बजट में बिहार के लिए क्या रहा खास?
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बिहार के चुनाव की आहट दे रहा बजट
अगर बजट पर सरसरी नजर भी डालें तो विहार राज्य को मानों छप्पर फाड़ कर वित्त मंत्री ने तोहफे उडेल दिए हैं, जो कि न केवल बिहार चुनाव की आहट दे रहे हैं बल्कि केन्द्र की मोदी सरकार को समर्थन का ‘‘कैश बैक’’ माने जा रहे हैं।
वित्तमंत्री के भाषण में बिहार में ग्रीन पटना एयरपोर्ट और बिहटा में ब्राउनफील्ड एयरपोर्ट की क्षमता के विस्तार के अलावा ग्रीन फील्ड एयरपोर्ट की घोषणा के साथ ही कहा गया है कि बिहार में पश्चिमी कोशी नहर ईआरएम परियोजना के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। इनके अलावा बजट में मखानों का उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और विपणन में सुधार लाने के लिए बिहार में मखाना बोर्ड स्थापित किए जाने का वचन भी दिया गया है।
ग्रीन बोनस और पर्यावरण
जबकि उत्तराखण्ड द्वारा लंबे समय से पर्यावरण सेवा के बदले ग्रीन बोनस की मांग केन्द्र सरकार से की जाती रही है। यह बोनस उन राज्यों को दिया जाना चाहिए जो वनों को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। हालांकि, इस बजट में इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
उत्तराखण्ड का तर्क है कि इस हिमालयी राज्य में लगभग 71 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है। लगभग 18 प्रतिशत क्षेत्र हिमाचदित है और शेष जमीन अपरदन और हर साल आने वाली बाढ़ आदि के कारण बहुत कम उपयोगी रह गई है।उत्तराखण्ड सरकार का यह भी तर्क है कि इतने बड़े क्षेत्र में वन और वृक्ष होने कारण राज्य का कार्बन स्टॉक हरियाण और पंजाब जैसे राज्यों से कई गुना अधिक है और उत्तराखण्ड के वन देश के फेफड़ों की भूमिका निभाते हुए कार्बन डाइऑक्साइड सोख कर देश के लए बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं। इसकी भरपाई ग्रीन बोनस के रूप में ही हो सकती है।
उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों के लिए कोई ठोस योजना न होना चिंता का विषय है। यदि ग्रीन बोनस, आपदा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह क्षेत्र भविष्य में गंभीर संकट का सामना कर सकता है। सरकार को इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए विशेष सहायता योजनाएं लानी चाहिए, ताकि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लक्ष्य को पूरा किया जा सके।
उत्तराखण्ड का यह भी तर्क है कि जब से जीएसटी लागू हुआ है, तब से राज्य को औसतन 5 हजार करोड़ के राजस्व की हानि हो रही है जो कि बढ़ती जा रही है। केन्द्र सरकार ने सन् 2022 तक इस नुकसान की भरपाई की थी जो बंद हो गई।
दैवी आपदाओं पर विशेष ध्यान की थी उम्मीद
बजट में पर्यावरण के पहलू की भी अनदेखी की गयी है। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय क्षेत्र की आर्थिकी पर बुरा असर पड़ रहा है। इसके अलावा दैवी आपदाओं में निरंतर वृद्धि देखी जा रही है। चरम मौसम का बहुत बुरा असर जनजीवन पर पड़ रहा है। दैवी आपदाएं बढ़ रही हैं। सन् 2023 की आपदा से हिमाचल प्रदेश अभी तक नहीं उबरा है। यही हाल उत्तराखण्ड का भी है।
उत्तराखण्ड अभी 2023 की जलप्रलय से नहीं उबर पाया। जम्मू कश्मीर से लेकर सुदूर पूर्वोत्तर के हिमालयी राज्य संवेदनशील पर्यावरण और विशिष्ट भौगोलिक परिस्थिति के कारण दैवी आपदाओं की दृष्टि से बहुत संवेदनशील है। उत्तराखण्ड में जोशीमठ जैसे रूहर धंस रहे हैं। समूचे हिमालयी क्षेत्र पर एक भयंकर भूकम्प का खतरा मंडरा रहा है। भूस्खलन की दृष्टि से भी सभी हिमालयी राज्य संवेदनशील है।
इसरो के लैंड स्लाइड मैप में उत्तराखण्ड के सभी जिले संवेदनशील और रुद्रप्रयाग तथा टिहरी जिले अत्यंत संवेदनशील बताये गये हैं, लेकिन बजट में इसकी चिंता नजर नहीं आ रही है। बजट में न तो जलवायु परिवर्तन को रोकने और ना ही उसके अनुकूलन के उपायों के लिए प्रावधान नजर आ रहे हैं।
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