मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सीधी के कथित पीड़ित के धोए थे पैर
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क्या मानसिक विक्षिप्त था पीड़ित?
एक बात और, जब पेशाब कांड का वीडियो वायरल हुआ तो एक बात कही गई थी कि जिस पर पेशाब की गई, वह युवक विक्षिप्त है। शुरुआत में इसे इस बुनियाद पर सही माना गया कि थोड़ी सी भी चेतना रखने वाला कोई इंसान उस पर पेशाब करने वाले को कुछ तो सबक सिखाता। कम से कम अपनी आबरू बचाने भागता तो सही। वरना कोई खुद पर किसी को पेशाब करने की इजाजत कैसे दे सकता है?
(यहां ‘सभ्य समाज’ के हाल में घटे उन वाकयों को याद करें, जिनमें विमान यात्री द्वारा शराब के नशे में पेशाब की गई और ऐसे मामले अमूमन छुटपुट दंड और चेतावनी के बाद निपटा दिए गए क्योंकि उसमें कोई सियासी एंगल नहीं था)।
दूसरी बात, वायरल हुए पहले वीडियो में पीड़ित युवक का हुलिया भी सामने आए दशमत से अलग दिखता है। मुख्यमंत्री निवास में जो दशमत दिखा, वो पूरे होशोहवास में और एक सामान्य सभ्य नागरिक की तरह पेश आ रहा था। साथ वो प्रदेश के संवेदनशील मुख्यमंत्री द्वारा उसके चरण धोने से हतप्रभ भी था। लेकिन जब उसी दशमत से यह पूछा गया कि उस पर पेशाब करने वाले पर वह किस तरह की कार्रवाई चाहता है तो दशमत ने जवाब दिया कि वह कोई कार्रवाई नहीं चाहता।
आशय यह कि जिसने यह किया, वह गांव का पंडित है, देवता समान है। देवताओं की ‘गलती’ तो उनकी लीला का भाग है। उसे अन्यथा नहीं लेना चाहिए। इस लिहाज से दशमत ने शायद ‘क्षमा बड़ेन को चाहिए’ की तर्ज पर सीएम से भी ज्यादा बड़ा दिल दिखाया। यही नहीं मुख्यमंत्री ने जब दशमत की पत्नी से पूछा कि अब वह क्या चाहती है तो उसने भी सिर्फ इतना कहा कि आप तो बस मेरे पति को वापस भेज दो। यानी गरीब को कहां रजधानी सो काम? यानी हमें किसी झंझट में नहीं पड़ना।
दशमत की पत्नी की बातों में सदियों की वह लाचारी भी बोल रही थी कि हम बदला लेकर भी शायद इज्जत से नहीं जी सकेंगे, क्योंकि शोषण और अपमान हमारी नियति है। आप हमें हमारे भाग्य पर छोड़ दें। दशमत की पत्नी को यह भी नहीं पता कि भारतीय संविधान की उद्देशिका में ही मानवीय गरिमा और सम्मान को कायम रखने की गारंटी है।
नए बयान ने बदल दी मामले की दिशा
दूसरी तरफ राजधानी से ससम्मान घर लौटे दशमत का एक नया वीडियो वायरल हुआ कि वो (पीड़ित) तो मैं था ही नहीं। इसमें हैरानी का अनकहा भाव भी था कि जब मेरे साथ कुछ हुआ ही नहीं तो फिर यह मान सम्मान किस लिए? सम्मान प्राप्त करने मुझे राजधानी भोपाल भेजा गया या फिर यह भी कोई नया ‘खेल’ है? लेकिन इस वीडियो के वायरल होने के कुछ समय बाद ही या तो कहीं से दबाव पड़ा या फिर दशमत को खुद इलहाम हुआ कि ‘हां, वो मैं ही था।‘
दशमत ने यह सफाई भी दी कि जब पेशाब कांड का पहला वीडियो शूट हुआ तब मेरा हुलिया अलग था। बाल लंबे थे। उस रात जो घटा वो शराब के नशे में हुआ। यानी कि जिस पर पेशाब की गई और जिसने पेशाब की, दोनों ही नशे में थे। (फर्क इतना था कि पेशाब करने वाले के भीतर श्रेष्ठता का झूठा अहंकार था, जबकि जिस पर पेशाब हुई, उसमें एक निरीह लाचारी थी।)
मनोविज्ञान की बात करें तो नशे में अपमान या तो घुल जाता है या फिर राक्षस बन कर कहर बरपाता है। मुमकिन है कि दशमत ने शायद यह सोचा हो कि उसके साथ जो हुआ या जो किया गया, उसका अब क्या रंज मनाना। बाद में जब भी उसे होश आया होगा, तब एहसास हुआ होगा कि कोई उस पर नहीं बल्कि समूची मानवता पर ही पेशाब कर गया है। लेकिन वो असली दशमत राजनीति के बियाबान में कभी सामने आ सकेगा, इसकी संभावना कम है।
अलबत्ता वायरल वीडियो में जो हुआ, जो दिखा और जो महसूस किया गया वो समूचे मानव समाज को उद्वेलित और व्यथित करने वाला है। इसका अंजाम विधानसभा चुनाव नतीजों दिख सकता है, क्योंकि विंध्य में इस ‘पेशाब कांड’ के बाद नए किस्म की जातीय गोलबंदी भी शुरू हो गई है।
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