भारतीय गणतंत्र और लोक चेतना में सत्ता और विपक्ष दरअसल अद्वैत दृष्टि के ही दो पहलू होते थे, ताकि देश की शांति इस बात पर निर्भर करे कि उस देश के लोग कितने सभ्य, शिक्षित और सुसंस्कृत हैं। वे लोग सत्ता की रचना करते थे और सत्ता फिर-फिर देश और अपने समाज की पुनर्रचना करती रहती थी। आज यह भाषा यूटोपिया की भाषा लग सकती है। लेकिन समीक्षा की पूरी बात हमारे स्वाधीन देश में साहित्य और कला तक आकर सीमित हो गई है। हमने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि गैर भारतीय देशों के संस्कार में किसी ग्रंथ की व्याख्या कमेंटरी है, लेकिन हमारे यहां इसके लिए एक नहीं, बल्कि छह तरीकों की व्यवस्था बनाई गई है, जैसे वृत्ति, टीका, भाष्य आदि। राजशेखर ने अपनी काव्यमीमांसा में छह प्रकार की कमेंटरी की विधिवत व्यवस्था दे रखी है। साहित्य और कलाओं में समीक्षा दृष्टि या समालोचना का स्तर आजाद भारत में कैसा रहा, इसे यदि इस मूल भारतीय ऋषि दृष्टि से देखें, तो आसानी से दिख जाएगा कि समीक्षा अभी आरंभ ही नहीं हुई है।
हिंदी साहित्य में समीक्षा या आलोचना के नाम पर काफी कुछ लिखा गया है। प्रेमचंद के साहित्य पर ही पिछले करीब सत्तर साल और स्वयं प्रेमचंद के समय में भी काफी कुछ लिखा गया है। लेकिन वह लिखना परवर्ती समय में एक भी ऐसी रचना नहीं दे सका है, जो प्रेमचंद की कोटि की एक कहानी भारतीय पाठक मानस को उपहारस्वरूप दे सके। देश को एक स्वस्थ सत्ता कैसे मिल सकती है भला! भारतीय कलाओं की समीक्षा का हाल और भी निराशापूर्ण, क्षुब्ध और इकहरा है। लगता है कि आजाद भाारत में रंगमंच, सिनेमा, संगीत या चित्रकला की समीक्षा हुई ही नहीं। हिंदी में संगीत समीक्षा के नाम पर प्रायः ऐसा कुछ प्रकाशित होता रहा कि संगीत साधक अपनी संगीत प्रस्तुति के अगले दिन ऐसी कोई भी प्रकाशित सामग्री लेकर अपने शहर लौट सकने की स्थिति में नहीं आ सके, जो किसी को दिखाने लायक हो। हां मूर्ख कलाविदों की अहंमन्यता मुखर होती चली गई। उन्होंने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिलाया कि पं. हरिशंकर मिश्र के बाद कभी बनारस में ध्रुपद गायन पनपा ही नहीं, जबकि बनारस एकमात्र शहर है, जहां इस विशेष शास्त्रीय शैली का वार्षिक मेला पिछले चवालीस साल से होता चला आ रहा।
रंगमंच की भी ऐसी समीक्षाएं आती रहीं कि हिंदी के रंगकर्मी के लिए यह देखना दुष्कर हो गया कि वे आगे नहीं बढ़ रहे, पीछे छूट रहे। सिनेमा के बारे में तो राज्यसभा टीवी के गुफ्तगू कार्यक्रम की सौवीं कड़ी में जया बच्चन को कहना पड़ा कि हिंदी में फिल्म समीक्षक ही नहीं हैं। उन्होंने कहा कि हमें ऐसे फिल्म समीक्षकों की जरूरत है, जिन्हें फिल्म के तकनीकी पक्षों की जानकारी हो, ऐसे समीक्षक जो हमें भी सिखाएं। दरअसल वह कहना चाहती थीं कि फिल्म भाषा की समझ रखने वाले समीक्षकों की कमी है, जरूरत है। समाधान बहुत आसान है। पंचमवैदिक ऋषि ने अपने ग्रंथ के सिद्धि अध्याय में वर्णित चार कारिकाओं में समीक्षकों के गुण बताए हैं, और यह भी कि यह यानी समीक्षा नाट्य या संगीत परिवेश का ही तीसरा रूप हो सकता है, जो संगीत साधक को उन्नत करेगा। संगीत समीक्षक यदि संगीत समाज स्वयं नहीं बनाता और स्तरीय समीक्षा की उम्मीद यदि प्रकाशन जगत से करता है, तो यह ऐसे देश के संस्कार को बताता है, जो संस्कृति और सभ्यता को बहुत पीछे छोड़ आया है।
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