जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण नीति
ट्रम्प प्रशासन ने 2017 में पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका को बाहर कर लिया था और यह निर्णय भारत सहित कई देशों के लिए चिंताजनक था। ट्रम्प के पुनः राष्ट्रपति बनने पर भारत को यह चिंता हो सकती है कि वह फिर से इस समझौते से बाहर हो सकता है, जिससे वैश्विक जलवायु प्रयासों को नुकसान पहुंचेगा। हालांकि, भारत की अपेक्षा हो सकती है कि ट्रम्प प्रशासन जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपनी रणनीति को पुनः प्राथमिकता दे, भले ही पेरिस समझौते में शामिल होने की संभावना कम हो।
पिछले ट्रम्प प्रशासन के दौरान, अमेरिका ने विकासशील देशों के लिए जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर वित्तीय सहायता कम करने की कोशिश की थी। भारत, एक विकासशील देश होने के नाते, अपनी आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारियों का संतुलन बनाए रखने का प्रयास कर रहा है।
ट्रम्प प्रशासन से भारत यह अपेक्षाएं कर सकता है कि वह विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के वित्तीय और तकनीकी समर्थन में सहायता प्रदान करेगा, खासकर हरित ऊर्जा और स्वच्छ प्रौद्योगिकी में निवेश को बढ़ावा देने के मामले में।
ट्रम्प और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच व्यक्तिगत संबंधों को काफी महत्व दिया गया। मोदी-ट्रम्प की मुलाकातों को भारत में एक सकारात्मक कदम माना गया और उस समय ट्रम्प ने मोदी की सार्वजनिक रूप से सराहना भी की, खासकर ‘‘हाउडी मोदी’’ और ‘‘नमस्ते ट्रम्प’’ जैसे आयोजन हुए थे।
हालांकि उस दौरान ट्रम्प की प्रशासनिक शैली और कूटनीति में एक निश्चित अस्थिरता और अप्रत्याशितता थी, फिर भी भारत और अमेरिका के बीच सहयोग और संबंधों में महत्वपूर्ण प्रगति हुई। इसलिए भारत को उम्मीद हो सकती है कि ट्रम्प के अगले कार्यकाल में ये संबंध और मजबूत होंगे। दोनों नेताओं के बीच की दोस्ती भारत के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक लाभकारी हो सकती है, जो व्यापार और रणनीतिक साझेदारी को प्रभावित कर सकती है।
भारत एशिया में सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में ट्रम्प प्रशासन से अपनी वैश्विक भूमिका को और बढ़ाने की उम्मीद कर सकता है। विशेषकर भारतीय अर्थव्यवस्था, लोकतांत्रिक मूल्य और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर ट्रम्प प्रशासन से सहमति और समर्थन मिल सकता है।
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