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बजट 2025: केंद्रीय बजट में बिहार चुनाव की आहट मगर पर्यावरण और क्षेत्रीय संतुलन की अनदेखी

सार

अगर बजट पर सरसरी नजर भी डालें तो विहार राज्य को मानों छप्पर फाड़ कर वित्त मंत्री ने तोहफे उडेल दिये हैं, जो कि न केवल बिहार चुनाव की आहट दे रहे हैं बल्कि केन्द्र की मोदी सरकार को समर्थन का ‘‘कैश बैक’’ माने जा रहे हैं।
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केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा वर्ष 2025-26 के लिए संसद में पेश बजट में समाज के सभी वर्गों की आशाओं और अभिलाषाओं को छूने का प्रयास किया गया है। खास कर आयकर सीमा 12 लाख तक किए जाने से मध्यवर्ग को काफी राहत मिलने की आशा है। बजट में कृषि, एमएसएमई, निवेश और निर्यात विकसित भारत की यात्रा के 4 ईंजन बताए गए हैं। इसमें सुधार को ईंधन के रूप में और समावेशिता की भावना को पथ प्रर्दशक के रूप में रखा गया है।

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इस बजट के प्रावधानों का लाभ सभी राज्यों को मिलना है, लेकिन वित्त मंत्री ने अपने बजट में बिहार जैसे राज्यों पर जितनी दरियादिली दिखाई है उतना सूखा यह बजट उत्तराखण्ड जैसे केन्द्रीय सहायता पर निर्भर राज्यों के लिए रखा है।  

हिमालयी राज्यों की विशेष परिस्थितियां होती हैं। वहां विकास की लागत मैदानी इलाकों से कहीं अधिक होती है। जबकि केन्द्र के बजट प्रावधानों में दुर्गमता और विषम भौगोलिक परिस्थितियों को अनदेखा कर दिया जाता है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सारे देश पर पड़ रहा है, लेकिन इसका जिक्र भी बजट में नहीं हैं जबकि कल पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में इसका उल्लेख था।
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बजट में हिमालय की चिंता गायब

भारत की भौगोलिक विविधता में हिमालयी क्षेत्र का महत्व अत्यधिक है। हिमालय न केवल प्राकृतिक दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि यह देश के उत्तर और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों का प्रमुख भाग भी है। इस क्षेत्र का विकास समग्र राष्ट्रीय विकास के लिए आवश्यक है। हिमालयी क्षेत्र, जिसमें उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्वी राज्य और कई अन्य प्रदेश आते हैं, विशेष चुनौतीपूर्ण हैं।

पूर्वोत्तर राज्यों का अलग डोनर मंत्रालय सत्तर के दशक से है, इसलिए तभी से उन राज्यों के लिए ‘‘लुक नॉर्थईस्ट’’ की डॉक्ट्रिन के आधार पर अलग बजट रखा जाता है, जिसका बंटवार नॉर्थ ईस्ट काउंसिल (एनईसी) द्वारा किया जाता। ये प्रावधान वहां की सांस्कृतिक, भौगोलिक और सामरिक स्थिति को देख कर किये गए गए हैं।

ये राज्य ज्यादातर अनुसूची 6 के राज्य हैं जो कि जनजातीय चरित्र के कारण संविधान द्वारा संरक्षित हैं। संविधान की धारा 370 की उपधारा 35-ए समाप्त किए जाने से पहले जम्मू-कश्मीर का भी विशेष दर्जा होने के कारण उस राज्य के लोगों को अलग से सुविधाएं हासिल थीं।

अब जबकि संविधान की विशेष धाराएं हटा दी गई, फिर भी केन्द्र शासित प्रदेश होने के कारण वहां के विकास की सारी जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की है। अब हिमालयी राज्यों में केवल उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश छूट जाते हैं, और इस बजट में इन दानों राज्यों के लिए अलग से कुछ भी खास नहीं है।

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बजट में बिहार के लिए क्या रहा खास? - फोटो : पीटीआई
बिहार के चुनाव की आहट दे रहा बजट

अगर बजट पर सरसरी नजर भी डालें तो विहार राज्य को मानों छप्पर फाड़ कर वित्त मंत्री ने तोहफे उडेल दिए हैं, जो कि न केवल बिहार चुनाव की आहट दे रहे हैं बल्कि केन्द्र की मोदी सरकार को समर्थन का ‘‘कैश बैक’’ माने जा रहे हैं।

वित्तमंत्री के भाषण में बिहार में ग्रीन पटना एयरपोर्ट और बिहटा में ब्राउनफील्ड एयरपोर्ट की क्षमता के विस्तार के अलावा ग्रीन फील्ड एयरपोर्ट की घोषणा के साथ ही कहा गया है कि बिहार में पश्चिमी कोशी नहर ईआरएम परियोजना के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। इनके अलावा बजट में मखानों का उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और विपणन में सुधार लाने के लिए बिहार में मखाना बोर्ड स्थापित किए जाने का वचन भी दिया गया है।

ग्रीन बोनस और पर्यावरण

जबकि उत्तराखण्ड द्वारा लंबे समय से पर्यावरण सेवा के बदले ग्रीन बोनस की मांग केन्द्र सरकार से की जाती रही है। यह बोनस उन राज्यों को दिया जाना चाहिए जो वनों को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। हालांकि, इस बजट में इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

उत्तराखण्ड का तर्क है कि इस हिमालयी राज्य में लगभग 71 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है। लगभग 18 प्रतिशत क्षेत्र हिमाचदित है और शेष जमीन अपरदन और हर साल आने वाली बाढ़ आदि के कारण बहुत कम उपयोगी रह गई है।उत्तराखण्ड सरकार का यह भी तर्क है कि इतने बड़े क्षेत्र में वन और वृक्ष होने कारण राज्य का कार्बन स्टॉक हरियाण और पंजाब जैसे राज्यों से कई गुना अधिक है और उत्तराखण्ड के वन देश के फेफड़ों की भूमिका निभाते हुए  कार्बन डाइऑक्साइड सोख कर देश के लए बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं। इसकी भरपाई ग्रीन बोनस के रूप में ही हो सकती है।

उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों के लिए कोई ठोस योजना न होना चिंता का विषय है। यदि ग्रीन बोनस, आपदा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह क्षेत्र भविष्य में गंभीर संकट का सामना कर सकता है। सरकार को इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए विशेष सहायता योजनाएं लानी चाहिए, ताकि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लक्ष्य को पूरा किया जा सके।

उत्तराखण्ड का यह भी तर्क है कि जब से  जीएसटी लागू हुआ है, तब से राज्य को औसतन 5 हजार करोड़ के राजस्व की हानि हो रही है जो कि बढ़ती जा रही है। केन्द्र सरकार ने सन् 2022 तक इस नुकसान की भरपाई की थी जो बंद हो गई।

दैवी आपदाओं पर विशेष ध्यान की थी उम्मीद

बजट में पर्यावरण के पहलू की भी अनदेखी की गयी है। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय क्षेत्र की आर्थिकी पर बुरा असर पड़ रहा है। इसके अलावा दैवी आपदाओं में निरंतर वृद्धि देखी जा रही है। चरम मौसम का बहुत बुरा असर जनजीवन पर पड़ रहा है। दैवी आपदाएं बढ़ रही हैं।  सन् 2023 की आपदा से हिमाचल प्रदेश अभी तक नहीं उबरा है। यही हाल उत्तराखण्ड का भी है।

उत्तराखण्ड अभी 2023 की जलप्रलय से नहीं उबर पाया। जम्मू कश्मीर से लेकर सुदूर पूर्वोत्तर के हिमालयी राज्य संवेदनशील पर्यावरण और विशिष्ट भौगोलिक परिस्थिति के कारण दैवी आपदाओं की दृष्टि से बहुत संवेदनशील है। उत्तराखण्ड में जोशीमठ जैसे रूहर धंस रहे हैं। समूचे हिमालयी क्षेत्र पर एक भयंकर भूकम्प का खतरा मंडरा रहा है। भूस्खलन की दृष्टि से भी सभी हिमालयी राज्य संवेदनशील है।  

इसरो के लैंड स्लाइड मैप में उत्तराखण्ड के सभी जिले संवेदनशील और रुद्रप्रयाग तथा टिहरी जिले अत्यंत संवेदनशील बताये गये हैं, लेकिन बजट में इसकी चिंता नजर नहीं आ रही है। बजट में न तो जलवायु परिवर्तन को रोकने और ना ही उसके अनुकूलन के उपायों के लिए प्रावधान नजर आ रहे हैं।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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