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जीवन धारा: जीवन अपने आप में एक जोखिम है, डर से सरकना या चुनौती लेकर सच में जीना

सार

जीवन को गहराई और समग्रता से जीना पहाड़ों की ऊंचाइयों पर चलने जैसा है।  जो गिरने से डरते हैं, वे समतल जमीन पर ही सरकते रहते हैं, लेकिन जो सच में जीना चाहते हैं, वे जोखिम स्वीकार करते हैं।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जीवन खतरनाक है, जबकि मृत्यु सबसे अधिक सुविधाजनक और आरामदेह प्रतीत होती है। मृत्यु में कोई चुनौती नहीं, कोई अनिश्चितता नहीं; इसलिए अनेक लोग अनजाने में ही जीवन से बचने का रास्ता चुन लेते हैं। वे ऐसे जीते हैं कि कम से कम जीना पड़े, क्योंकि जितना कम जिएंगे, उतना कम खतरा होगा। जितना अधिक जिएंगे, उतनी ही संभावना होगी चोट की, असफलता की और गिरने की। जीवन में जितनी तीव्रता होगी, उतनी ही उसमें आग होगी, उतनी ही उसमें धार होगी।

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जीवन को गहराई और समग्रता से जीना पहाड़ों की ऊंचाइयों पर चलने जैसा है। ऊंचाई पर चलने वाला गिर भी सकता है। जो गिरने से डरते हैं, वे समतल जमीन पर ही सरकते रहते हैं। दरअसल, वे चलते नहीं, बस घिसटते रहते हैं। उड़ान उनके लिए कल्पना मात्र है। लेकिन जो सच में जीना चाहते हैं, वे जोखिम स्वीकार करते हैं।

एक शिष्य सूरजमुखी के फूल जैसा होता है और उसका अपने गुरु के निकट होना सूर्य की ओर उड़ान भरने जैसा है। जिस दिशा में सूर्य होता है, वह उसी ओर मुड़ जाता है। सूर्य ही उसका जीवन है। सूर्य डूबे, तो वह भी सिमट जाता है, सूर्य उगे, तो वह खिल उठता है, हवाओं में झूमता है, धूप पीकर मस्त हो जाता है। उसके भीतर तुरंत नृत्य जाग उठता है।
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फ्रेडरिक नीत्शे ने कहा है, लिव डेंजरसली, अर्थात खतरनाक ढंग से जियो। वास्तव में, यह दो शब्दों की पुनरुक्ति है। जीना ही खतरनाक ढंग से जीना है। जीने का कोई और तरीका है ही नहीं। जहां जीवन है, वहां अनिश्चितता है; जहां अनिश्चितता है, वहीं विकास है। फिर भी सदियों से धर्म ने जीवन के निषेध का रूप ले लिया है। लोग समझ बैठे कि भाग जाना ही अध्यात्म है। समस्याओं से भागना, संबंधों से दूर हो जाना, संसार से कट जाना ही धर्म है। पर जितने अधिक संबंध, उतना अधिक जीवन।

संबंध जीवन को गहराई, सघनता और विस्तार देते हैं। जी भरकर जीने का अर्थ है अनेक संबंधों में उतरना, प्रेम करना, जुड़ना, टूटना और फिर से बनना। इसलिए सच्चा संदेश भागने का नहीं, जागने का है। जागकर जीना ही धर्म है। भागकर जीना न धर्म है, न जीवन।

मनुष्य ने ही धर्म को आत्मघाती बना दिया, जबकि धर्म कभी आत्मघाती नहीं हो सकता। दोष धर्म का नहीं, मनुष्य की भीरुता का है। भयभीत मन अपनी कमजोरी को तर्कों से ढक लेता है। जो जीवन से भागते हैं, वे स्वयं को त्यागी कहते हैं, पर सच यह है कि वे जोखिम से डरते हैं। जीवन का खजाना असीम है, उसकी गहराई अथाह है। यदि ईश्वर कहीं है, तो वह जीवन में ही व्याप्त है, कण-कण में, भीतर और बाहर, हर दिशा में। इसलिए इस जन्म का हिसाब इसी जन्म में देखो। पिछले जन्म की कल्पनाओं में उलझने से पहले वर्तमान को पूर्णता से जियो। साहस के साथ, जागरूकता के साथ और समग्रता के साथ। यही सच्चा धर्म है, यही सच्चा जीवन है।
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      (-ओशो के प्रवचनों के संकलन के संपादित अंश)

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