अमरोहा जिले की चार में से तीन सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों को मौका देती थी, लेकिन इस बार के चुनावों में ऐसा नहीं किया है।
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सीटों और टिकट का समीकरण
एक और दिलचस्प पहलू है। दरअसल, पिछले चुनावों के मुकाबले समाजवादी पार्टी के मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या कम हो गई है। लेकिन ये एक समस्या नहीं है, कहा जा रहा है कि ये काफी सोच-समझकर लिए गए फैसले का हिस्सा है। अब तक सपा का ये चलन रहा था कि वो अमरोहा जिले की चार में से तीन सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों को मौका देती थी, लेकिन इस बार के चुनावों में ऐसा नहीं किया है।
मुजफ्फरनगर में भी 6 विधानसभा सीटों में से ज्यादातर विधानसभा सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार ही सपा के होते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं किया गया है। ये हैरान करने वाला है, लेकिन इससे कोई मुश्किल उन्हें नहीं होने जा रही है। मुस्लिम समुदाय इससे नाराज नहीं है बल्कि इसे ‘बेहतर चुनावी रणनीति’ माना जा रहा है।
"मोदी की बोटी-बोटी" वाले बयान से चर्चा में आए मशहूर मुस्लिम नेता इमरान मसूद, जो हाल ही में कांग्रेस छोड़कर सपा में आ चुके हैं, को सपा ने टिकट नहीं दिया है। उनके समर्थक कह रहे हैं कि इमरान लोकसभा चुनाव लड़ेंगे, वह कभी विधानसभा सीट तो चाहते ही नहीं थे। कदील राणा और अमीर आलम जैसे प्रभावशाली नेताओं को भी मुजफ्फरनगर में नजरअंदाज कर दिया गया है।
पेशे से वकील शहनाज हैदर बताते हैं-
अखिलेश यादव के करीबी नेता जावेद आब्दी जो अमरोहा की नौगावां सादात सीट से दो बार चुनाव लड़ चुके हैं, को भी इस बार टिकट से मना कर दिया गया है। उनकी जगह पहले हसनपुर के पूर्व विधायक कमाल अख्तर को टिकट देने का ऐलान किया गया, लेकिन बहुत जल्द उनको भी बदलने का ऐलान हुआ, और समरपाल सिंह को यहां से सपा प्रत्याशी बनाया गया, जबकि अख्तर को मुरादाबाद की एक विधानसभा में भेजा गया। एक मुस्लिम बाहुल्य इलाके में हिंदू प्रत्याशी को उतारना, सपा में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ।
मुस्लिम समुदाय के विभिन्न तबकों से चुनाव में बीजेपी के खिलाफ समाजवादी पार्टी और आरएलडी गठबंधन के समर्थन में आवाजें उठ रही हैं।
बड़ौत में एक कार मैकेनिक रहमान कहते हैं-
“सपा का गठबंधन ही इकलौता विकल्प है। अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना है”। ऐसी ही भावनाएं बागपत में हाजी उस्मान, शामली में किसान अरशद फरीदी और सहारनपुर में एक व्यापारी राणा अल्ताफ ने व्यक्त कीं। समझ लीजिए कि मिजाज क्या है, ये सूची बढ़ती जाएगी।
मुस्लिम समुदाय के बुजुर्गों ने ये भी तय किया है कि, “कोई भी समुदाय से ना तो कोई भड़काऊ बयान देगा और ना ही किसी भी तरह के उकसावे पर आक्रामक तरीके से प्रतिक्रिया ही देगा”। उनको डर है कि कहीं अप्रत्यक्ष रुप से कोई भी आक्रामक रवैया कहीं साम्प्रदायिक रंग ना ले ले, जिसके चलते हिंदू वोटों का बीजेपी के पक्ष में एकतरफा ध्रुवीकरण ना हो जाए।
कुछ लोग यूपी चुनाव में मुस्लिम वोटों के इस तरह इकट्ठा होने को पश्चिम बंगाल के समानांतर बताते हैं। लेकिन वो भूल जाते हैं कि हर चुनाव का अपना एक अलग गणित और गति है और अखिलेश यादव ममता बनर्जी नहीं है, कम से कम अभी तक तो नहीं।
(सहयोग: विष्णु शर्मा)
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