डोनाल्ड ट्रंप के साथ पीएम मोदी।
- फोटो : PTI
अफगानिस्तान के मामले में भी ट्रंप भारत का सार्वजनिक उपहास करते रहे हैं।अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत के प्रयासों की खिल्ली उड़ाते हुए उन्होंने कहा था कि जितना भारत इस मुल्क़ पर ख़र्च करता है ,उतना तो अमेरिका एक घंटे में कर देता है। क्या भारत के हितों की रक्षा के लिए वे ईरान से प्रतिबन्ध हटाएँगे ? कभी नहीं। भारत के आयात शुल्क पर भी वे ख़ुश नहीं रहे।
ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान बांग्लादेश में हिन्दुओं के असुरक्षित होने की बात कहकर भारतीय वोटों को लुभाने का प्रयास किया था,लेकिन परदे के पीछे की कहानी अलग है। यह अमेरिका ही था ,जिसने सैनिक अड्डे के लिए सेंट मार्टिन द्वीप नहीं देने पर शेख हसीना की निर्वाचित सरकार गिराई थी। बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री ( निर्वाचित नहीं ) अमेरिका के पिछलग्गू हैं। उन्हें अमेरिका ने ही नोबेल पुरुस्कार दिलाया था। लेकिन वे भी सेंट मार्टिन द्वीप सौंपने के लिए तैयार नहीं हैं। ट्रंप का बयान एक तरह से उनके लिए चेतावनी था। क्या राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप अमेरिका की प्राथमिकता छोड़ देंगे ?
पाकिस्तान के प्रति रुख
अपने पिछले कार्यकाल में ट्रंप बयानों के ज़रिए पाकिस्तान की आलोचना करते थे और परदे के पीछे पाकिस्तान को मदद करते रहे। क्या इतिहास के पन्नों से वे यह अध्याय अलग कर सकेंगे कि जब अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के लिए तालिबान से गुपचुप वार्ताएं हो रही थीं तो उन्होंने भारत को अलग थलग कर रखा था। पाकिस्तान बढ़ चढ़ कर उनकी सहायता कर रहा था।
दरअसल ट्रंप एक धूर्त कारोबारी हैं। वे जानते हैं कि हिन्दुस्तानी सियासतदानों को पाकिस्तान की आलोचना सुनना बहुत अच्छा लगता है। अपने देश का नुकसान करा के भी वे पाकिस्तान की बुराई सुनना चाहते हैं। इसलिए ट्रंप भारत के साथ अपनी दोहरी नीति नहीं छोड़ेंगे। अब यह भारत पर निर्भर है कि वह मिथ्याभाषी शासन प्रमुख के साथ कैसे संबंध रखता है।
इन सबके बावजूद डोनाल्ड ट्रंप जो बाइडेन से बेहतर राष्ट्रपति साबित हो सकते हैं । जो बाइडेन के ज़माने में अमेरिकी रफ़्तार जैसे ठहर गई थी। वे आंतरिक समस्याओं का समाधान नहीं खोज सके। मित्र राष्ट्रों को प्रसन्न नहीं रख पाए। वह तो कमला हैरिस का अपना अभियान ही था ,जिसने शर्मानक हार से मुक़ाबले को सम्मानजनक बनाया। यदि वे महिला नही होतीं तो सौ फ़ीसदी राष्ट्रपति बन जातीं। अमेरिकी समाज अभी भी घोर परंपरावादी है ,जिसमें पुरुषों का वर्चस्व है।बाइडेन का शासन ठहरा हुए पानी का सड़ांध मारता पोखर था तो डोनाल्ड ट्रंप की हुकूमत बहता हुआ प्रदूषित नाला। बेचारे अमेरिकी मतदाता जाते तो कहाँ जाते ?
----------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।