भारत में चाय के दस रुपये से लेकर मोबाइल फोन, रेल टिकट और हजारों रुपये की खरीदारी तक के लिए मोबाइल निकालकर क्यूआर कोड स्कैन करना इतना सहज हो चुका है कि शायद ही कोई सोचता हो कि स्क्रीन पर कुछ सेकंड में पूरा होने वाले इस भुगतान के पीछे बैंकों, सर्वरों, दूरसंचार नेटवर्क, साइबर सुरक्षा और धोखाधड़ी रोकने वाली प्रणालियों का कितना विशाल ढांचा काम करता है।
वर्षों तक इसका सीधा खर्च न ग्राहक ने महसूस किया, न दुकानदार ने। अब सरकार ने 2,000 रुपये से अधिक के कुछ व्यापारी यूपीआई भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लागू करने का रास्ता खोलकर एक महत्वपूर्ण सवाल सामने रख दिया है- दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल भुगतान व्यवस्थाओं में शामिल यूपीआई हमेशा मुफ्त कैसे रह सकती है और उसकी वास्तविक कीमत आखिर कौन चुकाए?
आम आदमी के लिए क्या बदलेगा?
सबसे पहले उस भ्रम को दूर करना जरूरी है जो नई व्यवस्था की खबर आते ही पैदा हुआ। किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को यूपीआई से पैसा भेजना पहले की तरह पूरी तरह मुफ्त रहेगा, चाहे रकम 500 रुपये हो या 50 हजार। शुल्क केवल व्यक्ति से व्यापारी को किए गए निर्धारित भुगतान पर लागू होगा। व्यापारी को 2,000 रुपये तक का भुगतान भी एमडीआर से मुक्त रहेगा।
छोटे व्यापारी, रेहड़ी-पटरी वाले और पड़ोस की वे दुकानें, जिन्हें यूपीआई क्यूआर के माध्यम से महीने में एक लाख रुपये तक मिलते हैं, भी शून्य एमडीआर के दायरे में रहेंगी। सरकार का कहना है कि इस कारण करीब 96 प्रतिशत व्यापारी यूपीआई लेन-देन नई व्यवस्था से प्रभावित नहीं होंगे।
बदलाव मुख्यतः 2,000 रुपये से अधिक के पात्र व्यापारी भुगतान में होगा। इनमें व्यापारी को 0.4 प्रतिशत एमडीआर देना होगा। अर्थात 5,000 रुपये की खरीद पर 20 रुपये और 10,000 रुपये पर 40 रुपये। 75 हजार रुपये या उससे अधिक के भुगतान में इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये होगी।
रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि सामग्री जैसे आवश्यक तथा कम मुनाफे वाले क्षेत्रों में 2,000 रुपये से ऊपर भी केवल पांच रुपये प्रति भुगतान की दर रखी गई है। पूंजी बाजार से जुड़े भुगतान के लिए अलग कम दर निर्धारित की गई है। नई व्यवस्था 15 अक्टूबर से लागू होनी है।
एमडीआर टैक्स नहीं, भुगतान की लागत है
एमडीआर कोई नया कर नहीं है और सरकार इसे अपने खजाने में नहीं लेती। यह डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के बदले व्यापारी से लिया जाने वाला शुल्क है, जिसे भुगतान व्यवस्था से जुड़े बैंक और सेवा प्रदाता आपस में बांटते हैं। क्रेडिट और डेबिट कार्ड में ऐसी व्यवस्था पहले से है।
अंतर यह था कि जनवरी 2020 से यूपीआई व्यापारी भुगतान शून्य एमडीआर व्यवस्था में चल रहा था। इसी मुफ्त व्यवस्था ने यूपीआई को भारत के शहरों से गांवों और बड़े मॉल से फुटपाथ के ठेले तक पहुंचाने में असाधारण भूमिका निभाई।
लेकिन मुफ्त का अर्थ यह नहीं कि व्यवस्था चलाने की कोई लागत नहीं है। यूपीआई के पीछे सर्वर, क्लाउड भंडारण, बैंकिंग नेटवर्क, ग्राहक सहायता, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी पहचान और लगातार बढ़ते लेन-देन को संभालने की क्षमता चाहिए। उपलब्ध आकलन के अनुसार भुगतान उद्योग को व्यक्ति-से-व्यापारी यूपीआई व्यवस्था चलाने पर सालाना करीब 20,700 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।
सरकार इसके लिए प्रोत्साहन देती रही है, लेकिन 2026-27 के बजट में इसके लिए लगभग 2,000 करोड़ रुपये का प्रावधान है। सवाल इसलिए स्वाभाविक है कि तेजी से बढ़ती प्रणाली की पूरी लागत अनिश्चितकाल तक सरकारी सहायता और सेवा प्रदाताओं पर छोड़ी जा सकती है या नहीं।
यह चुनौती अब केवल बढ़ते लेन-देन को संभालने की भी नहीं है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में डिजिटल धोखाधड़ी के तरीके भी अधिक जटिल हो रहे हैं। भुगतान कंपनियों को साइबर सुरक्षा, संदिग्ध लेन-देन की पहचान और धोखाधड़ी रोकने वाली प्रणालियों को लगातार उन्नत करना पड़ रहा है।
इसलिए यूपीआई को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने की बहस का एक पक्ष यह भी है कि पर्याप्त निवेश से सर्वर क्षमता और सुरक्षा मजबूत हो तथा भुगतान विफल होने या पैसा अटकने जैसी समस्याओं को कम करने की क्षमता बढ़े।
चार प्रतिशत लेन-देन, लेकिन मूल्य में दो-तिहाई
यूपीआई का आकार इस सवाल को और महत्वपूर्ण बनाता है। 2025-26 में 24 हजार करोड़ से अधिक यूपीआई लेन-देन हुए, जिनका कुल मूल्य लगभग 314 लाख करोड़ रुपये था। दिलचस्प तथ्य यह है कि 2,000 रुपये से अधिक के व्यक्ति-से-व्यापारी भुगतान संख्या में केवल करीब चार प्रतिशत थे, लेकिन व्यापारी भुगतानों के मूल्य में उनकी हिस्सेदारी लगभग दो-तिहाई थी। यानी सरकार ने संख्या की दृष्टि से बहुत छोटे, लेकिन मूल्य की दृष्टि से बड़े हिस्से को शुल्क के लिए चुना है।
यहीं नई नीति का तर्क भी है और उसकी परीक्षा भी। तर्क यह है कि चाय वाले, सब्जी वाले और छोटी दुकान को बचाते हुए बड़े कारोबारी लेन-देन से भुगतान तंत्र की कुछ लागत निकाली जाए। इससे बैंकों और भुगतान कंपनियों के पास बेहतर सर्वर, साइबर सुरक्षा और धोखाधड़ी रोकने वाली तकनीक पर निवेश का आर्थिक आधार बनेगा।
यूपीआई के 55 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता और भुगतान व्यवस्था से जुड़ी सैकड़ों संस्थाएं हैं। इतनी विशाल प्रणाली में एक सेकंड की सुविधा के पीछे चौबीस घंटे चलने वाला महंगा तकनीकी तंत्र है।
क्या व्यापारी की लागत ग्राहक तक पहुंचेगी?
लेकिन दूसरा पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं। सरकार कह रही है कि ग्राहक एमडीआर नहीं देगा और बैंकों को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी गई है कि व्यापारी यह खर्च ग्राहक पर न डालें। व्यवहार में इसे सुनिश्चित करना आसान नहीं होगा। व्यापारी के लिए भुगतान स्वीकार करने की लागत अंततः कारोबार की लागत है।
कोई दुकानदार खुले तौर पर “यूपीआई शुल्क” न भी मांगे, तो वह कीमत में उसका अंश जोड़ सकता है, नकद भुगतान पर छूट दे सकता है अथवा बड़े भुगतान को अलग-अलग करने के लिए प्रेरित कर सकता है। यही वह क्षेत्र है जिस पर नियामकों को नजर रखनी होगी।
दूसरा खतरा डिजिटल भुगतान की उस मनोवैज्ञानिक सफलता से जुड़ा है, जिसकी बुनियाद “मुफ्त और आसान” होने पर बनी है। यदि ग्राहक को यह धारणा होने लगी कि 2,000 रुपये के बाद यूपीआई महंगा है, भले वास्तविक शुल्क व्यापारी पर हो, तो कुछ लोग नकद या दूसरे माध्यमों की ओर लौट सकते हैं। इसलिए सरकार और एनपीसीआई के सामने चुनौती केवल नियम बनाने की नहीं, उसे सरल भाषा में समझाने की भी है।
इस बदलाव को न तो “मुफ्त यूपीआई का अंत” कहना सही होगा और न यह मान लेना कि इसका आम आदमी पर कोई असर ही नहीं पड़ेगा। प्रत्यक्ष रूप से सामान्य उपभोक्ता पर शुल्क नहीं है और छोटे भुगतानों का विशाल हिस्सा सुरक्षित रखा गया है। दूसरी ओर बड़े व्यापारियों की नई लागत का थोड़ा-बहुत हिस्सा बाजार के रास्ते अंततः कीमतों में पहुंचने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।
असली सवाल- मुफ्त सुविधा का खर्च कौन उठाए?
असल बहस 0.4 प्रतिशत की दर से कहीं बड़ी है। भारत ने यूपीआई के माध्यम से भुगतान को लगभग सार्वजनिक डिजिटल सुविधा जैसा बना दिया है। अब उसकी सफलता ही उसकी नई चुनौती बन गई है। जितने अधिक लोग इसका इस्तेमाल करेंगे, उतनी अधिक क्षमता, सुरक्षा और निवेश की जरूरत होगी।
सवाल इसलिए “यूपीआई मुफ्त रहे या महंगा हो” भर का नहीं है। असली सवाल है उसकी लागत ग्राहक, व्यापारी, बैंक और सरकार के बीच किस तरह बांटी जाए कि छोटी दुकान भी डिजिटल बनी रहे, ग्राहक का भरोसा भी न टूटे और व्यवस्था आर्थिक रूप से टिकाऊ भी रहे।
यूपीआई ने भारतीयों को यह सिखाया कि पैसा भेजना लगभग संदेश भेजने जितना आसान हो सकता है। अब अगली परीक्षा यह सुनिश्चित करने की है कि उस आसानी की कीमत इतनी न बढ़े कि लोग फिर जेब में नकदी तलाशने लगें।
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