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पूर्वोत्तर डायरी: एक ओर संघर्ष विराम और दूसरी ओर अपनी ताकत बढ़ाने में लगा उल्फा

सार

क्या अल्फा (स्वाधीन) प्रमुख परेश बरुआ क्या सचमुच शांति के प्रति गंभीर हैं या संगठन को नए सिरे से संगठित करने के लिए किसी रणनीति पर काम कर रहे हैं? यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि औपचारिक वार्ता के लिए दोनों पक्षों के बीच अनौपचारिक तरीके से संवाद जारी है और वार्ता  की मुख्य शर्त का आदर करने के लिए कोई नया रास्ता तलाशा जा रहा है।

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उल्फा (स्वाधीन) शांति के नाम पर एकतरफा संघर्ष विराम के नाम पर अपने संगठन को मजबूत करने के लिए नई भर्ती कर रहा है। - फोटो : Social media
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विस्तार
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वार्ता के लिए उल्फा (स्वाधीन) के प्रमुख परेश बरुआ और असम सरकार के बीच जारी अनौपचारिक संवाद के बीच संगठन की नई भर्ती अभियान से कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। वार्ता के लिए उल्फा ने एकतरफ संघर्ष विराम लागू कर रखा है, लेकिन इसके साथ ही संगठन में नए युवकों को शामिल करने का अभियान जारी है।

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उल्फा (स्वाधीन) शांति के नाम पर एकतरफा संघर्ष विराम के नाम पर अपने संगठन को मजबूत करने के लिए नई भर्ती कर रहा है, जबकि असम सरकार ने उल्फा (स्वाधीन) के प्रमुख परेश बरुआ से वार्ता में शामिल होने का आह्वान किया है। पिछले कुछ माह से उल्फा में कई युवा शामिल हुए हैं। जिनमें गुवाहाटी की दो युवतियां भी शामिल हैं। इस बात की पुष्टि असम के पुलिस महानिदेशक भास्कर ज्योति महंत ने भी की है।
 

क्या अल्फा (स्वाधीन) प्रमुख परेश बरुआ क्या सचमुच शांति के प्रति गंभीर हैं या संगठन को नए सिरे से संगठित करने के लिए किसी रणनीति पर काम कर रहे हैं? यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि औपचारिक वार्ता के लिए दोनों पक्षों के बीच अनौपचारिक तरीके से संवाद जारी है और वार्ता  की मुख्य शर्त का आदर करने के लिए कोई नया रास्ता तलाशा जा रहा है।

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इस बात को उल्फा नेता परेश बरुआ भी मानते हैं और उन्हें भरोसा है कि असम के मुख्यमंत्री वार्ता की राह तलाश कर लेंगे। उन्हें मुख्यमंत्री की बात पर भरोसा है। लेकिन ऐसे में अल्फा (स्वाधानी) का नया भर्ती अभियान जारी है। इसलिए अलगाववादी नेता परेश बरुआ की बात पर संदेह हो रहा है।

मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिश्व शर्मा ने गत 2 मई  को शिवसागर जिले की यात्रा के दौरान परेश बरुआ से नई भर्ती रोकने का आह्वान किया है। मुख्यमंत्री नहीं चाहते हैं कि कोई व्यक्ति अपने परिवार को छोड़कर उल्फा में शामिल हो। किसी युवक के उल्फा में जाने से उसके परिवार के सामने गंभीर संकट उठ खड़ा हो रहा है।

बच्चे अपने पिता के लिए, पत्नी अपने पति के लिए और बूढ़े मां-बाप अपनी संतान के लिए तड़प रहे हैं। मुख्यमंत्री का यह भी कहना है कि परेश बरुआ खुद इस बारे में पहल करें और बच्चे, पत्नी तथा बूढ़े मां-बाप को छोड़कर अल्फा में शामिल होने से मना करें।

मुख्यमंत्री चाहते हैं कि परेश बरुआ बोहाग बिहू मे मौसम में शांति वार्ता आरंभ करें, ताकि असम में स्थाई शांति की वापसी हो सके और अल्फा में शामिल होने का अध्याय ही बंद हो जाए, क्योंकि असम के लोग अब शांति और विकास चाहते हैं। विकास के लिए शांति जरूरी है।

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अपनी ताकत बढ़ाने में लगा उल्फा - फोटो : Social Media
दरअसल, डॉ. हिमंत बिश्व शर्मा के मुख्यमंत्री बनने के बाद से परेश बरुवा के साथ नए सिरे से अनौपचारिक संवाद बनने लगा। परेश बरुआ ने कई बार मुख्यमंत्री डॉ हिमंत बिश्व शर्मा की प्रशंसा की है। मुख्यमंत्री ने भी परेश बरुआ से आग्रह किया है। परेश बरुआ ने एकपक्षीय संघर्ष विराम की घोषणा कर रखी है।

इस दौरान उल्फा ने हिंसा की एक भी वारदात को अंजाम नहीं दिया और असम पुलिस ने भी संयम बरता। मुख्यमंत्री ने परेश बरुआ से वार्ता का अनुरोध किया। परेश बरुआ ने भी वार्ता के प्रति सकारात्मक संकेत दिया। उन्होंने एक तरफा संघर्ष विराम लागू कर दिया है।

असम सरकार ने भी परेश बरुआ की इस घोषणा का स्वागत किया है। भारत सरकार की तरफ से भी वार्ता का संकेत मिला, लेकिन यह साफ कर दिया गया कि सार्वभौम के मुद्दे पर वार्ता की शर्त स्वीकार्य नहीं होगी। दिक्कत यहीं पर है। वार्ता के लिए परेश बरुआ की मुख्य मांग असम के सार्वभौम पर चर्चा में शामिल करना है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि वे बीच का रास्ता निकाल लेंगे। लेकिन वह रास्ता किसी तरफ से गुजरेगा, इसका कोई संकेत नहीं मिल पाया है। उल्फा पहले भी वार्ता की तैयारी के बावजूद असम की सार्वभौम की चर्चा करने की पूर्व शर्त रखता आया और वार्ता की संभावना भूमिल होती रहीं हैं। लेकिन इस बीच उल्फा में नए सदस्यों की भर्ती का समाचार आने लगा। ऊपरी असम से कई युवा उल्फा में शामिल होने के लिए म्यांमार पहुंच गए।

उनमें से कई युवक के बच्चे छोटे हैं। कुछ तो मां-बाप के इकलौते संतान हैं। लेकिन परेश बरुआ ने कहा कि असम की स्वाधीनता के पक्षधर युवकों का उल्फा में शामिल होना जारी रहेगा। सवाल यह उठता है कि यदि उल्फा (स्वाधीन) वार्ता के प्रति गंभीर है तो नए सदस्यों की भर्ती का क्या औचित्य है?

जबकि बड़ी संख्या में युवक उल्फा के शिविरों से वापस घर लौट रहै हैं। यह भी माना जा रहा है कि वार्ता के प्रति इच्छा व्यक्त करते उल्फा (स्वाधीन) प्रमुख अपने संगठन को फिर से ताकतवर बनाना चाहते हैं। अल्फा पहले भी कई बार कमजोर हुआ है। उसने खुद को संगठित करने के लिए समय लिया और फिर से अपनी मारक क्षमता बढ़ा ली है।

यह भी सच है कि असम में शांति के लिए उल्फा (स्वाधीन) के साथ शांति समझौते जरूरी है। उल्फा का वार्ता पक्षधर समूह केंद्र सरकार से वार्ता कर रहा है, लेकिन यह सभी को पता है कि परेश बरुआ के मुख्यधारा में नहीं लौटने तक उल्फा समस्या बनी रहेगी। यही वजह है कि वार्ता समर्थक समूहों के साथ जारी वार्ता धीमी गति से आगे बढ़ रही है। असम सरकार को यह सावधानी बरतनी होगी और परेश बरुआ को वार्ता के लिए राजी करने की रणनीति तैयार करनी होगी। यदि ऐसा हुआ तो हिमंत सरकार की यह ऐतिहासिक उपलब्धि होगी।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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