराखण्ड की थीं, जबकि डैशबोर्ड पड़ोसी हिमाचल में केवल 2 घटनाएं दिखा रहा था। इस वनाग्नि आपदा में वन सम्पदा के स्वाहा होने के साथ ही वन्यजीवन तो तबाह हो ही रहा है। लेकिन इससे वे अदृश्य संकट भी प्रकट होने लगे हैं जिनमें सांस लेने में परेशानी  भी शामिल है। इन अदृश्य संकटों में जलवायु परिवर्तन भी है।

 

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वातावरण में फैल रहे ब्लैक कार्बन

यह वैज्ञानिक सत्य है कि जंगल की आग ब्लैक कार्बन के उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देती है। जब जंगल जलते हैं तो वे बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और ब्लैक कार्बन सहित अन्य प्रदूषक भी उत्सर्जित करते हैं। जंगल की आग से उत्पन्न ब्लैक कार्बन की मात्रा वनस्पति जलने के प्रकार, आग की तीव्रता और मौसम की स्थिति जैसे कारकों के आधार पर भिन्न हो सकती है और उन क्षेत्रों में जहां जंगल की आग अक्सर या तीव्र होती है वहां ब्लैक कार्बन उत्सर्जन अधिक होता है। चूंकि हरी वनस्पति ज्यादा कार्बन धारण करती है इसलिए जब वह जलती है तो उस कार्बन को वातावरण में उत्सर्जित कर देती है। इन उत्सर्जनों का वायु गुणवत्ता और जलवायु पर स्थानीय और वैश्विक दोनों प्रभाव पड़ते हैं। यह अधजला कार्बन ही ब्लैक कार्बन होता है।

तप रहा है वातावरण, पिघल रहे हैं ग्लेशियर

ब्लैक कार्बन मुख्य रूप से कार्बन-आधारित ईंधन और बायोमास के अधूरे दहन से उत्पन्न होता है। वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों द्वारा वर्ष 2016 में गंगोत्री ग्लेशियर के पास चीड़बासा स्टेशन में किए गए एक अध्ययन में इस क्षेत्र में वानाग्नि के कारण ब्लैक कार्बन (बीसी) की अधिकता की पुष्टि की गई है।

ब्लैक कार्बन उत्सर्जन वृद्धि में डीजल और पेट्रोल चालित वाहनों का भी काफी योगदान माना गया है। विशेष रूप से पुराने डीजल इंजन, ब्लैक कार्बन उत्सर्जन के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इसमें ट्रक, बस, कार और ट्रेन शामिल हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट के डॉ.पी.एस. नेगी के नेतृत्व में किए गए इस अनुसंधान को वैज्ञानिक पत्रिका एटमॉस्फेरिक एनवायरनमेंट में प्रकाशित किया गया था। चूंकि अब गर्मियों में उत्तराखण्ड की चारधाम यात्रा के साथ ही हिमालयी धर्मस्थलों पर भीड़ भी बढ़ने वाली है।

पिछले साल अकेले उत्तराखण्ड के चार धामों में लगभग 6 लाख वाहन पहुंचे थे। लॉरेंस बर्कले नेशनल लेबोरेटरी के वैज्ञानिक सुरबी मेनन और उनके सहयोगियों ने पाया कि ग्लेशियरों पर बर्फ और बर्फ के आवरण में गिरावट के लिए भारत से वायुजनित ब्लैक कार्बन एरोसोल एक प्रमुख योगदानकर्ता है।

 

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बायोमास जलने से 30 प्रतिशत ब्लैक कार्बन का उत्सर्जन

बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन और बायोमास को जलाने के परिणामस्वरूप उत्सर्जित होने वाले ब्लैक कार्बन का वास्तविक योगदान 30 प्रतिशत से भी अधिक माना जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जंगलों की यह आग वातावरण में पर्याप्त मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों और सूक्ष्म कणों का उत्सर्जन कर रही है।

वनाग्नि के कारण ब्लैक कार्बन जैसे तत्व झाड़ियों, घास के मैदानों और जंगलों से उत्सर्जित हो कर वातावरण में फैल जाते हैं। जैसे ही वनस्पति जलती है, उनके भीतर जमा कार्बन उत्सर्जित हो जाता है। यही मुख्य कारण है कि बड़े पैमाने पर जंगल की आग वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) छोड़ती है और इसलिए, जलवायु परिवर्तन की दर को काफी हद तक बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है। 

ब्लैक कार्बन एक जलवायु को सीधे प्रभावित करता है। यह सूर्य के प्रकाश को अवशोषित कर वातावरण को गर्म करता है, जिसका ग्लोबल वार्मिंग में सीधा योगदान होता है। इसके अतिरिक्त, जब ब्लैक कार्बन बर्फ पर जम जाता है तो यह उनकी अल्बेडो (परावर्तनशीलता) को कम कर देता है, जिससे वे अधिक सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करते हैं और तेजी से पिघल जाते हैं, जो समुद्र के स्तर में वृद्धि और अन्य जलवायु प्रभावों में योगदान कर सकता है। हिमालय पर इस भीषण वनाग्नि कांड से बड़े पैमाने पर ब्लैक कार्बन और अन्य गैसें उत्सर्जित हो रही हैं जिससे एरासोल का सन्तुलन भी गड़बड़ा रहा है, जिसका सीधा असर लोकल और ग्लोबल वार्मिंग के साथ ही हिमालयी ग्लेशियरों पर पड़ रहा है जो कि तेजी से पीछे खिसक रहे हैं।

ग्लेशियरों पर ब्लैक कार्बन जमने की वजह से बर्फ की सौर किरणों को परावर्तित करने की क्षमता कम हो रही है और ग्लेशियरों की सतह पर जमे ब्लैक कार्बन सौर विकिरण को अवशोषित करते हैं, जिसकी वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के एक स्वायत्त संस्थान, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार गर्मियों के दौरान इस क्षेत्र में ब्लैक कार्बन की मात्रा 400 गुना बढ़ जाती है। अध्ययन में बताया गया है कि ब्लैक कार्बन की मात्रा में इस मौसमी वृद्धि के पीछे का कारण जंगल की आग और कृषि अवशेष जलाना है। इस ब्लैक कार्बन की प्रकाश-अवशोषित प्रकृति के कारण मौसम चक्र प्रभावित हो रहा है। 

धुएं का स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर

ब्लैक कार्बन मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए खतरनाक हो सकता है। ब्लैक कार्बन कणों के सांस लेने से श्वसन और हृदय संबंधी समस्याएं होती हैं। ये कण इतने छोटे होते हैं कि फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश कर जाते हैं और यहां तक कि रक्तप्रवाह में भी प्रवेश कर जाते हैं, जिससे सूजन होती है और अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और हृदय रोग जैसी स्थितियां बिगड़ जाती हैं।

 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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