बोरिस जॉनसन (फाइल फोटो)
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इस प्रदर्शन को लेबर पार्टी ने अपना समर्थन दिया था। सितंबर में आयोजित लेबर पार्टी की एक बैठक में बकायदा प्रस्ताव पारित कर कश्मीर में अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग भी मुस्लिम कट्टरपंथी वर्ग और लंदन के मेयर सादिक खान के दबाब में की गई। दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ की ब्रिटिश इकाई के कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने भी बॉरिस जॉनसन के समर्थन मोर्चा संभाल रखा था।
ब्रिटिश संसद के चुनाव में करीब 16 लाख भारतीय मूल के मतदाताओं ने खुलकर बोरिस जॉनसन का साथ दिया। घर-घर मोदी की तर्ज पर करीब 183 संसदीय क्षेत्रों में फैले 2.5 फीसदी एनआरआई के बीच जॉनसन के लिए अभियान चलाया गया।
ब्रिटेन की 15 सीटों पर 40 फीसदी, 46 सीट पर 20 फीसदी,और 122 सीटों पर 10 फीसदी से ज्यादा भारतीय मूल के मतदाताओं की मौजूदगी है। कंजरवेटिव पार्टी ने 25 एनआरआई को टिकट भी दी थी जिनमें से 7 जीतकर भी आए हैं।
चुनाव अभियान के दौरान बोरिस जॉनसन दो बार वहां के हिन्दू मंदिरों में पूजा करने भी गए और उन्होंने खुलकर मोदी को अपना मित्र बताया। नतीजों से साफ है कि ब्रिटेन में भी मोदी का प्रभाव राजनीतिक रूप से मजबूत हुआ है। 363 सीटों के साथ कंजरवेटिव पार्टी की जीत से वामपंथी और मोदी विरोधी तबके को बड़ा झटका लगा है। चुनावी नतीजों के बाद मीडिया का एक वर्ग इसे दुनिया में दक्षिणपंथी उभार के खतरे के रूप में निरूपित करने की कोशिश करने में जुटा है।
बोरिस जॉनसन (फाइल फोटो)
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सवाल भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतांत्रिक मूल्यों और बहुलता की बात करने वाले लोग यह मानने के लिए अभी भी तैयार नहीं है कि मोदी भारत की विहित संसदीय प्रक्रिया से दो बार चुनकर आए हैं लेकिन एक बड़ा बौद्धिक वर्ग जो भारत में सत्ता पोषित रहा है इस तथ्य को स्वीकार करने तैयार नहीं है।
ब्रिटिश संसदीय चुनाव के आलोक में इस नए भारत के अभ्युदय को भी विश्लेषित किए जाने की जरूरत है। क्योंकि जिस अतिशय प्रलाप के साथ बोरिस जॉनसन की खिलाफत मोदी के नाम पर की गई है उसके बावजूद लेबर पार्टी की करारी हार के निहितार्थ बहुत गहरे हैं।
सवाल यह है कि क्या बोरिस जॉनसन के जरिए एक बार फिर मोदी ब्रांड भारत की जनस्वीकार्यता पर मोहर लग रही है ?क्या नए भारत का विचार वैश्विक स्तर पर भी अपनी ताकत को स्वयंसिद्ध कर रहा है? जवाब इसलिए हां में है क्योंकि भारतीयता का विचार जिस मौलिक रूप में सर्वग्राही और बहुलतामूलक है उसे इन 70 वर्षों में बहुत ही विकृत रूप में हमारे सामने परोसा गया।
भारतीय लोकजीवन ने भी इसे लंबे अरसे तक अपनी राजनीतिक सामाजिक संस्थाओं के जरिए स्वीकार किया लेकिन इस थोपी गई विकृत सेक्यूलर परिभाषा को आज का नया भारत स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। बोरिस जॉनसन को प्रतीकात्मक रूप से इसी निहितार्थ में समझने की जरूरत है। ये दक्षिणपंथ की जीत नहीं है बल्कि यह नकली सेक्युलरिज्म की करारी शिकस्त है भारत के बाहर।
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