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Uttarakhand Election Result: उत्तराखंड में नहीं टूटा मुख्यमंत्री के चुनाव हारने का मिथक, अब किसकी होगी ताजपोशी?

सार

मुख्यमंत्री पद के लिए सतपाल महाराज, निशंक और मदन कौशिक जैसे बड़े नामों को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। अब देखना होगा कि पार्टी किसपर मुहर लगाती है?
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उत्तराखंड में कौन होगा सीएम पद का चेहरा? - फोटो : Amar Ujala Creative
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विस्तार
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उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा ने दोबारा भारी बहुमत से चुनाव जीत कर भले ही एण्टी-इन्कम्बेंसी के कारण सत्ताधारी दल की हार और बारी-बारी सरकार बनाने का मिथक तोड़ दिया हो, मगर कुछ मिथक इस चुनाव में फिर भी नहीं टूट पाए हैं, जैसे कि उत्तरकाशी की गंगोत्री सीट से जीतने वाले दल का ही राज्य में सरकार बनाने का मिथक। सबसे बड़ा मिथक मुख्यमंत्रियों का चुनाव हारने वाला था जो कि इस बार भी नहीं टूट पाया। इस मिथक के न टूट पाने से भावी मुख्यमंत्री को लेकर अनिश्चितता उत्पन्न हो गई है। 

इस बार के उत्तराखंड चुनाव में मुख्यमंत्री पद के तीनों दलों के दावेदार चुनाव हार गए हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खटीमा सीट से 5180 मतों से हार गए हैं। इसी प्रकार कांग्रेस की ओर से दावेदार और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अल्मोड़ा जिले की लालकुंआ सीट से लगभग 14 हजार मतों से चुनाव हार गए। जबकि आम आदमी पार्टी की ओर भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश किए गए कर्नल अजय कोठियाल उत्तरकाशी की गंगोत्री सीट से जमानत तक नहीं बचा पाए। 

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प्रदेश में 2022 का चुनाव भाजपा ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में लड़ने के साथ ही उन्हें अगला मुख्यमंत्री भी घोषित किया था। लेकिन अब धामी के चुनाव हार जाने के बाद उनके मुख्यमंत्री बने रहने पर संशय के बादल मंडराने लगे हैं। हालांकि पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी ममता बनर्जी चुनाव हार गईं थी, फिर भी मुख्यमंत्री बनी हैं। 

जानकारों के अनुसार पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड की स्थिति भिन्न है। ममता बनर्जी अपनी पार्टी की सर्वेसर्वा होने के साथ ही वहां चुनाव उन्हीं के नाम पर जीते गए थे, लेकिन उत्तराखण्ड में मोदी और हिन्दुत्व के नाम पर चुनाव जीते गए इसलिए जरूरी नहीं कि धामी को पुनः अवसर दिया जाएगा।
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क्या सतपाल महाराज हो सकते हैं विकल्प?

धामी की हार के बाद सतपाल महाराज जैसे हैवीवेट चुनाव जीत गए हैं। महाराज लम्बे समय से मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे हैं। कांग्रेस में मुख्यमंत्री बनने की संभावनाएं क्षीण होने के बाद ही वह भाजपा में शामिल हुए थे और मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने के लिए ही वह 2017 में चौबटाखाल से चुनाव लड़े थे। लेकिन जब मुख्यमंत्री बनने की बारी आई तो त्रिवेन्द रावत बाजी मार गए।

त्रिवेन्द्र को जब हटाया गया तो महाराज पुनः प्रमुख दावेदारों में शामिल थे। लेकिन इस बार मुख्यमंत्री की कुर्सी सांसद तीरथ सिंह रावत के हाथ लग गई। उनकी उपचुनाव लड़ने की संभावना समाप्त होने पर संवैधानिक संकट टालने के लिये तीरथ सिंह को हटाया गया तो महाराज एक बार फिर चूक गए और कुर्सी पुष्कर सिंह धामी के हाथ लग गई, इसलिए अगर धामी को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया तो इस बार सतपाल महाराज पुनः इस पद के प्रमुख दावेदारों में से एक माने जा सकते हैं।

महाराज के लिए उपचुनाव की भी आवश्यकता नहीं है। महाराज केन्द्र में मंत्री भी रह चुके हैं और दो बार सांसद भी रहे। उनके शिष्य सारे देश में फैले हैं जिसका लाभ भाजपा उठा सकती है।

पूरी तैयारी के साथ मैदान में थी भाजपा
इस चुनाव में कांग्रेस से कांटे की टक्कर की स्थिति मानी जा रही थी। ऐसी स्थिति में त्रिशंकु विधानसभा के बारे में भी आशंकाएं प्रकट की जा रही थी। इस स्थिति से निपटने के लिए भाजपा में प्लान-बी पर भी काम किया जा रहा था। प्लान के अनुसार कम सीटें मिलने पर बसपा और निर्दलियों को पटाने की भी योजना थी और इस कार्य के लिये पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केन्द्रीय शिक्षा मंत्री के साथ भाजपा के रणनीतिकार विजयवर्गीय की मुलाकातें काफी चर्चा में रही थीं।

यही नहीं निशंक को दिल्ली भी तलब किया गया था। इसलिए अगर धामी की बारी नहीं आती है तो निशंक को भी अगले मुख्यमंत्री के लिए प्रबल दावेदार माना जा सकता है। यह भी चर्चा है कि भाजपा इस बार कच्चे खिलाड़ियों को मुख्यमंत्री पद की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं सौंपेगी। 

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक हरिद्वार से कड़े मुकाबले में जीत तो गए हैं, मगर उनकी संभावनाएं ज्यादा नहीं हैं। कौशिक पर वैसे ही पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ भीतरघात करने का आरोप है, इसलिए उनका प्रदेश अध्यक्ष पद भी सलामत रहता है, तो वहीं गनीमत है। चूंकि यह चुनाव मोदी और पार्टी के नाम पर जीता गया है इसलिए भाजपा नेतृत्व को मुख्यमंत्री के चयन में काफी लिबर्टी हासिल है। अगर पार्टी नेतृत्व इस मामले में फिर कोई चौंकाने वाला निर्णय लेता है तो अचरज न होगा।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। 
 

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