इस संसार में सुख की प्राप्ति सरल नहीं है। यह दुख, संघर्ष और पीड़ा से भरा हुआ है। यदि कोई व्यक्ति इन कठिनाइयों से बच भी जाए, तो वह एक अन्य समस्या का सामना करता है-ऊब या बोरियत। यह आंतरिक रिक्तता मनुष्य को बेचैन कर देती है। इसी संदर्भ में अरस्तू का यह गहन विचार महत्वपूर्ण है कि हर प्रकार का सुख किसी न किसी गतिविधि या क्षमता के प्रयोग पर आधारित होता है। बिना सक्रियता के सुख का अस्तित्व संभव नहीं है। मनुष्य का वास्तविक सुख उसकी सर्वोच्च क्षमताओं के स्वतंत्र और पूर्ण उपयोग में निहित है। जब वह अपनी प्रतिभाओं और शक्तियों को सार्थक दिशा में लगाता है, तब वह सच्चे संतोष और आनंद का अनुभव करता है।
प्रकृति ने मनुष्य को जो शक्तियां प्रदान की हैं, उनका उद्देश्य उसे जीवन की कठिनाइयों से संघर्ष करने योग्य बनाना है। परंतु जब यह संघर्ष समाप्त हो जाता है और मनुष्य के पास कोई चुनौती नहीं रह जाती, तब यही शक्तियां उसके लिए बोझ बन जाती हैं। तब वह केवल समय बिताने या ऊब से बचने के लिए अपने आपको व्यस्त रखने की कोशिश करता है। परिणामस्वरूप, उसे अपने भीतर अर्थ और उद्देश्य खोजना कठिन लगता है। स्पष्ट है कि सच्चा सुख बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि मनुष्य के अपने भीतर, उसकी सक्रियता, उसकी क्षमताओं और उसकी आत्मनिर्भरता में निहित है।
- द विजडम ऑफ लाइफ के अनूदित अंश