मानसून के इस सीजन में इन दिनों हिमाचल प्रदेश में आसमानी आफत कहर बरसा ही रही थी कि अचानक पड़ोसी राज्य उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी जिले के धराली गांव के ऊपर बादल ऐसा फटा कि लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिला और सैलाब सब कुछ तबाह कर गया। खीर गंगा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में अचानक आई त्वरित बाढ़ और भूस्खलन ने घरों, होटलों और बुनियादी ढांचे को बहा दिया। कई दिनों बाद मृतकों की सही गिनती तब सामने आएगी, जब मलबे से या नदी किनारे से शव मिलेंगे। हिमालय पर और खासकर पश्चिमी हिस्से में यह घटना नई नहीं है। विश्व की इस सबसे युवा पर्वत श्रृंखला की संरचना और भूगर्भीय स्थिति ही दैवी आपदाओं के लिए संवेदनशील रही है। लेकिन विगत कुछ वर्षों से हिमालय पर आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता देखी जा रही है वह बहुत चिन्ताजनक है जो कि जलवायु परिवर्तन, जटिल स्थलाकृति और मानवीय गतिविधियों के कारणों को इंगित करती है।
हिमालय की भौगोलिक संवेदनशीलता
मौसम विज्ञान विभाग बादल फटने को 100 मिमी प्रति घंटे से अधिक बारिश के रूप में परिभाषित करता है, जो आमतौर पर 10 गुना 10 किमी के छोटे क्षेत्र में होती है। ऐसी घटनाओं के लिये हिमालयी राज्य विशेष प्रवण हैं, क्योंकि क्षेत्र की अनूठी स्थलाकृति तीव्र संवहनी गतिविधि और नमी एकत्रण को बढ़ावा देती है।
शोधकर्ता डिमरी और अन्य (2017) के एक शोध के अनुसार, भारतीय हिमालय के दक्षिणी किनारे पर मूसलाधार बारिशें अप्रत्याशित हैं और अक्सर 15 किमी ऊंचे गहरे क्यूमुलोनिम्बस बादलों से जुड़ी होती हैं, जो पर्वतीय उत्थान और मानसून गतिशीलता से प्रेरित होती हैं। हिमालय की खड़ी ढलानें और नाजुक भूविज्ञान सीमित स्थान पर मूसलाधार बारिश के प्रभाव को बढ़ाते हैं, जिससे अचानक बाढ़, नदी नालों में मलबा प्रवाह और भूस्खलन होते हैं।
भविष्यवाणी क्या कहती है? बढ़ रही हैं आपदाएं
कुमार और अन्य (2018) के एक अध्ययन में बताया गया है कि भारतीय हिमालय में अत्यन्त मूसलाधार बारिश की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है, जो प्राकृतिक जलवायु परिवर्तनशीलता, बड़े पैमाने पर वायुमंडलीय संचलन और भूमि उपयोग में बदलाव से प्रेरित है। यह अध्ययन वैश्विक जलवायु परिवर्तन की भूमिका को रेखांकित करता है, जो गर्म तापमान के कारण नमी की उपलब्धता को बढ़ाता है, जिससे अत्यधिक वर्षा को बढ़ावा मिलता है।
उत्तरकाशी के धराली में 5 अगस्त की बादल फटने के बाद त्वरित बाढ़, ऐसी घटनाओं की विनाशकारी क्षमता को दर्शाती है। भगीरथी जलग्रहण क्षेत्र के ऊपरी हिस्से में स्थित धराली भू-जलविज्ञानीय खतरों के लिए संवेदनशील है, जहां ढलानें 15° से 70° तक हैं। यह आपदा 2021 में उत्तरकाशी के निराकोट, मांडो, कांक्रारी और सिरोर गांवों में हुई मूसलाधार बारिश की याद दिलाती है, जिसमें 143 परिवार प्रभावित हुए और काफी पर्यावरणीय व आर्थिक नुकसान हुआ था।
जलवायु परिवर्तन और मानसून की भूमिका
हाल के अध्ययनों से हिमालयी राज्यों, विशेष रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में मूसलाधार बारिश या बादल फटने की बढ़ती आवृत्ति की पुष्टि होती है। शोधकर्ता खंडूरी और अन्य (2021) ने 2010 से 2020 तक ऊपरी गंगा बेसिन में 57 अत्यधिक वर्षा घटनाओं (ईआरई) और बादल फटने की घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया, जिसमें 66.6 प्रतिशत घटनाएं 1000-2000 मीटर ऊंचाई बैंड में जुलाई और अगस्त के दौरान हुईं।
इसी तरह, सैन और अन्य (2024) ने 2022 में हिमाचल प्रदेश में 24, उत्तराखंड में 18 और जम्मू-कश्मीर में 24 मूसलाधार बारिश की घटनाओं का अध्ययन किया, जिन्हें जलवायु परिवर्तन और मानसून-प्रेरित वायुमंडलीय गतिशीलता से जोड़ा गया। सिंह और अन्य (2020) का अध्ययन बताता है कि मानसून के मौसम में आम होने वाली अत्यन्त भारी बारिश वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण अधिक बार हो रही है, जो भूवैज्ञानिक रूप से सक्रिय हिमालयी बेल्ट में चरम मौसम को तीव्र करता है।