जनजातियों को परम्पराओं के निर्वाह की गारंटी
धर्म और धार्मिक परम्पराओं की आजादी की ही तरह संविधान ने जनजातीय समाज को उनकी परम्परागत प्रथाओं की आजादी की गांरटी भी दे रखी है। इसीलिए संविधान में अनुसूची-6 का समावेश किया गया है। यह गारंटी भारत की सांस्कृतिक विविधता की अनूठी धरोहर को संरक्षित रखने के लिए दी गई है। वास्तव में अपनी प्रथाओं पर कायम हमारी जनजातियां नए और प्राचीन युग के बीच की कड़ियां या सेतु हैं। हमारे संविधान निर्माता इस सेतु को हर हाल में बचाना चाहते थे। अगर जनजातियों पर समान नागरिक संहिता थोपी गई तो उनकी पहचान ही समाप्त हो जाएगी।
समान नागरिक संहिता की सबसे बड़ी विसंगति मातृसत्तात्मक समाज वाले मेघालय में नजर आ रही है। मेघालय के खासी और गारो समाज में विवाह, तलाक और गोद लेने की भिन्न परम्पराओं के साथ ही सम्पत्ति और उत्तराधिकार के नियम भी बिल्कुल उलट हैं। मेघालय के मातृसत्तात्मक समाज में महिलाएं प्रमुख भूमिका निभाती हैं। सबसे छोटी बेटी, जिसे खद्दूह के नाम से जाना जाता है, जिसको पैतृक संपत्ति विरासत में मिलती है।
यदि किसी परिवार में बेटी का जन्म नहीं हुआ है, तो परिवार या तो एक बेटी को गोद लेता है या सबसे बड़ी महिला की बहन की बेटी को संपत्ति सौंप देता है। शादी के बाद पति अपनी सास के घर रहते हैं और पत्नी के गोत्र नाम को अपनाते हैं। बच्चे अपनी मां का उपनाम धारण करते हैं। ससुर की मौत के बाद सास को पत्नी के रूप में रखना होता है। यदि कोई जोड़ा असंगति से लेकर संतान की कमी जैसे कारणों से अलग होना चाहता है, तो वह जोड़ा बिना किसी सामाजिक कलंक या बंधन के अलग हो सकता है।
खासी कुर कबीले के अनुसार ये प्रथाएं ऐसे नियम हैं जो विरासत और संपत्ति के स्वामित्व को नियंत्रित करते हैं। वहां की खासी हिल्स ऑटोनॉमसडिस्ट्रिक्ट कांउंसिल ने समान नागरिक संहिता के विरोध में प्रस्ताव पारित किया है। इसी प्रकार नागालैंड ट्राइबल काउंसिल ने भी इस संहिता को लेकर चिंता जाई है। क्योंकि उनके यहां सामाजिक परम्पराएं भिन्न होने के साथ ही उन्हें अपनी परम्पराओं की संवैधानिक गारंटी मिली हुई है।
2011 की जनगणना के अनुसार, मेघालय की आबादी में 86.15 प्रतिशत आदिवासी थे। जिनमें खासी लोगों की आबादी लगभग 13 लाख थी।
बहुपत्नी के साथ ही बहुपति प्रथा भी जीवित है समाज में
भारत में ऐसे कुछ मातृवंशीय समाज हैं जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से मातृवंशीय पारम्परा का पालन किया है। हालांकि यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि मातृ सत्तात्मकता की सीमा और प्रथा विभिन्न समुदायों के बीच भिन्न होती है और कई लोगों ने विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारणों से समय के साथ अपनी परम्पराओं में बदलाव किया है। जैसे कुछ जनजातीय समाजों में बहुपत्नी प्रथा के साथ ही बहुपति प्रथा भी रही है मगर सामाजिक बदलाव के कारण बहुपति प्रथा को उन्हीं समाजों में हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है।
केरल में नायर समुदाय भी ऐतिहासिक रूप से मातृसत्तात्मक प्रणाली का पालन करता रहा है जिसे मरुमक्कथायम के नाम से जाना जाता है। हालांकि, बदलते सामाजिक मानदंडों और कानूनी सुधारों के कारण, नायरों के बीच मातृवंशीय प्रणाली काफी कम हो गई है और पितृवंशीय प्रणाली अब अधिक प्रचलित है।
अरुणाचल प्रदेश की जीरो घाटी में रहने वाला का छोटा सा अपातानी जनजाति समाज भी स्त्री प्रधान है, वहां भी संपत्ति और भूमि का स्वामित्व और प्रबंधन महिलाओं द्वारा किया जाता है। कर्नाटक का बंट और बिलावा समुदाय भी मातृसत्तात्मक माना जाता है। इनमें विरासत भले ही बहन के नाम होती है लेकिन परिवार के मुख्य निर्णय भाई ही लेता है। ऐसे बहुरंगी समाज में समान नागरिक संहिता की बात करना जितना असान है मगर लागू करना उतना ही मुश्किल है।
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