अब तक के लिखित इतिहास में इस समुदाय को पिछड़ा हुआ बताया गया है।
- फोटो : social media
कॄष्ण कुमार ने इस लेख के अंतर्गत कुछ महत्वपूर्ण बातों को रेखांकित किया है। आदिवासी और अनुसूचित जाति का विश्वास अपनी संस्कृति और परंपरा पर रहा है, जिसे मुख्यधारा मेें पिछड़ा माना जाता रहा है।
कॄष्ण कुमार के मुताबिक इन विद्यार्थियों को मुख्यधारा से जुड़ने के लिए कुछ निश्चित बातों को अपनाते हुए सभ्य समाज की अवधारणा में बदलना चाहिए\होगा। पाठ्यक्रम बनाने से लेकर उसे कक्षा में बच्चों के साथ साझा करने तक की प्रक्रिया में इन समुदायों से किसी की भागीदारी नहीं होती है। बल्कि आदिवासी समूह की जो भी कहानियां या बातें लिखी जाती हैं वो प्रतीकात्मक रूप मे ही आती हैं।
आदिवासी समाज की संस्कृति को कभी सभ्य समाज का हिस्सा नहीं माना गया।
- फोटो : Social media
यदि बेसिक शिक्षा के पक्ष में गांधी जी का प्रस्ताव देखा जाए तो वो परंपरागत् ज्ञान, कौशल और शिक्षा को स्कूली पाठ्यक्रम में रखने की बात करते हैं। जो ज्ञान के समाजशास्त्र के प्रभावों की बात करता है। गांधी जी इस उत्पीड़ित समाज से संबंधित ज्ञान को सम्मानजनक स्थान देने की बात करते हैं।
शताब्दियों से इन समुदायों को शिक्षा से वंचित रखा गया था उनसे जुड़ी व्यवस्थाओं को 'ज्ञान' माना ही नही जाता था। इसलिए शायद इन समूहों की कहानियां केंद्रिय पात्र भी नही बन पाती हैं। इनकी कहानियों को प्रतीकात्मक रूप में ही लिखा गया।
किसी दूसरे समुदाय ने ही इनकी कहानी को अपने तरीके से लिखा। कहने का अर्थ यही है कि मुख्यधारा ने इस समुदाय को कभी भी किसी योग्य नही माना। हमेशा इन्हें इनकी परंपरा से दूर कर आधुनिक समाज का हिस्सा बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
लेखक अनिल यादव ने अपनी किताब 'वह भी कोई देश है महाराज' जो उत्तर-पूर्व का यात्रा वृतांत है - में लिखा है कि नागालैंड के लोगों का विद्रोह अपनी परंपरा और इतिहास को बचाने के लिए था, लेकिन उन्हें जबरदस्ती आधुनिकता या लोकतंत्र का पाठ पढ़ाया जा रहा था। जबकि वे अपनी कबिलाई जीवनशैली में ही खुश थे।
इतिहास लेखन और कक्षा में उसका प्रस्तुतीकरण- इस लेख की शुरुआत में ही जो उदाहरण है वो कक्षा में इतिहास पढ़ाने से जुड़ा हुआ है। भारत में जो इतिहास लिखा गया, वो इतिहासकारों द्वारा एक निश्चयात्मक तथ्य की तरह लिखा गया और कई बार तथ्यों को कई इतिहासकारों ने तोड़- मरोड़कर लिखा। उसे ही अंतिम सत्य नही समझना चाहिए।
बल्कि बहुत सारे तथ्यों से गुजरते हुए, उसकी विवेचना करते हुए किसी ऐतिहासिक घटना को समझना चाहिए। लेकिन जब यही पाठ्यक्रम के रूप में स्कूलो में पढ़ाया जाता है तो वो भी अध्यापक/अध्यापिका द्वारा निश्चयात्मक तथ्य की तरह ही पढ़ाया जाता है। जो एक दृष्टिकोण से ही आते हैं। हमारे यहां पाठ्यपुस्तक को ही वास्तविक पाठ्यक्रम मान लिया जाता है। जिसकी वजह से कभी-कभी पूरा नॉलेज डिस्ट्रीब्यूशन गलत तरीके से होता है।
मौखिक या श्रुति परंपरा की ऐतिहासिक तथ्यों के रूप में अवहेलना- आदिवासी समाज में संस्कृति का विस्तार मौखिक रूप से या पीढ़ी दर पीढ़ी एक दूसरे को हस्तांतरित किया गया। आधुनिक युग में मौखिक या श्रुति परंपराओं, लोक कलाओं या लोक गाथाओं को एतिहासिक तथ्यों के रूप में नहीं देखा जाता।
जिससे आदिवासी समाज की शिक्षा, संस्कृति, मान्यताओं या उनके रहन-सहन को कभी सभ्य समाज का हिस्सा नहीं माना गया और उन्हें हमेशा पिछड़े हुए की श्रेणी में रखा गया।
इस पूरी प्रक्रिया ने आदिवासी समुदाय को आधुनिक समाज के आगे हीन भावना से ग्रस्त कर दिया। इस लेख के माध्यम से कॄष्ण कुमार जी ने इन आधुनिक रूप से पिछड़े समुदायों की शिक्षा में पिछड़ने के कारणों को कई तथ्यों के साथ बताया है।
चन्द्र किरण तिवारी, उपक्रम संस्था की सह-संस्थापक हैं. जो उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में सरकारी एवं गैर-सरकारी विद्यालयों में भाषा, पुस्तकालय एवं 'बच्चों के सीखने की क्षमता' पर काम कर रहीं हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।