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दूसरा पहलू: शाहजहां के चोबदार की बावड़ी स्वर्ग का झरना और ज्ञानी चोर

Wed, 01 Apr 2026 07:23 AM IST
Shubham Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

रोहतक की 17वीं सदी की यह बावड़ी मुगल दौर की अनोखी धरोहर है, जिसे शाहजहां के दरबान सैदू कलाल ने बनवाया था। 130 फीट गहरी इस संरचना को ‘स्वर्ग का झरना’ भी कहा जाता है। इतिहास के साथ जुड़ी ‘ज्ञानी चोर’ और छिपे खजाने की कहानियां इसे रहस्यमयी बनाती हैं, जहां लोग आज भी खोज में भटक जाते हैं।

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रोहतक की रहस्यमयी बावड़ी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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शाहजहां का जिक्र आते ही अमर प्रेम की बुलंद इमारत-ताजमहल की तस्वीर कौंध उठती है। लेकिन, रोहतक (हरियाणा) में उनके चोबदार (दरबान) सैदू कलाल की बनवाई बावड़ी के किस्सों से कम ही लोग वाकिफ होंगे। कोई इसे ‘स्वर्ग का झरना’ कहता है, कोई ज्ञानी (या जानी) चोर की गुफा। यहां लगे फारसी शिलापट्ट के मुताबिक, इसका निर्माण 1658-59 ईस्वी में सैदू कलाल ने करवाया था। लखौरी ईंटों से बनी 130 फीट गहरी इस अष्टकोणीय बावड़ी में जलकुंड है और कुआं भी।

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यहां के कमरे मुगल सेना के लिए आरामगाह होते थे। वर्ष 1995 में आई भयानक बाढ़ से पहले, पानी तक पहुंचने के लिए 101 सीढ़ियां उतरनी पड़ती थीं। अब खुली सीढ़ियां 32 ही हैं। भारत यात्रा (1832-33) के दौरान महम में ठहरे अंग्रेज कैप्टन गॉडफ्रे चार्ल्स मुंडी ने भी अपनी पुस्तक पेन एंड पेंसिल स्केचेजः द जर्नल ऑफ ए टूर इन इंडिया में इस बावड़ी को मुगल वैभव का सबसे उल्लेखनीय अवशेष बताया है।

ऐतिहासिक साक्ष्यों के बावजूद, इसका ज्ञानी चोर से जुड़ाव चौंकाता है। महम के गफूर खान बताते हैं कि ऐसी मान्यता है कि चतुर चोर ज्ञानी धनवानों को लूटकर बावड़ी में छिप जाता था। उसी ने एक दिन के लूटे खजाने से बावड़ी बनवाई थी। उसका खजाना भी यहीं छिपा है। कुछ ने इसे खोजा भी, पर यहां की बनावटी भूलभुलैया में ही खोकर रह गए। किस्सा यह भी है कि ब्रिटिशकाल में एक बरात कुएं की सुरंग के रास्ते दिल्ली जाने के लिए बावड़ी में उतरी थी, पर पहुंची कहीं नहीं।
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तभी से सुरंगें बंद हैं। ऐसी कहानियां कहां से आईं, इसका जवाब महम के ऐतिहासिक स्थलों पर शोध कर चुके गुरु जंभेश्वर यूनिवर्सिटी, हिसार के उप निदेशक (जनसंपर्क) डॉ. बिजेंदर दहिया ने टटोला। वह बताते हैं कि सिंधु घाटी से गंगा किनारे तक ऐसे किरदारों को मसीहा बनाने के ढेरों किस्से मिलते हैं। हरियाणा के कई सांगी कलाकारों के साथ सोशल मीडिया ने भी इन्हें फैलाया है। वहीं, जानी या ज्ञानी का भेद उच्चारण से तो स्वर्ग का झरना फारसी में दर्ज इबारत से आया है।

शाहजहां ने ऐसी ही बावड़ी दिल्ली के लाल किले में भी बनवाई थी, लेकिन किस्से गढ़कर महम की बावड़ी रहस्यमयी बना दी गई। महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी, रोहतक के शोधार्थी अमनदीप कहते हैं, स्थानीय इतिहास का दस्तावेजीकरण न होने से ही जानी चोर जैसी झूठी कहानियां फैल रही हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की अनदेखी से यहां कब्जे भी हो रहे हैं। प्रशासन भी चुप है। सरकार को वास्तुकला और जल-प्रबंधन की इस ऐतिहासिक संरचना पर ऐसे पानी नहीं फिरने देना चाहिए। - नवीन सिंह पटेल

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