सरला भाभी की पुरानी वाशिंग मशीन अब परेशान कर रही है। उन्होंने दीपावली पर 20 हजार रुपए की नई वाशिंग मशीन लेना का मन बनाया है, लेकिन डिजिटल पेमेंट पर 0.4 प्रतिशत के सरचार्ज ने उनके मन में भ्रम डाल दिया है। क्या मशीन महंगी मिलेगी? क्या वो कैश का जुगाड़ रखें? ऐसे ही सवाल रमेश बाबू के मन में भी हैं, जो हर माह हाउसिंग सोसायटी को मैनटेनेंस के रूप में यूपीआई से 4000 रुपए देते हैं।
सरला भाभी और रमेश बाबू के मन में उठे सवाल पिछले कुछ घंटों से भारत भर में घूम रहे हैं। कुल मिलाकर, दुनिया के आर्थिक इतिहास में सबसे तेजी से सफल होने वाली भारत की डिजिटल भुगतान प्रणालियों को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है। क्या भारत में डिजिटल इंडिया और डिजिटल भुगतान का गुब्बारा फूटने वाला है?
सबसे पहले इस भ्रम की परत खोलना जरूरी है। जिस 0.4 प्रतिशत के सरचार्ज की चर्चा हो रही है, वह वास्तव में कोई नया 'टैक्स' नहीं है, बल्कि इसे बैंकिंग और वित्तीय भाषा में इंटरचेंज शुल्क या मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) के नाम से जाना जाता है।
नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) के दिशा-निर्देशों के तहत, यह शुल्क आम नागरिक के सामान्य बैंक-टू-बैंक यूपीआई लेन-देन पर नहीं, बल्कि प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट्स (पीपीआई), जैसे डिजिटल वॉलेट्स या रूपे क्रेडिट कार्ड के जरिए किए गए व्यावसायिक लेन-देन पर लागू होता है।
सरल शब्दों में समझें तो 2,000 रुपए से अधिक के चुनिंदा व्यावसायिक लेन-देन पर यह 0.4 प्रतिशत से लेकर अधिकतम 1.1 प्रतिशत तक हो सकता है (ई-कॉमर्स, रिटेल आदि के लिए औसतन 0.4 प्रतिशत से 0.9 प्रतिशत)। सरला भाभी जो वाशिंग मशीन ले रही हैं, उसकी 20,000 रुपए की कीमत पर 0.4% की दर से यह सरचार्ज 80 रुपए बनता है।
4,000 रुपए के मेंटेनेंस भुगतान पर यह 16 रुपए बनता है। यह शुल्क लगाने के पीछे का मुख्य कारण डिजिटल भुगतान इंफ्रास्ट्रक्चर (सर्वर, साइबर सुरक्षा, नेटवर्क) को बनाए रखने वाली फिनटेक कंपनियों (जैसे फोनपे, पेटीएम, गूगलपे) और बैंकों को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाना है, जो अब तक बिना किसी सीधी आय के इस पूरे तंत्र को संचालित कर रहे थे।
अब इसे सरकार और एनपीसीआई के नजरिए से समझते हैं। सरकार का कहना है कि बैंक खाते से सीधे बैंक खाते में होने वाले सामान्य यूपीआई ट्रांसफर (पर्सन-टू-पर्सन) पर शून्य शुल्क की नीति लागू है और आगे भी लागू रहेगी। यह शुल्क मर्चेंट (दुकानदार या सेवा प्रदाता) पर लागू होता है, न कि सीधे ग्राहक पर। कोई भी दुकानदार ग्राहक से जबरन यह शुल्क अलग से नहीं वसूल सकता।
2,000 रुपए से कम के छोटे दैनिक लेन-देन (जो देश के कुल यूपीआई वॉल्यूम का लगभग 80-85% हैं) को पूरी तरह से शुल्क-मुक्त रखा गया है, ताकि आम जनता और छोटे दुकानदारों पर कोई असर न पड़े।
अब विपक्ष के तर्कों को देखते हैं। विपक्ष दलों और उपभोक्ता अधिकार संगठनों ने इस व्यवस्था पर कड़े सवाल उठाए हैं। इनका स्पष्ट कहना है कि जब सरकार ने ही देश को नकदी छोड़कर डिजिटल पेमेंट की आदत डाली तो अब उस पर किसी भी तरह का शुल्क लगाना आम जनता और कारोबारियों के साथ वादा-खिलाफी है।
भले ही सरकार कहे कि यह शुल्क मर्चेंट को देना है, लेकिन दुकानदार इसे अंततः वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ाकर ग्राहकों से ही वसूलेंगे। शुल्क के डर से छोटे और मध्यम व्यापारी ग्राहकों से वापस कैश में भुगतान मांगने लगेंगे, जिससे अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को फिर से हवा मिलेगी।
अब आर्थिक और बैंकिंग विशेषज्ञों के नजरिए को समझते हैं। फिनटेक सेक्टर के विशेषज्ञों का मानना है कि बिना किसी राजस्व मॉडल के फिनटेक कंपनियां लंबे समय तक नहीं टिक सकतीं। डाटा सुरक्षा, सर्वर अपग्रेड और साइबर फ्रॉड से बचाव के लिए हजारों करोड़ रुपए की लागत आती है। इसलिए बड़े लेन-देन पर मामूली शुल्क व्यावसायिक रूप से जायज है।
बाजार विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत का यूपीआई मॉडल दुनिया का सबसे सस्ता और सुलभ मॉडल है, लेकिन 2,000 रुपए से अधिक के लेन-देन पर अगर अस्पष्टता बनी रही तो मध्यम वर्गीय खरीदार बड़े लेन-देन के लिए डिजिटल माध्यम से पीछे हट सकते हैं।
अब आम आदमी इसे कैसे समझे? यदि सरला भाभी सीधे अपने बैंक खाते से यूपीआई (क्यूआर कोड स्कैन करके) या नकद में भुगतान करती हैं तो उनसे 1 रुपया भी अतिरिक्त नहीं लिया जा सकता। यदि वे वॉलेट या क्रेडिट कार्ड से पेमेंट करती हैं तो दुकानदार उस शुल्क का हवाला दे सकता है, लेकिन नियमानुसार ग्राहक से सीधे सरचार्ज मांगना गलत है।
तो क्या रमेश बाबू को कैश का जुगाड़ रखना होगा? बिल्कुल नहीं। सोसायटी मेंटेनेंस का 4,000 रुपए का भुगतान अगर सीधे बैंक-टू-बैंक यूपीआई से हो रहा है तो उस पर शून्य शुल्क है। उन्हें नकद निकालने की कोई आवश्यकता नहीं है।
बड़ा सवाल, क्या महंगाई बढ़ने वाली है? यदि 2,000 रुपए से अधिक के बड़े व्यावसायिक भुगतानों पर मर्चेंट्स पर 0.4% का बोझ पड़ता है तो सीमित मार्जिन पर काम करने वाले व्यापारी अपने इनपुट कॉस्ट को कवर करने के लिए सामान की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी कर सकते हैं।
हालांकि, चूंकि यह दर मात्र 0.4% (यानी 1000 रुपए पर 4 रुपए) है, इसलिए इसका व्यापक महंगाई पर कोई बड़ा 'विस्फोटक' असर नहीं पड़ेगा। यह एक सूक्ष्म लागत बढ़ोतरी हो सकती है, जिसे बाजार समय के साथ खुद में समाहित कर लेगा।
अब सरकार को क्या करना चाहिए? क्या कदम पीछे खींचने चाहिए? सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) को स्थिति संभालने के लिए तुरंत एक सख्त एडवाइजरी जारी करनी चाहिए कि कोई भी मर्चेंट ग्राहक से एमडीआर या इंटरचेंज फीस के नाम पर अतिरिक्त पैसे न वसूले।
सरला भाभी और रमेश बाबू जैसे आम नागरिकों के मन में बैठे भ्रम को दूर करने के लिए व्यापक जागरुकता अभियान चलाया जाए कि सामान्य यूपीआई पूरी तरह सुरक्षित और मुफ्त है। बैंकों और फिनटेक कंपनियों को मजबूत रखने के लिए सरकार को नकद प्रबंधन की बचत से मिलने वाले फंड से फिनटेक उद्योग को सब्सिडी देना जारी रखना चाहिए, ताकि व्यापारियों पर भी अतिरिक्त बोझ न पड़े। सरकार को इसका सही क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए, ताकि डिजिटल क्रांति की रफ्तार धीमी न पड़े।
हालांकि, इस कदम से भारत में डिजिटल इंडिया का गुब्बारा फूटने वाला नहीं है, यह भारतीय समाज की आदत और जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है। सरला भाभी को अपनी वाशिंग मशीन के लिए कैश का जुगाड़ करने की हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए और न ही रमेश बाबू को चेकबुक तलाशने की जरूरत है। वर्तमान भ्रम केवल नीतियों के सही ढंग से आम जनता तक न पहुंच पाने का नतीजा है।
यदि सरकार व्यापारियों पर इस शुल्क का अनुचित बोझ रोक पाती है और आम नागरिकों को यह विश्वास दिलाती है कि उनकी दैनिक खरीदारी मुफ्त ही रहेगी तो भारत की यह ऐतिहासिक डिजिटल भुगतान क्रांति बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ती रहेगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।